कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(८७०)
कबीरपंथी-
शब्द ३०४-का सोचत बारमबारा, प्रभुका नाम न लेत गँवारा ॥ टे० ॥ बाजीगर डंक बजाया, सब लोग तमाशे आया ॥ बाजीगर डंक सकेला, तब रहगये आप अकेला ॥ मनुवां जहाँ हाट लगाया, दुनिया सौदागर आया ॥ सौदागर सौदा कीन्हा, बिरले सौदागर चीन्हा ॥ जब पार उतरना चाहिये, तब खेवटसे मिल रहिये ॥ जब उतर गये भौपारा, तबको हमको संसारा ॥ जब वस्तु अगोचर चाहिये, तब दीपक बारत रहिये ॥ जब वस्तु अगोचर पाई, तब जोतमें जोत समाई ॥ जब मुखडा देखन चाहिये, तब दरपन मांजत रहिये ॥ जब दरपन लागीं काई, तब दरशन कहाँते पाई ॥ जब फूल पत्र फल चाहिये, तब विरवा सींचत रहिये ॥ जब फूल पत्र फल लागा, तब दिलका दुविधा भागा ॥ साहेब कबीर कहे हम जाना, जानेसे मेरा मन माना ॥ कहनेसे नाँहि पतीजे तो मूरखसे का कीजे ॥ ✽
शब्द ३०५-कोई लोढ़िरे संत सुजान, काया बन फूल रही ॥ टे० ॥ एकहि एक मिले गुरुपूरा, मूलमंत्र जो पावे ॥ साधु संतकी बानी बूझै, मन परतीत बढावे ॥ दूजे तनकी दुविधा मेटे, दूजा भाव न लावे ॥ भीतर बाहर एक देखे सो वह संतहि पावे ॥ तीजै तीनों गुनसे न्यारा, तिरबेनी अस्नाना ॥ त्रिकुटी महलमें आसन मारे, अनहद धुन सुन काना ॥ चौथे चंचल बसकर राखे, चतुराई सब त्यागे ॥ चढके प्रेम हिंदोरा झूले, गुरुसो भगति वर मांगे ॥ पांचे पांच तत्त्व प्रकासे, पांचो इंद्री साधे ॥ पकड़ पवनकापरचे करके, मनओ पवन गहि बांधे ॥ छठयें छऊ चक्रको बेधे, षट दल होय प्रकाशा ॥ इंगला पिंगला मारग सोधे, करै गुफामें बासा ॥ साते सत बचन परकासे, सत्य सुरत लखि आवे ॥ मकरतारकी डोरी गहिके, अजर अमर घर
शब्दावली
(८७१)
पावे ॥ आठे अष्ट कमल दलफूले, घट उजियारी होई ॥ आतम होय परमातम चीन्हे, संत कहावे सोई ॥ निरख देख नोमीके द्वारा, जब गुरु पूरा पावे ॥ अहे संधि कायासे न्यारी, जो गुरु संधि लखावे ॥ दसई दसो द्वारको पावे, पटले एक पहारा ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, बहुतन साधो आरा ॥
शब्द ३०६—दोय नैनोके बीच सुसाफिर रमरहुरे ॥ ॥ टे० ॥ धोबी धोवे कापडा, झांझ मऊके घाट ॥ मछरी साबुन लेगईरे, धोबिया गा बारह बाट ॥ धोबिनियां लुट गईरे ॥ कोठी ऊपर कोठरी, जहाँ चढ बोले मोर ॥ मोर बिचारा का करे, घरमें घुसगा चोर ॥ सबी धन लुटि गयोरें, सँराक कुवा पताल जल-पानी, लंबी लागी डोर ॥ थरहर कंपे बाला जियरा, को प्रेमी लेत निचोर ॥ सुघर घर होय रहोरें कहें कवीर सुनो भाइ साधो, सौदा करले हाट ॥ हाट उसल गये सौदा बिक गये, होगये बारा-बाट ॥ जहाँके तहाँ होय गयोरें ॥
शब्द ३०७—मिलना कठिन है मैं कैसे मिलों पिय जाय ॥ टे० ॥ अगम भूमि जहाँ महल पियाको, हमपे चढयो न जाय ॥ औघट घाट गैल रपटीली, पांव नहीं ठहराय ॥ सावधान पग धरो पंथ-पर, बार बार डिंगजाय ॥ अति बारीक पंथ बहु झीना, सुरति झकोरा खाय ॥ लोकलाज मरजाद जगतकी, देखत मन सकु-चाय ॥ जो या बात नये जोबनकी, लाज तजी ना जाय ॥ दूजे सतगुरु मिले पंथपर, मारग दिये बताय ॥ साहेब कवीर मुक्ति के दाता शीतल अंग लगाय ॥
शब्द ३०८—सोहागिन चेत करो तोरे आवागमन नगिचाय ॥ टे० ॥ बालापनमें खेल गँवाये, चलिया चाल कुचाल ॥ कोन जबब देहु मोरि सखियां साहेब पूछ हवाल ॥ समुझ बिनका
(८७२)
कवीरपंथी—
करवे ॥ सतसुकृतकी चूनरि पहिरो, सत मत रंग रंगाव ॥ प्रेम- तन्वके मांग सँवारो, निरभे सिंदुर लाव ॥ घुंचट पट खोल चलो तुम ससुरे, नेहर नाहिं निबाह ॥ नेहर नेह पैहों सखियां, मत तुम भरम भुलाव ॥ भुलाने पिया न पैहो ॥ आगे इत भौसागर, गहिरा सूझे वार न पार ॥ किस बिध पार उतरबे सखिया, बिन खेवट कडिहार ॥ खेवइया बिनका करबे ॥ कहें कवीर सोई सहवाती, पियरंग राजी होय ॥ अमर लोक अस्थाना पावौ, तब तोर अटल सोहाग, मंडल बिसराम करो ॥
