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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

(८५८)

कवीरपंथी—

बिगारीहो॥ दिल ना चैन रैन निशबासर, अपनेअपने बारी हो॥ नैन हमार महा दारुन है, स्वास स्वास जमुहाई हो॥ जबजब करव प्रीतमसो गह गह पलकन पारी हो ॥ दसहुँ द्वार रोक जम बैठे, सुमति किंवाड लगाई हो॥ जिन दुख दीन्ह मान गढ ऊपर, पकर जंजीर भराई हो ॥ गहो गुरु चरन दया कर उपजे, ज्ञानके खरग बनाई हो ॥ होय निहशंक नाम गुन गावे, ममता दूर बहाई हो ॥ अर्ध उर्ध बिच तार लगाई, जहवां सुरति समाई हो॥ कहैं कवीर वा घरका भेदी, बहुर न भौजल आई हो ॥

शब्द २७१—गाँठ परी पिया बोले न हमसे ॥ टेक ॥ नित उठ देखों पिया तुम्हारी सेजरिया, लग गई नौद निकसगये घरसे ॥ जो मैं जानति पिया रिसियैहैं, काहेको प्रीत लगाती ऐसे ठगसे ॥ अपने पियाको फेर मनाऊं, सौ तकसीर होत हरिजनसे ॥ धर्म- दासकी अरज गोसाईं, साहेब कवीर पिया पाये बडे तपसे ॥

शब्द २७२—कैसे बोले अधरमें बोलवा रे॥ टेक॥ या बोलवाके सकल पसारा, घट घट करत किलोलवा रे ॥ या बोलवासे तीन देव भये, ब्रह्मा विष्णु मद्देशवा रे ॥ या बोलवासे तीन लोक भये, चंद सूर तारागनवा रे ॥ कहैं कवीर बोलवाको चीन्है, उतर जाय भौपरवा रे ॥

शब्द २७३—ऐसी लगन लगाय कहाँ जासी ॥ टेक॥ मूठ सुवा सेम्हर एक सेयो, छाँड चला संग साथी ॥ फूल झरे जबही फल लागे, सुवना भये हुलासी ॥ चौंच मार सुवना पछताने, लाग गले बिच फांसी ॥ हमतो जाने अमृत फल है, लाल फूल बिसवासी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सुवना भये निरासी ॥

शब्द २७४—को सिखवे अधमनको ज्ञाना ॥ टे० ॥ जहाँसे आया ताहि बिसराया, फूटी आँख भयो निज काना ॥ गुरु साधकी

शब्दावली

(८५९)

कहीं न माने, चाहत है हमरो परवाना ॥ गीता और भागवत बाँचे, ना लागे गुरु उनके काना ॥ मारहिं मार होरहे जमद्वारे, साहेब कवीर देख सुसकाना ॥

शब्द २७५—बिन सतगुरु नर फिरत भुलाना ॥ टेक ॥ एकके हरिसुत लाय गडरिया, पोष पालके कियो सयाना ॥ रहत अचेत फिरत अजयन संग, अपना हाल उनहु ना जाना ॥ एक केहरि सुत आय जंगलसे, देखत ताहि बहुत सकुचाना ॥ बकरन भेद तुरत उन दीन्हा, आपन दशा देख सुसकाना ॥ मिरगा नाभि बसे कस्तूरी, वह मूरख दूँदत चौगाना ॥ करत सोच पछतात मनहिं मन, यारे सुगंध कहाँसे आना ॥ अधर उधर बिच डोरी लागी, रूप छका गहि जात बखाना ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, उलटा राह सूत हम ताना ॥

शब्द २७६—बाबुल मरियो हो दइया मारे, कूर को दीन्ही ॥ टे० ॥ कूर अरोसी कूर परोसी कूरे भई सगाई ॥ कूरे कूर बराती आये, कूरे मिले संघाती ॥ अकवारमें गदहा दीन्हे, द्वारे दीन्हे घूस ॥ मंडवातरमें दीन्ह लुखरिया, लंबी लंबी पूछ ॥ दाल बनाये भात बनाये, बरा बनाये कच्चे ॥ सबे बराती जेवन बैठे सारसके-से बच्चे ॥ मंडवौ जरगै दुलहौ मरगै, दुलही भई अहवाती ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, नाचत चले बराती ॥

शब्द २७७—जियरा पराये बसनमें ॥ टे० ॥ सास ननद मोरी जनमकि बैरन, चरचा करे दसनमें ॥ काम क्रोध मद लोभ मोह बस, नफा नहीं है इसमें ॥ पांच पचीस घट भीतर, टरे नहीं निश दिनमें ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, सतगुरु चरन हियेमें ॥

शब्द २७८—निश बासर मोहिं नींद न आवै, लगा शब्दका तीरा हो ॥ टे० ॥ गांसी मारी सार शब्दकी, बिंध गइ सकल

(८६०)

