कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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मन अस्थिर ॥ विषय वासना छूटी तत्पर ॥ मोतीदास कहैं धनधन सतगुरु उलट अभी पी पायो निजघर ॥ सत्यनाम सोई है निज सारवा ॥
शब्द ३०३-मनुष तन पायके तुस । भजलो सिरजन हार ॥ टे० ॥ कैसे रहे अचेत कबै फिर औसर पैहो ॥ फिर न मिले ऐसो दाव, बहुर पाछे पछतैहो ॥ लखचौरासी जियाजूनमें, मानुष जन्म अनूप ॥ ताहि पाय चेतत नाहींरे, कहा रंक भूप ॥ गरभ बासमें कौल किया मैं, भजिहौं तोही ॥ निशदिन सुमरों नाम, कष्टते काढो मोही ॥ एकनामको जानके, रहों नाम लौलाय । नेक न तोहि विसारिहौं, या तन रहे की जाय ॥ इतना किया करार काढ प्रभु, बाहर कीन्हा ॥ भूल गये वह बात भये माया आधीना ॥ भूली बतियाँ वा दिनकी, आय गई मत आन ॥ बाराबरस तो ऐसे बीते, खेलेत फिरत नदान ॥ तरुनापन जब लगा, देह जोवन मदमाता ॥ चलत निनारे छाँह, तमकके बोले बाता ॥ चोवा चंदन लायके, पहिरे बसन बनाय ॥ गलियारे झाँखत फिरे, परत्रिया देख मुसकाय ॥ तरुनापन गये बीत, बुढापा आय तुलानो ॥ कंपन लागे शीश, चलत दौय चरन पिरानो ॥ नैन नासिका चूवन लगै, मुखसे न आवै स्वास ॥ वात कफने घेर लिया है, छूट गया तन आश ॥ माता पिता सुत नार, कहो काके संगलागी । तन मन धन बरजत नहीं, कामिन होत सुभागी ॥ एकदिन काल गरासई, परिहो जमके दाव ॥ बिन सतगुरु ना बाँचहूँ, कोटन करो उपाय ॥ सुफल भई या देह, नेह साहेबसो कीजै ॥ सतगुरु दाता आहि, मुक्तपद उनसे लीजे ॥ सुफल भई मनकामना, सुमरन लागे पीर ॥ यह लीला है मुक्तिकी, गावे साहेब कवीर ॥