शब्द ३०९.—सबका साक्षी मेरा साईं । ब्रह्मा विष्णु रुद्र ईश्व- रलो, औ अद्याकृत ताईं ॥ टे० ॥ पांचपचीस सो सचै करले, ये सब जग भर माया ॥ अकार उकार मकार मात्रा, इनके परे बताया ॥ जागृत सपन सुषोषत तुरिया, इनते न्यारा होईं ॥ राजस तामस सात्त्विक त्रिगुन, इनते न्यारा सोईं ॥ सूछम अस्थूल आनंदमय कहिये, इन मिल भोग बखाना ॥ राजस तेज प्रकाशहि कहिये, इनते न्यारा जाना ॥ परा पसंति मधमा वैखरी, चौबानी प्रपंच प्रमाणी ॥ पंचकोश नीचे कर देखो, इनमो राम न जानी ॥ पंचज्ञानके पंच कर्म हैं, दस इंद्रि मानो ॥ चतुष्ट अन्तहकरण बखाने, इनमो राम न जानो ॥ कुर्मसेष किरकला धनंजय, देवदत्तहू देखो ॥ चौदा देव इंद्रिया चौदह, इनमें अलख न पेंखो ॥ तत पद त्वं पद और असि पद, बाच्य लच्छ ससु- झावे ॥ कहें कवीर सोईं गुरु पूरा, न्यारा कर बतलावे ॥ पं ❁
शब्द ३१०.—सब औगुनका सिर अभिमान । तेउ न मूढ तंज अज्ञान ॥ टे० राजस जग्य नृपतिने कीन्हे, सुर नर मुनि अचवे जलपान ॥ संख पंचायन तबहीं बाजे, सुपचभगत रस लीन्हों सान ॥ यही चूक चूके लंकापति, काटे शिर दशरथ सुत आन ॥
शब्दावली
(८७३)
दुर्घोषनके मेवा त्यागे, दासी सुत घर गये भगवान् ॥ झूठे बेर सेवरी के खाये, प्रेम प्रीत हित अपने जान ॥ शुक्रदेव मुनिसे को बड होई, इंद्री जीत विष डारो छान ॥ वैकुंठमें आदर नाही, कृपा भई न सुने गुरुज्ञान ॥ जोग जग्य व्रत तप कर संयम, चार वेद औ सुने पुरान ॥ कहें कवीर थीर नहिं लागै, जो लग संत नहीं पहचान ॥
शब्द ३११-धनहो धन्य बलखके मीरा । अपने जीव मुक्ति के कारण, सब तज भये फकीरा ॥ टेक ॥ तखतहु छोड दुलीचा छोडा, अंमारीके मीरा ॥ कोटन कोट खजाना छोडा लाल जँवाहर हीरा ॥ जाके पग हुरमनसे मलते, ऐसे नरम शरीरा ॥ बिन पादत्रान बन बन डोले, कसकत नहीं शरीरा ॥ सोरा सहस सहेलरि छोडे, खासा मखमल चीरा ॥ तुरी लाप अट्टारा छोंडे, लगा शब्दके तीरा ॥ धन्य तुम्हारे मात पिताको, जाके पिये तुम छीरा ॥ धन तेरी करतूत कमाई, धन तेरे गुरुपीरा ॥ ज्यों-हारिल लकरीको पकरे, यों मत गहिर गंभीरा ॥ कहें कवीर ऐसी लौलावे, साहेब हाल हजूरा ॥
शब्द ३१२-सुलतानसोबलकबुखारेका ॥ जाके खाना अजब सरहना, मिसरी कंद छोहारेका ॥ टेक ॥ जाकी सुरति लगी कदमसो; अछह पीर पियारेका ॥ जाके सेज फूलसो विछती, करते सुख तन सारेका ॥ अब तो घास बिछावन लागे, मुठी एक गलियारेका ॥ जाके संग कटक दल बादल, झंडा न्यारे न्यारे का ॥ माल सुलक तज लई फकीरी, धनसो कीन्ह विचारेका ॥ जो तनके चोला जोबनते, सवा टंक सब सारेका ॥ सो तो बोझ उठावन लागे, मन दस गूदर भारेका ॥ जासुख चीज नेवाला खाते, करते जीव अहारेका ॥ सो अब रूखा पावन लागे, टुकरा
(८७४)
कवीरपंथी
शाम शकारेका ॥ आदमसे होगये औलिया, एक शब्द निर- बारेका ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, फकर आद अखाडेका ॥
शब्द ३१३-दिवाने बंदे का गावे घर दूर ॥ टे० ॥ अनल हक हककर बोले, सूली दिया मनसूर ॥ सेख फरीद कुवामें लटके होगये चकनाचूर ॥ साह सुलतान बलख तज निकसे, छाँडे सोरहसौ हूर ॥ गोरख गोपीचंद भरथरी, शिरमें डारे धूर ॥ नानक नामा औ बाजिंदा, झिलमिल दरसे नूर ॥ खोजत खोजत उमर सिराने, ना पहुंचे रहे दूर ॥ या कलियुगके नर पाखंडी कबहुं न रहत हजूर ॥ इनके मनमें कुफर बसत है, मायाके मग हर ॥ गोरख काया खोज भुलाने, ना पाया भरपूर ॥ कहैं कवीर दया सतगुरुकी, सब घट दरसे नूर ॥
शब्द ३१४-अबहम सबही मध्य विराजे ॥ दोय दल जोर दिखावैं कौतुक, हम जूझें हम भाजें ॥ टे० ॥ हस्ती चीटी लख चौरासी, लघु दीरघ हत खेलें ॥ उत्पति परले खेल हमारा, आप पसा रस केलें ॥ त्रिभुवन सार सकल रसभोगी, घटघट हमरी पूजा ॥ सरग नरक दोउ खेल हमारा, हम बिन और न दूजा ॥ हमही देव असुर सुर राच्छस, हम ऋषि मुनि हम देवा ॥ हमही ठाकुर आप पुजारी, हम साहब हम सेवा ॥ अवनि अगिन जल पवन सुर शशि, हम जगसैं प्रगटाया ॥ कहैं कवीर तत दरसी जाने, कहेसे को पतियाया ॥
शब्द ३१५-मेरे जान मुझे न दिलसे भूल ॥ टे० ॥ डार डारमें, पात पातमें तुम्ही रंगीला फूल ॥ है हाजरको दूर बतावे, का नियरे का दूर ॥ मक्का दूढा मदीना दूढा तबहुं न मिलत रसूल ॥ स्याही गई सपेदी आई, कर चलनेका सुर ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, सब घट दरसे नूर ॥