कवीरपंथी—

शरीरा हो ॥ अंतरधान भये जब सतगुरु, छिन छिन व्याकुल शरीरा हो ॥ अब यह प्रान कौन बिधि राखों, कठिन बिरहकी पीरा हो ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, गुरुके चरन होय थीरा हो ॥

शब्द २७९—नाम अमल कहाँ पाये हो, देखो देखो सखीरी ॥ टे० ॥ सोवत थी मैं लोभ मोहमें, ज्ञानके दिष्ट जगायेहो ॥ बिषकी लहर उठी घट भीतर, अमृत बूंद चुवाये हो ॥ बंदी छोर मुकतिके दाता, जीवन बंध छुडाये हो ॥ साहेब कवीर मिले गुरु पूरे, तनके तपन बुझाये हो ॥

शब्द २८०—जिनको लगी शब्दकी चोट ॥ टे० ॥ का बरछी का छुरी कटारी, का ढालोंकी ओट ॥ का नदिया का कुवा बावडी, का खाई का कोट ॥ का भाई का बाप महतारी, का तिरिया का सोच ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, बचे गुरुकी ओट ॥

शब्द २८१—दिलकी गुठिया खोल, सतगुरु भला करेगा ॥ टे० ॥ पांच तत्त्वकी या तन गुठिया, लगी पवनकी डोर ॥ इस गुठियामें दस दरवाजा, जतन जतनसे खोल ॥ इस गुठियामें लाल अमोलक, बे प्रमान ता मोल ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, बांध अगमकी डोर ॥

शब्द २८२—सुरत मतवाली राजा मोहि लिया ॥ टे० ॥ शील दयाका बना घाघरा, तत क्षमाकी सारी ॥ त्रिगुन तारकी अंगिया सोहै, तापर भौर गुँजारी ॥ कर कंकन बाजूबंद सोहै, दुलारी दया सँवारी ॥ हिये हार हिरदे बिच सोहै, जे हर शब्द अगारी ॥ रतन जतनके महल बना है, सुकित लगी किवारी ॥ भौर गुफामें सेज बिछी है, पौढी सुषमन नारी ॥ अपने पियाको सनमुख देखों, भर लोचन अधिकारी ॥ कहैं कवीर भरम जब छूटे, उपजे भगति करारी ॥

शब्दावली

(८६१)

शब्द २८३-बोलन लागी तूती साँची बोल॥टे०॥ दया धरमकी या तन कुंडी, तापर करत किलोल॥ भूल गई सब झूठी बतियाँ, अब जो भई अनमोल॥ सत्तनामकी साँची मिसरी, पी गइ जलमे घोर॥ सुरति निरतिके बने पायडे, आडा सुरति अडोल॥ अष्ट कमल ये आठ पंखुरी, दस खिरकी भइ गोल॥ छुटगौ तूती गरभ बसेरा, मिट गये डामाडोल॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, अब का तेरो मोल॥

शब्द २८४-लोगवा मतलबके गरजी, अब मोहि जान परी॥ टे०॥ जौलौ बैल लदे बनियांके, तौलौ चाह धनी॥ थकित भया कोइ बात न पूछे, फिरता गली गली॥ मोह भरमसे सती होत है, पियके फंद परी॥ हरदम साहब ना पहिचाना, सुरदा संग जरी॥ हरे वृच्छ पंछी दोय बैठे, किया मनोरथकी॥ पंछी उड़ गये पत्ता झर गये, यही रीत है जगकी॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, मनसा विषै भरी॥ मनुवा तो कहु अंते डोलै, जपता हरी हरी॥

शब्द २८५-सूरत मूल ठिकाना जानो । ताहि चीन्हके डोर संभारो, दिग्य दृष्टि पहिचानो॥ टे०॥ का भय पिंड ब्रह्मांडके खोजे, का भय पवन चढाये॥ का भय त्रिकुटी ध्यानके कीन्हे, का भय भँवर गुफाके पाये॥ वह तो सबनसो न्यारा, कायासे भिन्न पसारा॥ मूल डोर पुरुष सहिदानी, हंसन करे उवारा॥ बिन गुरुगम शिक्षा ना पावे, फिर काया ठहरावे॥ जो लग संधि हाथ ना आवे, तो लग भटक़ा खावे॥ गुरु जौहरी भेद बतावे, औघट घाट लखावे॥ सुरति निरति औ शब्द सहायक, गुरुमुख लोक सिधावे॥ कोट ज्ञानसो भिन्न पसारा, कहौ मूल निज बानी॥ जेहि प्रतापसे हंसा बांचे, सो है अगम निशानी॥ मूल ज्ञान

(८६२)

