कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
शरीरा हो ॥ अंतरधान भये जब सतगुरु, छिन छिन व्याकुल शरीरा हो ॥ अब यह प्रान कौन बिधि राखों, कठिन बिरहकी पीरा हो ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, गुरुके चरन होय थीरा हो ॥
शब्द २७९—नाम अमल कहाँ पाये हो, देखो देखो सखीरी ॥ टे० ॥ सोवत थी मैं लोभ मोहमें, ज्ञानके दिष्ट जगायेहो ॥ बिषकी लहर उठी घट भीतर, अमृत बूंद चुवाये हो ॥ बंदी छोर मुकतिके दाता, जीवन बंध छुडाये हो ॥ साहेब कवीर मिले गुरु पूरे, तनके तपन बुझाये हो ॥
शब्द २८०—जिनको लगी शब्दकी चोट ॥ टे० ॥ का बरछी का छुरी कटारी, का ढालोंकी ओट ॥ का नदिया का कुवा बावडी, का खाई का कोट ॥ का भाई का बाप महतारी, का तिरिया का सोच ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, बचे गुरुकी ओट ॥
शब्द २८१—दिलकी गुठिया खोल, सतगुरु भला करेगा ॥ टे० ॥ पांच तत्त्वकी या तन गुठिया, लगी पवनकी डोर ॥ इस गुठियामें दस दरवाजा, जतन जतनसे खोल ॥ इस गुठियामें लाल अमोलक, बे प्रमान ता मोल ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, बांध अगमकी डोर ॥
शब्द २८२—सुरत मतवाली राजा मोहि लिया ॥ टे० ॥ शील दयाका बना घाघरा, तत क्षमाकी सारी ॥ त्रिगुन तारकी अंगिया सोहै, तापर भौर गुँजारी ॥ कर कंकन बाजूबंद सोहै, दुलारी दया सँवारी ॥ हिये हार हिरदे बिच सोहै, जे हर शब्द अगारी ॥ रतन जतनके महल बना है, सुकित लगी किवारी ॥ भौर गुफामें सेज बिछी है, पौढी सुषमन नारी ॥ अपने पियाको सनमुख देखों, भर लोचन अधिकारी ॥ कहैं कवीर भरम जब छूटे, उपजे भगति करारी ॥