शब्दावली
(८७५)
शब्द ३१६-साईका अरस तखत है दूर ॥ बिन सुरसद कोई भेद न पावै, भटक सुए सब कूर ॥ लाज छोड़ जिन काज किया है, भया कदमका धूर ॥ चौदा तबक खावकी रचना, ज्यों आतसका फूल ॥ जो निजके कोई समुझे बूझे, इसमें नहीं सहूर ॥ नासूतमें माया खड़ी, मलकूत गुन अस्थूल ॥ जबरूतमें जंजालह लाहूत अच्छर फूर ॥ हाहूतमें अर्चितपुर, बाजत अनहद तूर ॥ वेद पुरान कुरान कहिये, इहाँ लौं खबर हजूर ॥ सात सुन्न दोय बेसुन कहिये, दसो धाम निज मूल । ईछा सोहैं उहाँसो आये, घट घट व्यापक नूर ॥ कहैं कवीर हम खुदके अहदी, लाये हुकम हजूर ॥ सब रहनके दर्द जानके, संप्रथ वचन कबूल ॥
शब्द ३१७-जगतमें काहु न मन बस कीन्ह ॥ टेक ॥ भरथ खंडमें भरथ जोगी, भुग सुत मन हर लीन्ह ॥ ता कारन नर दोष लगाये, भरथ देह दोय दीन्ह ॥ सूखे पत्र पवन भस्व रहते, पारा सुरसे ज्ञानी ॥ तिनहुँ रूप देख बनिताके, कामकंदला ठानी ॥ शृंगीऋषी बन भीतर रहते, बिषै विकार न जाना ॥ पठई नार भूप दशरथने पकर अजोध्या आना ॥ पारबतीसी पतनी कहिये, तिनके मन क्यों डोला ॥ छकित भये शिव देख मोहनी, हाहा करके बोला ॥ सोरा सहस उरवसी जाके, ताका मन बौराना ॥ गौतम ऋषिकी नार अहिल्या, ताहि देख ललचाना ॥ नारद मुनिसे तपसी कहिये, कन्या हाथ दिखायो ॥ मांग्यो रूप भूपश्रीपतिको, स्वांग बंदरको लायो ॥ जमदग्नी जाके नारि रेनुका, जात जमुना जल भरने ॥ मोही देख भूपके मंदिर, छकित भये दोयनैने ॥ एकहि नाल कमलसुत ब्रह्मा, जग उपराज कहायो ॥ कहैं कवीर एक नाम भजन बिन, जिव बिसराम न पायो ॥
(८७६)
कवीरपंथी-
शब्द ३१८-अलख हमारे राजा जाके बाजत अनहद-बाजा ॥ टेक ॥ शंकरसे जाके जोगी कहिये, ब्रह्मासे ब्रह्मचारी ॥ सुर-पतिसे जाके सुरता कहिये, कृष्णसे औतारी ॥ सात समुंदर शायर कहिये, अनगिनती नदि नारा ॥ अठरा भार रोमावसि कहिये, गिरि परवतसे भारा ॥ भूपति एक महाबलि राजा, चहुँ दिशि फिरे दोहाई ॥ अनंत कोट करताके बागो, यहां प्रगटे ठकुराई ॥ तन बिन मेख तारबिन तंबू, ऐसा तंबूताना ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, तंबू माँहि समाना ॥
शब्द ३१९-पाछे समुझ परेगा भाई ॥ टेक ॥ इहाँ अहार उदरभर कीन्हें बहुविधि मांस कढाई ॥ जीव जंत बहु झटका मारे, यह लेखा सब जाई ॥ इहवाँ लूट खावत तुम परधन, गले फाँसरी लाई ॥ सात सिपाही आगे पाछे, पल पल खबर जनाई ॥ या जग आये राज कराये, पातुर भांड नचाई ॥ एक बुंदके कारन मेरे, कुलके धरम नशाई ॥ ईहां तो कीन्हें साधुकि निंदा सातो जनम नशाई ॥ पैग पैग जम कांटा गाडे, उलटा फाँस लगाई ॥ सांच कहाँ तो मारन धावे, झूठा जग पतियाई ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, भरम भूल दुनियाई ॥
शब्द ३२०-निगम सुत कोन ऋषी उबरे ॥ टेक ॥ प्रथमें ब्रह्मा विष्णु भुलाने, जननी सो बिगरे । सत्यभक्ति जाने बिन डुरलभ, कहु कोने उबरे ॥ नारद मुनि जो डुरमति कीन्हें, बन-चर रूप धर । पराशरऋषि कुहरा उपराजे, पुत्रीसों बिगरे ॥ आसन मार जंगलमें बैठे, वृच्छके चाम चरे । सो भगवान भोगके कारन, शृंगीऋषि बिगरे ॥ दूब अहार कीन डुरबासा, अन्नको त्याग करे । ममता जोर रहे कायामें, इंद्रसभा बिगरे । गुरुगनेश बुद्धिके सागर, शिवके पास खडे । चले अजोग जोग
शब्दावली
(८७७)
के कारण, नीरंजन बिगरे ॥ चौदालोक वेदको मंडल, जहां लग व्यास पड़े । सोरा खंड अच्छर भगवाना, उपजके बिनस मरे ॥ सत्राखंड पर अधर दीप जहां, शब्द अतीत खड़े । ताके आगे चार धाम है, रैन दिवस न टरे ॥ लोमस हंस मिले साहेबसों, चहुं जुग मुक्ति भरे, कहें कवीर सुनो मतिमंदा, सो हंसा उबरे ॥