कवीरपंथी-

सबही सो न्यारा, संत लेव पहिचानी ॥ कहें कवीर धर्मनि निज मानो, मिटे नरककी खानी ॥

शब्द २८६-अनुरागी निरगुन जोखो हो । जो तुम सुकित अंश हमारे, यह निजज्ञान समोखो हो ॥८०॥ वह सकल घट व्यापक, घट घट रहो समाई ॥ उठत राग अनुराग सरूपी, ताको लखो बनाई ॥ जहाँ मूल उच्चार होत है, बिगसित मधुरी बानी ॥ गरज घुमड अंजोर होत है, चूवत फूही अघ्रानी ॥ अगम पंथ जहाँ पांव टिके नहीं, सो मारग है झीनी ॥ तिल प्रमान जहाँ लगी किंवारी, तहाँ सुरति गम कीनी ॥ जब वह मारग प्रगट उघरिहै, सुनो अमरकी बानी ॥ कहें कवीर धर्मनि निज मानो, मिटे नरककी खानी ॥

शब्द २८७-निजगत कहिये मोही । गुन निरगुन दोनोंकी महिमा, बूझत हैं गुरु तोहि ॥८१॥ को निरगुनको सरगुन कहिये, को करंत को करता ॥ लख चौरासी जिया जूनमें, सर्व मई होय बरता ॥ सुनो संत निरगुनकी महिमा, बूझे विरला कोई ॥ निरगुन फांसमें सबे फंदाने, सुर नर सुनिवर लोई ॥ आदि ब्रह्म निरगुन निहअछर, सो सबहीसे न्यारा ॥ सरगुन सकल व्यापक है माया, ये उलझे व्योहारा ॥ गुरु कवीर तव चरन मनाऊं, सब संतन सिरताजा ॥ धरमदास परदयाजु कीजै, बांह गहेकी लाजा ॥

शब्द २८८-समुझ बिन लाज नदीमें बोरे । जहाँ लाज तहाँ नेह न उपजै, शील समाधी फोरे ॥८२॥ संकुच सनीप हीनता घेरे, मन मलीन झकझोरे ॥ कोध अगिन मोह घन उपजे, ममता मंडल घेरे ॥ लाज लहरकी उठे तरंगा, विरह बूंद विष घोरे ॥ लाज समाय कुमत झरबरसे, कुपथ कुसंगत डोले ॥ ज्ञान देश की राह बिसारे, सतसंगत हित फोरे ॥ सतगुरु खोज लाज तज

शब्दावली

(८६३)

दीजै, वीरघटा मन मोरे ॥ कहै कवीर सतसंगति कीजै, सुमति तरंग हिलोरे ॥

शब्द २८९—जतन विन तन अभिमान उजारे ॥टेका॥ ताते कीजै शील किंवारी, मन बदलहर निवारे ॥ ममता मान महातम भारी, बिरहबान फटकारे ॥ वरषतकाम घट अंधियारी, लाजित मुख बिध टारे ॥ हांक डांक माया मद गरजे, जटाझार झरडारे ॥ डमडम गावे असत जगावे, लालच लहर फंवारें ॥ चारमास चारे पन बरसे, त्रिगुन तत्त्व गुन डारे ॥ पांचो तत्त्व पांचरंगबरसे, पन पन रंग किनारे ॥ बाल किशोर तरुन बृद्धापन, पल-पल चढ़त उतारे ॥ रंगकी लहर तरंग फूँहारे, सरसंधान संभारे ॥ प्रेम भक्ति लौ लीन रहे मन, सुरति निरति संभारे ॥ कहैं कवीर जो सतगुरु सेवै, सो अभिमान बिडारे ॥

शब्द २९०—जतन विन मोह दोहाई पारे ॥टेका॥ पशु पंछी सुर नर मुनि गंधर्व, मोह फांस ना टारे ॥ मोह महामद बिरह विकारी, समता धीर बिडारे ॥ मन मकरंद कंद सबहीके, रज तज बिरस सुधारे ॥ लालच ललित कुपंथ कुबानी, कुकरम कुमति पसारें ॥ लाज सकुच तृष्णाके बांकुरी, सत्य सुमति मतवारें ॥ पारखंड हेत कठोर मूढमत, शीलकी रास बिडारे ॥ जड अज्ञान दशा अतिचंचल, क्षमा धीरज झझकारे ॥ सतगुरु खोज शब्द सरसाजे, मोह बांकुरी फारे ॥ कहैं कवीर सतगुरु पदपरसे, आप तरे औ तारे ॥

शब्द २९१—जतन विन मिरगोंने खेत उजारे । पांच मिरगवा, पचीस मिरगनी तामे तीन शिकारे ॥टेका॥ अपने अपने रसके कारन, चरत हैं न्यारे न्यारे ॥ अति बलवंत बढ़ै ना काहू, बिड-

(८६४)

कवीरपंथी—

रत नाहिं बिडारे ॥ तन कर बारी मन कर बिझुका, गुरुका शब्द रखवारे ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, मानो शब्द हमारे ॥

