कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
रत नाहिं बिडारे ॥ तन कर बारी मन कर बिझुका, गुरुका शब्द रखवारे ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, मानो शब्द हमारे ॥
शब्द २९२—पतिबल जनके मोह निवारे छाडो दुख जंजाल सुमतिधर, माया मदहिं विसारे ॥ टेक ॥ मोह तजे निरमोही होवे, मोह फंद सब टारे ॥ तजे प्रपंच जोग तब पूजा, तीनों ताप संभारे ॥ तीरथ बरत प्रतिमा अस्थापन, डिभ कपट सब जारे ॥ तज प्रपंच विकार बाजी सब, जंत्र मंत्र विकारे ॥ विद्या वेद पुरान नाद मद, छंद बंद निरवारे ॥ नट नाटक तज भगति अराधे, तीनों पछ उबारे ॥ चार अचार वरन आश्रम तज, केवल भक्ति सुधारे ॥ कहैं कवीर सतगुरु बल बांचे, उतरि जास भौ पारे ॥
शब्द २९३—अपना काम संभारो भाई । सतगुरु शब्द गहौ चितलाई ॥ टेक ॥ मन औ काम कालके फंदा, एही फंदो संसारा ॥ विरला संत कोउ काम संभारो, पहुंचे लोक मंझारा ॥ नारी अपनी नार पराई, नार नार सब एका ॥ अपना नार दोष कहु नाहीं, सुकित करो विवेका ॥ नार पराई अपनीकै देखै, सो नर पार न पावै ॥ पूरे ठीक पिंडसे छूटे, चौरासी भरमावे ॥ नार पुरुष हमहीं रच लीन्हा, जीवन जुगन बँधाय ॥ कहैं कवीर कोई संत विवेकी, तनके काम बहाया ॥
शब्द २९४—तेरी काया मद्धे सार । सतगुरु पाया दीन दयाल ॥ टेक ॥ इस बोलतेका खोज करना, जीवतेही उल्टा मरना काहे को जमंडंड भरना ॥ उत्तर पैलै पार । महलकी जब सुधपाई, चीन्ह लीन्हा प्रान भाई ॥ अनंत मूरत दिष्ट आई, होगये निह-चल मिटे दुचितार्ई ॥ ऐसा तत्त्व बिचार ॥ कंद भीतर नाद गाजे ॥ जरा मरन उपाधि भाजे ॥ सुन्न महलमें उनमुख साधे ॥