शब्द ३२१-नानक ऐसा न्याय निवेरो । कलह कालकी ज्वाल न झंपे, मिटे भरमके फेरो ॥ टेक ॥ जो तन तंबू बहु विस्तारा, बिनही मेख लगाना ॥ महातत्त्वका लकडा गाडो, पांच सदर ले ताना ॥ जैसे घटा आवमें ढूबे बिन सीझेना बाजे ॥ पांच तत्त्वके मिश्रित लागी सहजे करत अवाजे ॥ जैसे जंत्री जंत्र बजावे, बाजे सोई बजावे ॥ वाजत है पर दीसत नाही, ताकौ कहा लखावे ॥ चाम महलमें बानी बोले, रूप सवाया रानी ॥ ना जानो यह कहाँसे आया, बिनसे कहाँ समानी ॥ तत है वितमें वित है ततमें, तत बित कहिये सोई ॥ पहले देखै ब्रह्म आरसी, दूजा धोखा होई ॥ कहें कवीर फकीर फिकर तज, न्याय सहित रहो भाई ॥ आवा जाई झूठ कल्पना, सहजे रहो समाई ॥
शब्द ३२२-मन हरना बड हुशियार एकदिन चोरवा आवेगा ॥ टेक ॥ तबल तीर तलवार वरछी, ना बंदूक चलावेगा ॥ आवत जात लखे ना कोई, घरमें दुंद मचावेगा ॥ ना गढ तोरे ना गढ फोरे, ना कछु रूप दिखावेगा ॥ नगरीसे कछु काम नहीं है, तुम्हें पकर लेजावेगा ॥ नहीं सुने फिरियाद सकल पुनि, ऐसा तस्कर आवेगा ॥ लोग कुटम परिवार घनेरे, खोजी खोज न पावेगा ॥ ऐसा है कोई संत विवेकी, नाम भजन गुन गावेगा ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, खोल किंवारी जावेगा ॥
(८७८)
कबीरपंथी-
शब्द ३२३—अन घडिया देवा कोन करे तोरि सेवा ॥ टे० ॥ घडे देवको सब कोई पूजै, जस भीतीका लेवा ॥ जाकी सकलो सृष्टि रची है, ताहि लहे ना भेवा ॥ को निरगुन को सरगुन कहिये को किरतम को करता ॥ आपमें सर्व सर्वमें व्यापक, सर्व मई होय बरता ॥ ब्रह्म विष्णु महादेव कहिये, तिनहुँको लागी टंकिया ॥ पूरन ब्रह्म अखंडित न्यारा, सो करता अन घडिया ॥ दस औतार निरंजन कीन्हा, सो करता ना होई ॥ वे तो आपन करनी भुगते, करता औरै कोई ॥ जोगी जती तपी सन्यासी, आप आप मिल मुडिया ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो, अलख लखै सो तरिया ॥
शब्द ३२४—ननदी जाहुरी महलनको, अपनो बीरन जगाव ॥ ॥ टे० ॥ बीरन जगाये ना जगेरी, लग न सके कछुदाव ॥ काया गठमें भई अंधियरिया, कोन करे वाके भाव ॥ भरमके ताला लगे महलमें, कीमत कुंजी लगाव ॥ कपट किवारिया खोलके तुम, या बिधि पियको रिझाय ॥ भक्ति घाघरा चित्त चुनरिया, चोली चाल सियाव ॥ कर्म मसीकी काजर करले, या बिधि पिया को रिझाय ॥ ज्ञानके दीपक कर गह लीजे, बातीबार लगाव ॥ ततको तेल डार दीपकमें, मगन मसाल जराव ॥ सुरतिके बिजनी करगहि लीन्हा, सेवा सेज बिछाव ॥ शीतल चँवर दार प्रीतमपर, प्रीति पिछोर उठाव ॥ बारंबार मिले नहीं या तन, भूल कोई मत जाव ॥ कहत कमाल कबीर के बालक, फिर ना मिले ऐसो दाव ॥
शब्द ३२५—काह भये मुखराम कहेसे ॥ टे० ॥ अंतर कपट बचन मुख चातुर, अति अधीन होय मनन कियेसे ॥ जैसे भुजंग ओट टाटीके बहु जीवनको हतन कियेसे ॥ जैसे बधिक
शब्दावली
(८७९)
ओट टाटीके बहु जीवनको हतन कियेसे कहें कवीर वाके संग न करिये, बिनती विवेक जिन भेख लियेसे ॥
शब्द ३२६-मोको कहाँ दूँठे बंदे मैं तो तेरे पासमें ॥ टेक ॥ ना मैं बकरी ना मैं चिकवा, ना मैं डुरी गड़ासमें ॥ ना हों मैं खाल पूछमे, ना हड्डी ना मासमें ॥ ना मैं मिलों जोग तप कीन्हें, ना बिराग संन्यासमें ॥ खोजी होय सो तुरत मिलावे, पलभरके तल्लासमें ॥ ना देवलमें ना महजिदमें, ना काशी कैलाशमें, ना मैं आऊं अवध द्वारका, मैतो सांचे आसमें ॥ मैं बसता सैरतमें तेरी, मेरी पुरी मवासमें ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, सब स्वासनके स्वासमें ॥
शब्द ३२७-गाफिला क्यों बिसराया घनी, तेरी सुंदर काया बनी ॥ टेक ॥ काल करंते आजुई करले, आजु करंते अबही ॥ शिरपर तेरा काल खडा है, सुरक जात जस आनी ॥ धीरे धीरे पाँव उठावो, सिद्धिया है अति घनी ॥ या तन तेरी खास मिलेगी, कीरति रहेगी बनी ॥ या भौसागर अगम भरा है, नाव लगी अति झीनी ॥ गुरु मुख गुरुमुख पार उतरगये, निगुरा बूडे अनी ॥ बालापन तरुनापन बीते, देखलेव दरपनी ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, भली बिसाहन बनी ॥
शब्द ३२८-खबर नहीं जगमें पलकी । सुकृत करले नाम सुमिरले, को जाने कलकी ॥ टेक ॥ कौड़ी कौड़ी माया जोरी बात करे छलकी ॥ पाप पुन्यकी बांध पोटरिया, कैसे होवे हलकी ॥ तारन बीच चंद्रमा झलके, जोत झला झलकी ॥ एक दिन पंछी निकस जायगा, मट्टी जंगलकी ॥ मात पिता परिवार भाई बंधु, तिरिया मतलबकी ॥ माया लोभी नगर बसत-