शब्द २९२—पतिबल जनके मोह निवारे छाडो दुख जंजाल सुमतिधर, माया मदहिं विसारे ॥ टेक ॥ मोह तजे निरमोही होवे, मोह फंद सब टारे ॥ तजे प्रपंच जोग तब पूजा, तीनों ताप संभारे ॥ तीरथ बरत प्रतिमा अस्थापन, डिभ कपट सब जारे ॥ तज प्रपंच विकार बाजी सब, जंत्र मंत्र विकारे ॥ विद्या वेद पुरान नाद मद, छंद बंद निरवारे ॥ नट नाटक तज भगति अराधे, तीनों पछ उबारे ॥ चार अचार वरन आश्रम तज, केवल भक्ति सुधारे ॥ कहैं कवीर सतगुरु बल बांचे, उतरि जास भौ पारे ॥

शब्द २९३—अपना काम संभारो भाई । सतगुरु शब्द गहौ चितलाई ॥ टेक ॥ मन औ काम कालके फंदा, एही फंदो संसारा ॥ विरला संत कोउ काम संभारो, पहुंचे लोक मंझारा ॥ नारी अपनी नार पराई, नार नार सब एका ॥ अपना नार दोष कहु नाहीं, सुकित करो विवेका ॥ नार पराई अपनीकै देखै, सो नर पार न पावै ॥ पूरे ठीक पिंडसे छूटे, चौरासी भरमावे ॥ नार पुरुष हमहीं रच लीन्हा, जीवन जुगन बँधाय ॥ कहैं कवीर कोई संत विवेकी, तनके काम बहाया ॥

शब्द २९४—तेरी काया मद्धे सार । सतगुरु पाया दीन दयाल ॥ टेक ॥ इस बोलतेका खोज करना, जीवतेही उल्टा मरना काहे को जमंडंड भरना ॥ उत्तर पैलै पार । महलकी जब सुधपाई, चीन्ह लीन्हा प्रान भाई ॥ अनंत मूरत दिष्ट आई, होगये निह-चल मिटे दुचितार्ई ॥ ऐसा तत्त्व बिचार ॥ कंद भीतर नाद गाजे ॥ जरा मरन उपाधि भाजे ॥ सुन्न महलमें उनमुख साधे ॥

शब्दावली

(८६५)

पावे पद निरवान ॥ ये तीनों है जमकी बाजी, अगम पंथ बैठे अविनाशी ॥ कहें कवीर सुन गोरख जोगी, चीन्ह ता निज-सार ॥

शब्द २९५-साहब ऐसा अपरंपार जाका सत्यशब्द आधार ॥टेक॥ ब्रह्मा जाको खोजत धावे । वेद किताब पार नहीं पावे । सुर नर मुनि बहुते पछतावे ॥ अस्तुति करे पार न पावे । बिना विवेक विचार ॥ पिंड ब्रह्मंड कथे ब्रह्मचारी । जबलग कायाके मंझारी ॥ काया जरबर होवे छारी । जाके आगे वस्तु अपार ॥ पावे तन मन पार ॥ षट् दर्शन मिल कथे जो ज्ञाना । अस्थिर चरका मरम न जाना । फिर फिर जोनी आय तुलाना । जमके हाथपरे पछताना ॥ कियो न तत्त्व विचार ॥ जो लग रहे कामिनि अर्धंगा । चरचा करे क्रोधके संगा ॥ इनसे भक्ति होत है भंगा ॥ जौलग नहीं पांचो एकसंगा ॥ छूटे न कपट लबार ॥ ये तीनों परंपंची देवा । जीव लगावे अपनी सेवा ॥ करे प्रपंच लखै ना भेवा । उन जीवनको लगे न खेवा ॥ बूडे कालीधार ॥ जहाँ नहीं मन मनसा दोई । आशा तृष्णा लखै न कोई ॥ पाप पुन्य तहाँ एक न होइ । निरभय नाम जपो नर सोई ॥ छूटे सकल विकार ॥ सतगुरु मिलै तो लागे तीरा । जम जालिमके मेटे पीरा ॥ हंसा होय ऐसे मतके धीरा । निरभय पद सतनाम कवीरा ॥ आवा-गमन निबार ॥

शब्द २९६-ऐसा जानता कोई ख्याल ऐसा ॥टेक॥ धरती बेध पतालहिं जावे । शेषनागको बसकर लावे ॥ बासुक अहे सत्यका सारा । निश वासर जाका विस्तारा ॥ कमठ पीठपर साल ॥ पूरबमें पछमको लावे । अंधाधुंधका भेद मिटावे ॥ दच्छिन कवीरपंथी शब्दावली २८

(८६६)

कवीरपंथी-

शिला द्वार दे राखा । उत्तर दिशा सजीव न चारखा ॥ चार दिशाको हाल ॥ दिनके सोध रैनमें लावे । रैनके भीतर भानु जगावै ॥ भानुके भीतर शशिखा बासा । शशिके भीतर दिवस प्रकाशा ॥ ताबिच सार न तार ॥ नौको सोध सिलसिला लावे ॥ एक बार सुमेर डुलावे ॥ मेरु दंडपर आसन लावे । मन मुख धागा सुरति गहावे ॥ गगन गुफाके हाल ॥ गगन गुफामें अति उजियाला । अजपा जाप जपे तहां माला ॥ वीना शंख सहनाई बाजे ॥ चहुँदिश राय निरंजन गाजे ॥ हीरा जनम मोहाल ॥ कहैं कवीर कोइ बिरला पावे । जाको सतगुरु अलख लखावे ॥ क्षमा शील संतोष समाई । दया गरीबी आवे भाई ॥ सो चले हमारे नाल ॥

