कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
चंगे, कोइ दिन तोरे तानरे ॥ कोइ देवल कोइ दिन महजित ॥ कोइ दिन बाग बगीचा बाडी, कोइ दिन रहे वृक्षकी छाँहीं ॥ कोइ दिन रहे मैदानरे ॥ हिलमिल रहना देखे खाना ॥ नेकी बात सिखाते रहना ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, जपना निर- गुन नामरे ॥
शब्द ३०१—मारगमें लूटे पांच जनी ॥ टे० ॥ पांच पचीसने रोके बाटा, साधू चढगये औघटघाटा जाय लिया उन उबट बाटा, जो न उबारो आप धनी ॥ आशा तुज्जना नदिया भारी, बहिगये संत बडे ब्रह्मचारी ॥ जो उबरे सो शरण तुम्हारी, शिर- पर चमके सेल अनी ॥ संकट लूटे नेजाधारी, उनकी रहयत कोन बिचारी ॥ त्रिदेवा लूटे सब झारी, चमके निरगुन तीन अनी ॥ बनमें डसलिये मुनिजन नागा, डसलियो ममता उन उठ भागा ॥ जाके कान गुरू ना लागा, शृंगीऋषि सो आन बनी ॥ मारग बांका पथ दुहेला, रामानंद कीन्हें तहँ मेला ॥ साहेब कवीर देत जहाँ हेला, सुनिये सिरजन आप धनी ॥
शब्द ३०२—देखके मगन भये गगन बहारवा ॥ टे० ॥ रतन- सिंहासन पुरुषबिराजे, कोट भानु छबि निरखत लाजे ॥ माथे क्रीट मनोरथ राजे, चात्रिक भई लख दरस अपार वा ॥ विन- पग निरत होत जहाँ रुमझुम, घुंघुर बाजे छुमछुम ॥ ताथेइ ताथेइ नाचे ठुमठुम, तबला बाजे गुमगुम ॥ उठत राग छत्तीस उचरवा ॥ अरर अरर जहाँ अरबी बाजे, झरझर झरझर झालर साजे ॥ किडधो किडधो नौबत गाजे, शब्द सुहावन मुरली बाजे ॥ सहनाई सुर बजत विशालवा ॥ भरो अमोलक अमी- सरोवर, पीवत हंसा करे कुतूहल ॥ लगी सुधा जहाँ झुरझुर झुरझुर ॥ मन भौरा जहाँ करत गुंजारवा ॥ लीला देखि भयो