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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(८६५)

पावे पद निरवान ॥ ये तीनों है जमकी बाजी, अगम पंथ बैठे अविनाशी ॥ कहें कवीर सुन गोरख जोगी, चीन्ह ता निज-सार ॥

शब्द २९५-साहब ऐसा अपरंपार जाका सत्यशब्द आधार ॥टेक॥ ब्रह्मा जाको खोजत धावे । वेद किताब पार नहीं पावे । सुर नर मुनि बहुते पछतावे ॥ अस्तुति करे पार न पावे । बिना विवेक विचार ॥ पिंड ब्रह्मंड कथे ब्रह्मचारी । जबलग कायाके मंझारी ॥ काया जरबर होवे छारी । जाके आगे वस्तु अपार ॥ पावे तन मन पार ॥ षट् दर्शन मिल कथे जो ज्ञाना । अस्थिर चरका मरम न जाना । फिर फिर जोनी आय तुलाना । जमके हाथपरे पछताना ॥ कियो न तत्त्व विचार ॥ जो लग रहे कामिनि अर्धंगा । चरचा करे क्रोधके संगा ॥ इनसे भक्ति होत है भंगा ॥ जौलग नहीं पांचो एकसंगा ॥ छूटे न कपट लबार ॥ ये तीनों परंपंची देवा । जीव लगावे अपनी सेवा ॥ करे प्रपंच लखै ना भेवा । उन जीवनको लगे न खेवा ॥ बूडे कालीधार ॥ जहाँ नहीं मन मनसा दोई । आशा तृष्णा लखै न कोई ॥ पाप पुन्य तहाँ एक न होइ । निरभय नाम जपो नर सोई ॥ छूटे सकल विकार ॥ सतगुरु मिलै तो लागे तीरा । जम जालिमके मेटे पीरा ॥ हंसा होय ऐसे मतके धीरा । निरभय पद सतनाम कवीरा ॥ आवा-गमन निबार ॥

शब्द २९६-ऐसा जानता कोई ख्याल ऐसा ॥टेक॥ धरती बेध पतालहिं जावे । शेषनागको बसकर लावे ॥ बासुक अहे सत्यका सारा । निश वासर जाका विस्तारा ॥ कमठ पीठपर साल ॥ पूरबमें पछमको लावे । अंधाधुंधका भेद मिटावे ॥ दच्छिन कवीरपंथी शब्दावली २८