शब्द २९७-शब्द जहाज चढो रे मन भाई ॥ टेक ॥ कर करता से कौल गरभमें लिया बसेरा ॥ माताको दुख दिया मास नौ रहा अकेला । शिर नीचे पग ऊपर ॥ करतासे करे पुकार ॥ त्रिगुन फंद निरवारो स्वामी । अब ना आऊं यह देश गोसाई ॥ बालापनमें भूल नाम, हिरदे ना लीन्ह ॥ तरुनापन जब लगा, मोह त्रियासे कीन्ह ॥ आये बुढापा बावरा मुखसे कहे न नाम ॥ तीनों पन ऐसेमें खोई, नर देही बेबाद गवाई ॥ भगति करै कछु आपतरे, औरनको तारे इतनी मनकी दौर ॥ दर्शन मिले न साधको, निशदिन रहे उदास ॥ ले बैठारो अजर अमर घर, बहुर न आऊं यह देश गोसाई ॥ धर्मदासकी बीनती, सुनियो सत्त कवीर ॥ एक बार एको ना रहिहै, फिर करता कछु और उपाई ॥

शब्द २९८-चेत सबेरा चलना बाट । यह जग देखा झूठा ठाट ॥ टे० ॥ चलनेकी तजबीज न कीन्ह ॥ मजलोंकी खर्ची ना

शब्दावली

(८६७)

लीन्हा ॥ अच्छी राह ताहि ना चीन्हा । अब का सोता गाफल खाट ॥ चंचल मनका घोड़ा कीन्हा । ज्ञान लगाम ताहि दै दीन्हा ॥ होय होशियार बाग गहि लीन्हा । भौसागरके चौडा पाट ॥ मित्र कुटम कोई ना तेरा । यह सब है स्वारथका बेरा ॥ यहां नहीं तेरा निहचल डेरा । इनसे चलना वेग उचाट ॥ मग-माँही ठगवाग लगाया । वह तंबूसा छप्पर छाया ॥ औरनको ठग लड़डू लाया । मार लिया स्वादोंका घाट ॥ तन सरायमें मन अरुझाना, भटयारीके रूप लुभाना ॥ निश वासरसो मनमें दीन्हा । सौदाकर सतगुरुकी हाट ॥ कहै कवीर दयासे पावे । अपनो ज्ञान तोहि समुझावे ॥ तेरे भलेकी राह जनावे । जम कूचलकी पेंच न आवे ॥ बार-बार कहो तोसे डाट ॥

शब्द २९९-मन नेकी करले दो दिनका मिजमानरे ॥ टे० ॥ जोहू लडका कुटम कबीला, दो दिनका तन मनका मेल ॥ अंतकाल उठ चला अकेला तज माया मंडानरे ॥ कहाँसे आया कहाँ जायगा, तन छूटे मन कहाँ समायगा ॥ आखिर तुझको कौन कहेगा, गुरु बिन आतम ज्ञानरे ॥ कौन तुम्हारा सच्चा साई, झूठी है यह सकल सगई ॥ कहाँ सुकाम कहाँ ठिकाना, का बस्ती का नामरे ॥ रहट माल पनघट जो भरता ॥ आवत जात भरा औ रीता, जुगन जुगन तू मरता जीता ॥ क्यों करता अभिमान रे ॥ लाख चौरासी छेखे तासा, ऊंच नीच घर लेता बासा ॥ कहै कवीर सुनो भाइ साधो, जपना गुरुका नामरे ॥

शब्द ३००-मन मौला जाने गुजर गई गुजरानरे ॥ टे० ॥ कोइ दिन रूखा सूखा रांधा । कोइ दिन दूध मलीदा छांदा ॥ कोइ दिन पत्रपरायल कांदा । कोइ दिन रहै हैरानरे ॥ कोइ दिन शाल दुशाला अंगे, कोइ दिन फाटेनंगे ॥ कोइ दिन खासे रंगे

(८६८)

कवीरपंथी—

चंगे, कोइ दिन तोरे तानरे ॥ कोइ देवल कोइ दिन महजित ॥ कोइ दिन बाग बगीचा बाडी, कोइ दिन रहे वृक्षकी छाँहीं ॥ कोइ दिन रहे मैदानरे ॥ हिलमिल रहना देखे खाना ॥ नेकी बात सिखाते रहना ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, जपना निर- गुन नामरे ॥