(८८०)
कवीरपंथी-
है, या अपने कबकी ॥ या संसार रैनका सपना, ओस बुंद झलकी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, बातें सतगुरुकी ॥
शब्द ३२९-महेरम होय सो लखि पावे, संतो ऐसा देश हमारा ॥ टेक ॥ बेद किताब पार ना पावे, कहन सुनन सो न्यारा ॥ जात बरन कुल किरिया नाही, संध्या नेम अचारा ॥ बिन घन वादर बिजली चमके, बिन सूरज उजियारा ॥ बिन नैनन जहां मोती पो है, बिन सुर सबद उचारा ॥ जैसे बुंद परे दरियामें, ना मीठा ना खारा ॥ सुन्न सिखरपर गजल संगीता, किंनरी बीन सितारा ॥ जो जो गये ब्रह्म तेहि दरसे, गहुअच्छर तत सारा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो पहुँचे गुरुका प्यारा ॥
शब्द ३३०-संतो मूलन बेटा जायो, जिन खोज कुटुम्ब सब खायो ॥ टे० ॥ जनमत खाई ममता भाई, दुख सुख दोनों भाई ॥ पाप पुन्य पारोसी खाये, ओ तृष्णासी दाई ॥ काम क्रोध दोय काका खाये, मन अभिमानी मामा ॥ मोह नगरके राजा खाये, तब पहुँचे सुखधामा ॥ हम बड़ दादा तुम बड़ दादू, देखतही मन मूवा ॥ आनंदरूप बधाई बाजे, तब वह बालक हूवा ॥ ज्ञानी नाम धरे लड़काको, उनकी महिमा गार्ई ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सुखमें रहो समाई ॥
शब्द ३३१-हंसा उड़ चल आपन देश, प्रीति पुरानी भयली नारे ॥ टे० ॥ हंसा सिंगलदीपके, उड़ि आये यदि देश ॥ बेघे मोती ना चुगे, हीडे आपन देश ॥ उड़ हंस कोदवारी लागे, मूरख विडारे जाय ॥ अरे अरे मूरख बावरा, कही कोदवा हंस न खाय ॥ ना हंसाके खेती बारी, नहीं बन जावै पार ॥ अन-बेघे मोती चुगे, सो पुरवे करतार ॥ शशि झंपे दरियावमें, मीन चढ़ी अकाश ॥ जानेगा कोइ संत जौहरी, कहैं कवीर कोइ दास ॥
शब्दावली
(८८१)
शब्द ३३२-जो कोइ निरगुन झर लख पावे ॥ टे० ॥ निर- खत कूप कूप बिन वारी, बिन कर रहट चलावे ॥ जल बिन शीश शीश बिन वारी, सो जल आन पियावे ॥ बिन करताल पखावज बाजे, बिन रसना गुनगावे ॥ गावन हारके रूप न रेखा, सो पद आन मिलावे ॥ कदलीपत्र जहर जंगलमें, बिन गुरुके नहीं खावे ॥ उठत सनेह मरमना पावे, आगमके गोह- रावे ॥ जोगी जती तपी संन्यासी, नाहक भेख बनावे ॥ बिना नामके भौरा घूमै, सुख सपने नहीं पावे ॥ पुरहन पत्र बसे नित दाडुर, सोऊ सवाद न पावे ॥ कमल कलीके भौरा लोभी, सौ जोजन उडजावे ॥ काजी हाथ किताब न आवे, मुलना बांग न भावे ॥ वेद पुरान विप्र ना भावे, राजा राज न भावे ॥ कर बिन कलम कलम बिन कागद, बिन मसि अंक बनावे ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, सतगुरु मिले लखावे ॥
शब्द ३३३-संतो समुझैका मतन्यारा, जो आतम तत्त्व बिचारा ॥ टे० ॥ औरनसो कहें आपा खोजो, आप अपन ना जाने ॥ मुख कछु आन हिये कछु आना, कैसे राम पहिचाने ॥ औरनसो कहें मोह न कीजे, निरमोही होय रहिये ॥ माया मोह सकल आपहिमें, या दुख कासो कहिये ॥ औरनको कहे तजो बडाई, आप बडाई चावे ॥ जोर बडाई छूटत नाही, झीना पीर कहावे ॥ औरनसो कहें पछ न कीजे, आपा पछ न छूटे ॥ कहन सुननको साधु कहावे, सांच कहे रिस छूटे ॥ जौ लग राग द्वेष मन माहीं, अस्तुति निंदा भावे ॥ तब लग तोनों ताप ना छूटे, कहा भये बहुगावे ॥ पद सारखी औरन समुझावे, आपा समु- झत नाही ॥ कहें कवीर राम क्यों दूरसे, मैं तैं छूटत नाही ॥
शब्द ३३४-करोरे बंदे वा दिनकी तदबीर ॥ टे० ॥ लाल
(८८२)
कबीरपंथी—
खंभपर देत ताडना, सहि न सके शरीर ॥ मारमार सुगदर प्राण निकासे, नैनन भर आवे नीर ॥ रंगमहल एक कामिनि वैठी, कर शृंगार गंभीर ॥ दुनियाँ दौलत महल संग न जात शरीर ॥ भौसागरके राह कठिन है, नदिया अति गंभीर ॥ नाव न बारे लोग घनोरे, खेवनवाला बे पीर ॥ जब जमराजा पकर मँगावे, पाँयन परे जंजीर ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, अब ना करू तकसीर ॥
