कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कहीं न माने, चाहत है हमरो परवाना ॥ गीता और भागवत बाँचे, ना लागे गुरु उनके काना ॥ मारहिं मार होरहे जमद्वारे, साहेब कवीर देख सुसकाना ॥
शब्द २७५—बिन सतगुरु नर फिरत भुलाना ॥ टेक ॥ एकके हरिसुत लाय गडरिया, पोष पालके कियो सयाना ॥ रहत अचेत फिरत अजयन संग, अपना हाल उनहु ना जाना ॥ एक केहरि सुत आय जंगलसे, देखत ताहि बहुत सकुचाना ॥ बकरन भेद तुरत उन दीन्हा, आपन दशा देख सुसकाना ॥ मिरगा नाभि बसे कस्तूरी, वह मूरख दूँदत चौगाना ॥ करत सोच पछतात मनहिं मन, यारे सुगंध कहाँसे आना ॥ अधर उधर बिच डोरी लागी, रूप छका गहि जात बखाना ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, उलटा राह सूत हम ताना ॥
शब्द २७६—बाबुल मरियो हो दइया मारे, कूर को दीन्ही ॥ टे० ॥ कूर अरोसी कूर परोसी कूरे भई सगाई ॥ कूरे कूर बराती आये, कूरे मिले संघाती ॥ अकवारमें गदहा दीन्हे, द्वारे दीन्हे घूस ॥ मंडवातरमें दीन्ह लुखरिया, लंबी लंबी पूछ ॥ दाल बनाये भात बनाये, बरा बनाये कच्चे ॥ सबे बराती जेवन बैठे सारसके-से बच्चे ॥ मंडवौ जरगै दुलहौ मरगै, दुलही भई अहवाती ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, नाचत चले बराती ॥
शब्द २७७—जियरा पराये बसनमें ॥ टे० ॥ सास ननद मोरी जनमकि बैरन, चरचा करे दसनमें ॥ काम क्रोध मद लोभ मोह बस, नफा नहीं है इसमें ॥ पांच पचीस घट भीतर, टरे नहीं निश दिनमें ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, सतगुरु चरन हियेमें ॥
शब्द २७८—निश बासर मोहिं नींद न आवै, लगा शब्दका तीरा हो ॥ टे० ॥ गांसी मारी सार शब्दकी, बिंध गइ सकल