शब्द ३०१—मारगमें लूटे पांच जनी ॥ टे० ॥ पांच पचीसने रोके बाटा, साधू चढगये औघटघाटा जाय लिया उन उबट बाटा, जो न उबारो आप धनी ॥ आशा तुज्जना नदिया भारी, बहिगये संत बडे ब्रह्मचारी ॥ जो उबरे सो शरण तुम्हारी, शिर- पर चमके सेल अनी ॥ संकट लूटे नेजाधारी, उनकी रहयत कोन बिचारी ॥ त्रिदेवा लूटे सब झारी, चमके निरगुन तीन अनी ॥ बनमें डसलिये मुनिजन नागा, डसलियो ममता उन उठ भागा ॥ जाके कान गुरू ना लागा, शृंगीऋषि सो आन बनी ॥ मारग बांका पथ दुहेला, रामानंद कीन्हें तहँ मेला ॥ साहेब कवीर देत जहाँ हेला, सुनिये सिरजन आप धनी ॥

शब्द ३०२—देखके मगन भये गगन बहारवा ॥ टे० ॥ रतन- सिंहासन पुरुषबिराजे, कोट भानु छबि निरखत लाजे ॥ माथे क्रीट मनोरथ राजे, चात्रिक भई लख दरस अपार वा ॥ विन- पग निरत होत जहाँ रुमझुम, घुंघुर बाजे छुमछुम ॥ ताथेइ ताथेइ नाचे ठुमठुम, तबला बाजे गुमगुम ॥ उठत राग छत्तीस उचरवा ॥ अरर अरर जहाँ अरबी बाजे, झरझर झरझर झालर साजे ॥ किडधो किडधो नौबत गाजे, शब्द सुहावन मुरली बाजे ॥ सहनाई सुर बजत विशालवा ॥ भरो अमोलक अमी- सरोवर, पीवत हंसा करे कुतूहल ॥ लगी सुधा जहाँ झुरझुर झुरझुर ॥ मन भौरा जहाँ करत गुंजारवा ॥ लीला देखि भयो

शब्दावली ।

(८६९)

मन अस्थिर ॥ विषय वासना छूटी तत्पर ॥ मोतीदास कहैं धनधन सतगुरु उलट अभी पी पायो निजघर ॥ सत्यनाम सोई है निज सारवा ॥

शब्द ३०३-मनुष तन पायके तुस । भजलो सिरजन हार ॥ टे० ॥ कैसे रहे अचेत कबै फिर औसर पैहो ॥ फिर न मिले ऐसो दाव, बहुर पाछे पछतैहो ॥ लखचौरासी जियाजूनमें, मानुष जन्म अनूप ॥ ताहि पाय चेतत नाहींरे, कहा रंक भूप ॥ गरभ बासमें कौल किया मैं, भजिहौं तोही ॥ निशदिन सुमरों नाम, कष्टते काढो मोही ॥ एकनामको जानके, रहों नाम लौलाय । नेक न तोहि विसारिहौं, या तन रहे की जाय ॥ इतना किया करार काढ प्रभु, बाहर कीन्हा ॥ भूल गये वह बात भये माया आधीना ॥ भूली बतियाँ वा दिनकी, आय गई मत आन ॥ बाराबरस तो ऐसे बीते, खेलेत फिरत नदान ॥ तरुनापन जब लगा, देह जोवन मदमाता ॥ चलत निनारे छाँह, तमकके बोले बाता ॥ चोवा चंदन लायके, पहिरे बसन बनाय ॥ गलियारे झाँखत फिरे, परत्रिया देख मुसकाय ॥ तरुनापन गये बीत, बुढापा आय तुलानो ॥ कंपन लागे शीश, चलत दौय चरन पिरानो ॥ नैन नासिका चूवन लगै, मुखसे न आवै स्वास ॥ वात कफने घेर लिया है, छूट गया तन आश ॥ माता पिता सुत नार, कहो काके संगलागी । तन मन धन बरजत नहीं, कामिन होत सुभागी ॥ एकदिन काल गरासई, परिहो जमके दाव ॥ बिन सतगुरु ना बाँचहूँ, कोटन करो उपाय ॥ सुफल भई या देह, नेह साहेबसो कीजै ॥ सतगुरु दाता आहि, मुक्तपद उनसे लीजे ॥ सुफल भई मनकामना, सुमरन लागे पीर ॥ यह लीला है मुक्तिकी, गावे साहेब कवीर ॥

(८७०)

कबीरपंथी-

शब्द ३०४-का सोचत बारमबारा, प्रभुका नाम न लेत गँवारा ॥ टे० ॥ बाजीगर डंक बजाया, सब लोग तमाशे आया ॥ बाजीगर डंक सकेला, तब रहगये आप अकेला ॥ मनुवां जहाँ हाट लगाया, दुनिया सौदागर आया ॥ सौदागर सौदा कीन्हा, बिरले सौदागर चीन्हा ॥ जब पार उतरना चाहिये, तब खेवटसे मिल रहिये ॥ जब उतर गये भौपारा, तबको हमको संसारा ॥ जब वस्तु अगोचर चाहिये, तब दीपक बारत रहिये ॥ जब वस्तु अगोचर पाई, तब जोतमें जोत समाई ॥ जब मुखडा देखन चाहिये, तब दरपन मांजत रहिये ॥ जब दरपन लागीं काई, तब दरशन कहाँते पाई ॥ जब फूल पत्र फल चाहिये, तब विरवा सींचत रहिये ॥ जब फूल पत्र फल लागा, तब दिलका दुविधा भागा ॥ साहेब कबीर कहे हम जाना, जानेसे मेरा मन माना ॥ कहनेसे नाँहि पतीजे तो मूरखसे का कीजे ॥ ✽