शब्द ३३५—नाम गत पार न पावे कोई ॥ टे० ॥ मच्छ कच्छ बाराहौ मर गये, नरसिंह रूप जो होई ॥ परशराम बलिबावन मरगये, कहो कहा कह रोई ॥ रघुबर मरे मरे वे दशरथ, भरथ शत्रुहन दोई ॥ रावन मार बिभीषण थापे, उनहूके लक विगोई ॥ जडुपति मरे मरे डुर्योधन, एक रात ना होई ॥ पाँच पंडवा सिद्धे हिमाले, मुक्त कहो नरलोई ॥ अंमरीष औ व्यास परी- च्छित, मरत देर ना होई ॥ अज फल खाये धनंतर मर गये, तिनहूकी सुदबुद खोई ॥ कहें कवीर सुनो नर भोंड़, तुमरी कौन गत होई ॥ उपजत विनशत जुग चारों गये, रहत न देखा कोई ॥
शब्द ३३६—जुगवे निशवासर जोग जती ॥ टे० ॥ जैसे ब्रह्मा वेदको जुगवे, शिवको जुगवे पारबती ॥ जैसे सुनार सोनाको जुगवे, घटन न पावे पाव रती ॥ जैसे नार पुरुषको जुगवे, बरत अगिन हो जात सती ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, का गजा- का छत्रपती ॥
शब्द ३३७—बैरागी रामारे मगन फकीरी तेरी पूरी ॥ टे० ॥ हाथ कमंडल बगलमें सोटा, चारों मुलक जगीरी ॥ दिल अंदर दीदार करोगे, आठों, पहर हजुरी ॥ रूखा सूखा साग अलोना
शब्दावली
(८८३)
टुकरा, राखत सदक सबूरी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, जोगियाको जुगत जहूरी ॥
शब्द ३३८—जग देखा ठाठ तम्बूरेदा । पाँच तत्त्वका बना तँबूरा, त्रिगुन तार सहूरेदा ॥ टे० ॥ बाजत है पर दीसत नाहीं, इस मनही सहूरेदा ॥ टुट गये तार उखड गई खूँटी, मिल गये धूरम धूरेदा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, साहेब हाल हजूरेदा ॥
शब्द ३३९—सौदा कर सोई जाने, कायागढ खूब बजार ॥ ॥ टे० ॥ या काया गढमें हाट लगी है, लालच लोभ दलाल ॥ या काया गढमें हीरा मोती, परखेगा परखनहार ॥ या काया गढमें काजी मुलना, निशदिन करत पुकार ॥ या काया गढमें धनी विराजे, तूनेके ओट पहार ॥ या काया गढमें सात सखुंदर, कोई मीठा कोई खार ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, गुरु बिन जग अंधियार ॥
शब्द ३४०—मेरा दिल साहेब जाने गुदरिया गलतान ॥ टे० ॥ पांचतत्त्वकी बनी गुदरिया, परी रहै मैदान ॥ अच्छे वृच्छ तर आसन मारा, गुरु मूरतको ध्यान ॥ अर्थ उर्ध्व बिच डोरी लागी, अनहद चढी कमान ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, पाया पद निरबान ॥
शब्द ३४१—चितवत चितवत नैन दुखित भये, अजहूँ न आये साजनवा ॥ टे० ॥ निहारे बार अपार भई, सखि छूटो शिंगार सब दरपनवा ॥ पियाकी सोच रमोरी मनमें परी, सखि नीको न लागे जेवनवा ॥ एक पग ठाढी तोहे मनाऊं, ठाढी पछताऊं सखि आंगनवा ॥ धरमदासकी अरज गोसाईं, गावत पद सखी निरगुनवा ॥
(८८४)
कवीरपंथी-
शब्द ३४२-ना कीन्हहा तैने हरिका सुमरन, सब दिन यो ही गयेरे ॥ टे० ॥ बालापन तो खेल गमाये, अबतो तरुन भयेरे ॥ बृद्ध भये कफ वायने घेरे, दुख नहीं जात सहेरे ॥ चार पहर धंधेमें खोये, अबतो सांझ भयेरे ॥ का गफलतमें सोता प्रानी, संगी निकस गयेरे ॥ मूंड मुंडाये जटा बढाये, जोगी राज भयेरे ॥ परमारथकी राह न जानी, अध बिच लटक रहेरे ॥ सुंदर देह देख मत भूलो, नाहक भार भरेरे ॥ कहै कवीर सुनो भाइ साथी, तेरी जननी बोझ मरेरे ॥
शब्द ३४३-सखी सुन सतगुरु तान, नींद नहीं आती बिरहा-पर सूरति गयी पछारे खाती ॥ टेक ॥ सखी हिरदे भयो अंधियार भरमकी राती ॥ सखी बिना नाम अंजार होत कस पाती ॥ सखि नैन सैनसे खोज पिया दूँदलाती ॥ सखी पिया मिले सुख चैन नाम गुन गाती ॥ सखी मान सरोवर चल हंसनके पांती ॥ छबि देखत भये निहाल काल पछताती ॥ सखी जरा मरनके बात सबे मिट जाती ॥ जो धर्मनि कहै पुकार सीप मिल स्वाती ॥
शब्द ३४४-सोला कला मन विचार देखो पद पावे निरबानी ॥ टे० ॥ पहिले कलामें, बुंद डारदै दूजै धूर जमाई ॥ तीजे कलामें अंग फरुके चौथे मिट्टी बनाई ॥ पांचे कलामें पांचों मिल गये, आठे आगम जानी ॥ नवे कला नौखंड विराजे, दसपैंदस दरवाजा ॥ इग्यारहें कलामें साहेब राजी, बारह बाजत बाजा ॥ तेरह कलामें तिरगुन मिल गये चौदसजासी ॥ पूनो व्याला पूरन पाये, कहै कवीर अविनाशी ॥
शब्द ३४५-बाबा कवीर गुरु पूरा है ॥ टे० ॥ पूरे गुरुके जाउँ बलिहारी, जाका सकल जहूरा है ॥ सबमें व्यापक सबते
शब्दावली
(८८५)
