कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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लीन्हा ॥ अच्छी राह ताहि ना चीन्हा । अब का सोता गाफल खाट ॥ चंचल मनका घोड़ा कीन्हा । ज्ञान लगाम ताहि दै दीन्हा ॥ होय होशियार बाग गहि लीन्हा । भौसागरके चौडा पाट ॥ मित्र कुटम कोई ना तेरा । यह सब है स्वारथका बेरा ॥ यहां नहीं तेरा निहचल डेरा । इनसे चलना वेग उचाट ॥ मग-माँही ठगवाग लगाया । वह तंबूसा छप्पर छाया ॥ औरनको ठग लड़डू लाया । मार लिया स्वादोंका घाट ॥ तन सरायमें मन अरुझाना, भटयारीके रूप लुभाना ॥ निश वासरसो मनमें दीन्हा । सौदाकर सतगुरुकी हाट ॥ कहै कवीर दयासे पावे । अपनो ज्ञान तोहि समुझावे ॥ तेरे भलेकी राह जनावे । जम कूचलकी पेंच न आवे ॥ बार-बार कहो तोसे डाट ॥
शब्द २९९-मन नेकी करले दो दिनका मिजमानरे ॥ टे० ॥ जोहू लडका कुटम कबीला, दो दिनका तन मनका मेल ॥ अंतकाल उठ चला अकेला तज माया मंडानरे ॥ कहाँसे आया कहाँ जायगा, तन छूटे मन कहाँ समायगा ॥ आखिर तुझको कौन कहेगा, गुरु बिन आतम ज्ञानरे ॥ कौन तुम्हारा सच्चा साई, झूठी है यह सकल सगई ॥ कहाँ सुकाम कहाँ ठिकाना, का बस्ती का नामरे ॥ रहट माल पनघट जो भरता ॥ आवत जात भरा औ रीता, जुगन जुगन तू मरता जीता ॥ क्यों करता अभिमान रे ॥ लाख चौरासी छेखे तासा, ऊंच नीच घर लेता बासा ॥ कहै कवीर सुनो भाइ साधो, जपना गुरुका नामरे ॥
शब्द ३००-मन मौला जाने गुजर गई गुजरानरे ॥ टे० ॥ कोइ दिन रूखा सूखा रांधा । कोइ दिन दूध मलीदा छांदा ॥ कोइ दिन पत्रपरायल कांदा । कोइ दिन रहै हैरानरे ॥ कोइ दिन शाल दुशाला अंगे, कोइ दिन फाटेनंगे ॥ कोइ दिन खासे रंगे