शब्द ३०५-कोई लोढ़िरे संत सुजान, काया बन फूल रही ॥ टे० ॥ एकहि एक मिले गुरुपूरा, मूलमंत्र जो पावे ॥ साधु संतकी बानी बूझै, मन परतीत बढावे ॥ दूजे तनकी दुविधा मेटे, दूजा भाव न लावे ॥ भीतर बाहर एक देखे सो वह संतहि पावे ॥ तीजै तीनों गुनसे न्यारा, तिरबेनी अस्नाना ॥ त्रिकुटी महलमें आसन मारे, अनहद धुन सुन काना ॥ चौथे चंचल बसकर राखे, चतुराई सब त्यागे ॥ चढके प्रेम हिंदोरा झूले, गुरुसो भगति वर मांगे ॥ पांचे पांच तत्त्व प्रकासे, पांचो इंद्री साधे ॥ पकड़ पवनकापरचे करके, मनओ पवन गहि बांधे ॥ छठयें छऊ चक्रको बेधे, षट दल होय प्रकाशा ॥ इंगला पिंगला मारग सोधे, करै गुफामें बासा ॥ साते सत बचन परकासे, सत्य सुरत लखि आवे ॥ मकरतारकी डोरी गहिके, अजर अमर घर

शब्दावली

(८७१)

पावे ॥ आठे अष्ट कमल दलफूले, घट उजियारी होई ॥ आतम होय परमातम चीन्हे, संत कहावे सोई ॥ निरख देख नोमीके द्वारा, जब गुरु पूरा पावे ॥ अहे संधि कायासे न्यारी, जो गुरु संधि लखावे ॥ दसई दसो द्वारको पावे, पटले एक पहारा ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, बहुतन साधो आरा ॥

शब्द ३०६—दोय नैनोके बीच सुसाफिर रमरहुरे ॥ ॥ टे० ॥ धोबी धोवे कापडा, झांझ मऊके घाट ॥ मछरी साबुन लेगईरे, धोबिया गा बारह बाट ॥ धोबिनियां लुट गईरे ॥ कोठी ऊपर कोठरी, जहाँ चढ बोले मोर ॥ मोर बिचारा का करे, घरमें घुसगा चोर ॥ सबी धन लुटि गयोरें, सँराक कुवा पताल जल-पानी, लंबी लागी डोर ॥ थरहर कंपे बाला जियरा, को प्रेमी लेत निचोर ॥ सुघर घर होय रहोरें कहें कवीर सुनो भाइ साधो, सौदा करले हाट ॥ हाट उसल गये सौदा बिक गये, होगये बारा-बाट ॥ जहाँके तहाँ होय गयोरें ॥

शब्द ३०७—मिलना कठिन है मैं कैसे मिलों पिय जाय ॥ टे० ॥ अगम भूमि जहाँ महल पियाको, हमपे चढयो न जाय ॥ औघट घाट गैल रपटीली, पांव नहीं ठहराय ॥ सावधान पग धरो पंथ-पर, बार बार डिंगजाय ॥ अति बारीक पंथ बहु झीना, सुरति झकोरा खाय ॥ लोकलाज मरजाद जगतकी, देखत मन सकु-चाय ॥ जो या बात नये जोबनकी, लाज तजी ना जाय ॥ दूजे सतगुरु मिले पंथपर, मारग दिये बताय ॥ साहेब कवीर मुक्ति के दाता शीतल अंग लगाय ॥

शब्द ३०८—सोहागिन चेत करो तोरे आवागमन नगिचाय ॥ टे० ॥ बालापनमें खेल गँवाये, चलिया चाल कुचाल ॥ कोन जबब देहु मोरि सखियां साहेब पूछ हवाल ॥ समुझ बिनका

(८७२)

कवीरपंथी—

करवे ॥ सतसुकृतकी चूनरि पहिरो, सत मत रंग रंगाव ॥ प्रेम- तन्वके मांग सँवारो, निरभे सिंदुर लाव ॥ घुंचट पट खोल चलो तुम ससुरे, नेहर नाहिं निबाह ॥ नेहर नेह पैहों सखियां, मत तुम भरम भुलाव ॥ भुलाने पिया न पैहो ॥ आगे इत भौसागर, गहिरा सूझे वार न पार ॥ किस बिध पार उतरबे सखिया, बिन खेवट कडिहार ॥ खेवइया बिनका करबे ॥ कहें कवीर सोई सहवाती, पियरंग राजी होय ॥ अमर लोक अस्थाना पावौ, तब तोर अटल सोहाग, मंडल बिसराम करो ॥