न्यारा, हरदम रहत हजूरा है ॥ स्वेत ध्वजा फहरात गगनमें, बाजत अनहद तूरा है ॥ नाम कवीर जपे जन सूरा, नानक चरनके धूरा है ॥
शब्द ३४६-कर नैनो दीदार महलमें प्यारा है ॥ टे० ॥ नौ दरवाजा परगट दीसे, दसवां द्वारा मुंद कुलफ जडतारा है ॥ उलट सर्पनी गगन सँवारे, षट्चक्रकी सोध विचारे मेरु डंडपर सीधा पवन दो धारा है ॥ चंद सूर दोउ एक घरलावे, सुषुमन सेती ध्यान लगावे, तिरबेनीके घाट उतर भौपार है ॥ गगन मँडलमें उर्ध सुख कूवा, सूरा होयसो भरभरपीवा, निगुरा जात पियासे, हिये अंधियारा है ॥ नेती धोती वस्ती पाई, आसन पवन जुगत ठहराई, गम घोडा असवार, भरमसे न्यारा है ॥ शब्द विहंगम चाल हमारी, कहें कवीर सतगुरु ले तारी, खुल-गइ भरम किंवारी, सार शब्द झनकारा है ॥
शब्द ३४७-जबसे मन परतीत भई । मेरे गुरुने सजीवन मूरदई ॥ टे० ॥ दिन दिन औगुन छूटन लागे, बाढन लागी प्रीति नई ॥ पावे दाव भाव बन आवे, मिलगये सतगुरु साहेब सही ॥ सुरति निरति दोय ज्ञान जौहरी, निरख परखके वस्तु लई ॥ थोरे बनज लाभ भो भारी, उपजन लागे लाल मई ॥ मानकपुरमें मोती उपजे, हीरा नगसो भेट भई ॥ आगम निगम नित खोज निरंतर, गुरुने नाम निज वस्तु दई ॥ सुखसागर असनान जो करले, स्वात बूंद सो भेट भई ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, हती विकार सो दूर गई ॥
शब्द ३४८-बालापन वांके बतिया हँसा सुध करो ना ॥ टे० ॥ दसो दिशाके गम जहां नाहीं, संकट परे दिन रतिया ॥ बार-बार तुम कौल किये हौ, बसुधामें करव भगतिया ॥ गरभहिसे
(८८६)
कवीरपंथी
बाहिर प्रभु कीन्हा, माया घरे दूनों अंखिया ॥ पांच पचीस कंठ चढ बैठे, परले तू मौज लफसिया ॥ बालापन बलहीमें बीते, तरुनीमें कडके छतिया ॥ काम कोध दस इंद्री जागे, ना सूझे जात न पतिया ॥ अंतसमें में जान परी है, जब जम घरे डुर- रिया ॥ देवा देवी एको ना लागे, झूठी होवे जड़ियासे बुटिया ॥ केसो दुख समुझके गावे, गुरुजीसे करे बिनवतिया ॥ श्याम बिहारी समुझके चेतो, अंतमें कोऊ ना संचतिया ॥*
शब्द ३४९ तुम कौन हो मियां कहाँके ॥८०॥ कहाँसे आये कहाँ जावोगे, किनने भेजा कौन काम है, नई नगरिया झाँके ॥ आतेही तुम रोय दिया, का लायेथे सो खोय दिये, किस जिंग- रमें हो किस फिकरमें हो, आंखें खोलो का ढाँके ॥ वतन तुम्हारा कौन ठामहै, बड़ा शहर वोहै कोई गाम । उत्तर दखिन पूरव पश्चिम, नैरितके हो ईशानके ॥ आये हो इस नगरीमें, कुछ मौज साईका सुख देखो. अब ऐसी ना कीजिये, ना ईहांके हो ना उहांके ॥ हिंदू या मुसलमीन हो, दुनियां द्वार फकीर नदान, कहें कवीर सुनो भाइ साधों, तिरछे हो के वाँके ॥
शब्द ३५०—हम तो सदा बने रंगलाल । लंडी दौलत का है पाल ॥८०॥ चार खूंट जागीर हमारी, गल बिच तुलसी माल ॥ काम धाम सब लिया बगलमें, कोई न पावे हाल ॥ अन जल आटा सब कुछ मिलता, घी गुड़ चावल दाल ॥ बहुत खजाना पास भरा है, देता है गोपाल ॥ खुसीसे भिक्षा लेते है हम, नासिर फोरी चाल ॥ साई खातर लिया फकीरी, झूठी माया जाल ॥ दया धरम कुछ करले बंदे, निकल जायगी खाल ॥ जितनी संपत् उतनी बिपत, नाहक बजावे गाल ॥ सत्तनामका दिया है डंका, हाथ जोड़ता काल ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधों, लगा भजनका ढाल ॥
शब्दावली
(८८७)
शब्द ३५१-कोन गुरु कालसो बांचे । जोतसरूपी नाथ बनाये, तामो सब नाचे ॥ टे० ॥ इच्छा सुरती जपते उपजी, भई जगत कांचे ॥ सत्तर जुग गये एक पलमें, ताही ब्रह्मा राचे ॥ कर षट् दर्शन चार संपदा, सब जगको बांधे ॥ एकइस पुरी अखंड बसुधा, को कहु कैसे नाधे ॥ दान पुन्यका बड़ा भरोसा, या जुगमें सांचे ॥ पंडराजसे को बड़ दानी, दुंदकाल महीं फांसे ॥ केवल ब्रह्मको सबे भुलाने, चले जोत जांचे ॥ अंधधुंधमें सुरति भुलाने, फिर भागे पीछे ॥ घाटे घाटे चौकी वैठी, कठिन काल आसे ॥ शब्द बिना कोई जान न पावे, ताहि पकर तरासे ॥ जोतके आगे सतगुरु साहेब, अजर अमर सांचे ॥ कहैं कवीर हम आवें जावें, हंस लिये साथे ॥
