कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
बिगारीहो॥ दिल ना चैन रैन निशबासर, अपनेअपने बारी हो॥ नैन हमार महा दारुन है, स्वास स्वास जमुहाई हो॥ जबजब करव प्रीतमसो गह गह पलकन पारी हो ॥ दसहुँ द्वार रोक जम बैठे, सुमति किंवाड लगाई हो॥ जिन दुख दीन्ह मान गढ ऊपर, पकर जंजीर भराई हो ॥ गहो गुरु चरन दया कर उपजे, ज्ञानके खरग बनाई हो ॥ होय निहशंक नाम गुन गावे, ममता दूर बहाई हो ॥ अर्ध उर्ध बिच तार लगाई, जहवां सुरति समाई हो॥ कहैं कवीर वा घरका भेदी, बहुर न भौजल आई हो ॥
शब्द २७१—गाँठ परी पिया बोले न हमसे ॥ टेक ॥ नित उठ देखों पिया तुम्हारी सेजरिया, लग गई नौद निकसगये घरसे ॥ जो मैं जानति पिया रिसियैहैं, काहेको प्रीत लगाती ऐसे ठगसे ॥ अपने पियाको फेर मनाऊं, सौ तकसीर होत हरिजनसे ॥ धर्म- दासकी अरज गोसाईं, साहेब कवीर पिया पाये बडे तपसे ॥
शब्द २७२—कैसे बोले अधरमें बोलवा रे॥ टेक॥ या बोलवाके सकल पसारा, घट घट करत किलोलवा रे ॥ या बोलवासे तीन देव भये, ब्रह्मा विष्णु मद्देशवा रे ॥ या बोलवासे तीन लोक भये, चंद सूर तारागनवा रे ॥ कहैं कवीर बोलवाको चीन्है, उतर जाय भौपरवा रे ॥
शब्द २७३—ऐसी लगन लगाय कहाँ जासी ॥ टेक॥ मूठ सुवा सेम्हर एक सेयो, छाँड चला संग साथी ॥ फूल झरे जबही फल लागे, सुवना भये हुलासी ॥ चौंच मार सुवना पछताने, लाग गले बिच फांसी ॥ हमतो जाने अमृत फल है, लाल फूल बिसवासी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सुवना भये निरासी ॥
शब्द २७४—को सिखवे अधमनको ज्ञाना ॥ टे० ॥ जहाँसे आया ताहि बिसराया, फूटी आँख भयो निज काना ॥ गुरु साधकी