शब्द ३५२-कोई सफा न देखा दिलका । कहीं कुत्ता कहीं बकुली देखा, कहीं साप देखा बिलका ॥ टे० ॥ कहीं पंडित कहीं काजी देखा, सुलना देखा अकिलका ॥ कहीं पूरब कहीं पश्चिम देखा, उत्तर देखा दक्षिणका ॥ ऊपर मनसे कथनि कहत है, भीतर गोला पथरका ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, एही हाल खिलकतका ॥
शब्द ३५३-काया नगरीमें कोनसा पुरुष ॥ टेक ॥ आपहि गरजे आपहि बरसे, आपहि पवन झकोरता फिरत ॥ आपहि माली आप बगीचा, आपहि कलियां तोरता फिरत ॥ आपहि तखरी आपन राजी, आपहि सब जग तौलता फिरत ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, आपहि घट घट बोलता फिरत ॥
शब्द ३५४-मेरा हीरा हेरागये कचरेमें ॥ टेक ॥ कोई पूरब कोई पछिम बतावे, कोई बतावे पानी पथरेमें ॥ पंडित वेद पुरान बतावे, उरझ रहे जग झगरेमें ॥ सुर नर मुनि और पीर
(८८८)
कवीरपंथी-
औलिया, भूल गये सब नखरेमें ॥ धर्म दास गुरु हीरा पाये, बांध लिये निज अँचरेमें ॥
शब्द ३५५-गरीबी है सबमें सिरदार ॥ टे० ॥ उलटके देखो ज्ञान गरीबी, जाकी पैनी धार ॥ भौ भंजन सुखदायक जनको, कहर बिडारन हार ॥ सतयुग त्रेता द्वारा कलियुग, परले टारन हार ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, हंस उबारन हार ॥
शब्द ३५६-छकोरे मन गगन गली, जहाँ बजत बीन सुर झीनी ॥ टे० ॥ रुनक झुनक अनहद झुन गरजे, झिलमिल दरसे जोती ॥ बिन बादल जहाँ बिजली चमके, वरषत हीरा मोती ॥ अधर देहरा अधर पुजारी, अधरे सकल बनाया ॥ अधर बैठ मन निहचल कीजे, ब्रह्ममें जीव समाया ॥ स्वेत सिंहासन स्वेत छत्र सिर, स्वेत ध्वजा फहराई ॥ हरो लाल पीरो असमानी, बहुरंगी दरसाई ॥ साहब मोमें मैं साहबमें, झिल मिल दरसे नूर ॥ कहें कवीर दया सतगुरुकी, बैठे हाल हजूर ॥
शब्द ३५७-मेरे दिलदा सौख फकीरी । धन सतगुरु उपदेश दियो है, सुरति भई मेरी थोरी ॥ टेक ॥ सुन्न सिखर पर गजल संगीता, रहता सत्त सबूरी ॥ सत्त अवाज करो दरगाहमें, भिछा मिले भरपूरी ॥ पांच उमराव हजूर बंदगी, आठो पहर उजीरी ॥ अजब ख्याल देखा दरगाहमें, बाजे रबाब नफीरी ॥ काम क्रोध दोनों दल जीते, हठ आसन तत सीरी ॥ सब घट साहेब समकर जाने, ऐसी रहन गंभीरी ॥ मांगो न भीख डरो ना, दो मेरे दिलकी सीरी ॥ कहें कवीर दया सतगुरुकी, सहज भई घर मेरी ॥
शब्द ३५८-तरे कायामें गुलजार, बागों मत जा रे ॥ टेक ॥ मन माली परमोधके, संजमकी कर बार ॥ दया पौद सूखे नहीं, क्षमा शील जड़ डार ॥ करनी कयारी बोइये, रहनी कर रखवार ॥
शब्दावली
(८८९)
दुरमतिका गढ ढायकै, देखो अजब बहार॥ चित्त चमनके बागमें, फूलरही फुलवार॥ मुक्ति कली सदा खिलरही, पहिर गुंज गल- हार॥ अष्ट कमल दल ऊपरे, शोभा अगम अपार॥ कहै कवीर चित्त चेतियो, आवागवन निवार॥
शब्द ३५९-संतो सुनत ज्ञान गलताना । अब सो पद पढ़ि समाना॥ टे० ॥ अगम भूमिसों सतगुरु आये, रूप धरे कुरमाना॥ दूंदत ऊंट महलमें डोले, बूझत साह बिहाना॥ या तो महल हमारा है रे, तै पंथी कित आना॥ दूजे रूप खवास धरे जब, फूलन सेज बिछाना॥ कोडा तीन मार तिन खायो, मारत चोट हेवाना॥ कहै खवास सुनो इब्राहिम, कैसे खलक पत खाना॥ एक घडी सेज्यापर पौढे, तनकी चाम उडाना॥ हेत हुशन सब दूर हुये हैं, दरस तखत हीराना॥ गैव खवास भये तिहिं वारी, कंपन लगे पराना॥ उत्तरी चारी भई फकीरी, फारा तोसे खाना॥ मखमल खासा दूर बहाये, अलफी पहिर निमाना॥ सोला सहस सहेली छांडी, अठारा लाख तुराना॥ सतगुरु शब्दे लई फकीरी, हरखित तजे निशाना॥ हीरा मोती मुक्ता त्यागे, अरबों खरब खजाना॥ सत्तर खान उमराव बहत्तर, तजे अमीर मस्ताना॥ मेवा पान मिठाई त्यागे, अमृत भोजन खाना॥ नंगे पैरों भये पयादे, इब्राहीम सुलताना॥ चढ़त गयंद इंद्रके नाई, सूरज अस्त छिपाना॥ सेना सकल भीर दल बादल, गरद उडे असमाना॥ दसों दिशा मक्काको फेरा, चरणों बांध कुराना॥ दास गरीब कवीर पुरुषने, अमर किये सुलताना॥ ❁
शब्द ३६०-अवधू जोग अध्यातम जोई । एकै ब्रह्म सकल घट दरसे, और न दूजा कोई॥ टेक॥ प्रथम कमल जान चतुरदल, देव गनेसको बासा॥ रिधि सिधि दोय संग उपासे, जाप छैसो