शब्द ३०९.—सबका साक्षी मेरा साईं । ब्रह्मा विष्णु रुद्र ईश्व- रलो, औ अद्याकृत ताईं ॥ टे० ॥ पांचपचीस सो सचै करले, ये सब जग भर माया ॥ अकार उकार मकार मात्रा, इनके परे बताया ॥ जागृत सपन सुषोषत तुरिया, इनते न्यारा होईं ॥ राजस तामस सात्त्विक त्रिगुन, इनते न्यारा सोईं ॥ सूछम अस्थूल आनंदमय कहिये, इन मिल भोग बखाना ॥ राजस तेज प्रकाशहि कहिये, इनते न्यारा जाना ॥ परा पसंति मधमा वैखरी, चौबानी प्रपंच प्रमाणी ॥ पंचकोश नीचे कर देखो, इनमो राम न जानी ॥ पंचज्ञानके पंच कर्म हैं, दस इंद्रि मानो ॥ चतुष्ट अन्तहकरण बखाने, इनमो राम न जानो ॥ कुर्मसेष किरकला धनंजय, देवदत्तहू देखो ॥ चौदा देव इंद्रिया चौदह, इनमें अलख न पेंखो ॥ तत पद त्वं पद और असि पद, बाच्य लच्छ ससु- झावे ॥ कहें कवीर सोईं गुरु पूरा, न्यारा कर बतलावे ॥ पं ❁

शब्द ३१०.—सब औगुनका सिर अभिमान । तेउ न मूढ तंज अज्ञान ॥ टे० राजस जग्य नृपतिने कीन्हे, सुर नर मुनि अचवे जलपान ॥ संख पंचायन तबहीं बाजे, सुपचभगत रस लीन्हों सान ॥ यही चूक चूके लंकापति, काटे शिर दशरथ सुत आन ॥

शब्दावली

(८७३)

दुर्घोषनके मेवा त्यागे, दासी सुत घर गये भगवान् ॥ झूठे बेर सेवरी के खाये, प्रेम प्रीत हित अपने जान ॥ शुक्रदेव मुनिसे को बड होई, इंद्री जीत विष डारो छान ॥ वैकुंठमें आदर नाही, कृपा भई न सुने गुरुज्ञान ॥ जोग जग्य व्रत तप कर संयम, चार वेद औ सुने पुरान ॥ कहें कवीर थीर नहिं लागै, जो लग संत नहीं पहचान ॥

शब्द ३११-धनहो धन्य बलखके मीरा । अपने जीव मुक्ति के कारण, सब तज भये फकीरा ॥ टेक ॥ तखतहु छोड दुलीचा छोडा, अंमारीके मीरा ॥ कोटन कोट खजाना छोडा लाल जँवाहर हीरा ॥ जाके पग हुरमनसे मलते, ऐसे नरम शरीरा ॥ बिन पादत्रान बन बन डोले, कसकत नहीं शरीरा ॥ सोरा सहस सहेलरि छोडे, खासा मखमल चीरा ॥ तुरी लाप अट्टारा छोंडे, लगा शब्दके तीरा ॥ धन्य तुम्हारे मात पिताको, जाके पिये तुम छीरा ॥ धन तेरी करतूत कमाई, धन तेरे गुरुपीरा ॥ ज्यों-हारिल लकरीको पकरे, यों मत गहिर गंभीरा ॥ कहें कवीर ऐसी लौलावे, साहेब हाल हजूरा ॥

शब्द ३१२-सुलतानसोबलकबुखारेका ॥ जाके खाना अजब सरहना, मिसरी कंद छोहारेका ॥ टेक ॥ जाकी सुरति लगी कदमसो; अछह पीर पियारेका ॥ जाके सेज फूलसो विछती, करते सुख तन सारेका ॥ अब तो घास बिछावन लागे, मुठी एक गलियारेका ॥ जाके संग कटक दल बादल, झंडा न्यारे न्यारे का ॥ माल सुलक तज लई फकीरी, धनसो कीन्ह विचारेका ॥ जो तनके चोला जोबनते, सवा टंक सब सारेका ॥ सो तो बोझ उठावन लागे, मन दस गूदर भारेका ॥ जासुख चीज नेवाला खाते, करते जीव अहारेका ॥ सो अब रूखा पावन लागे, टुकरा

(८७४)

कवीरपंथी

शाम शकारेका ॥ आदमसे होगये औलिया, एक शब्द निर- बारेका ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, फकर आद अखाडेका ॥

शब्द ३१३-दिवाने बंदे का गावे घर दूर ॥ टे० ॥ अनल हक हककर बोले, सूली दिया मनसूर ॥ सेख फरीद कुवामें लटके होगये चकनाचूर ॥ साह सुलतान बलख तज निकसे, छाँडे सोरहसौ हूर ॥ गोरख गोपीचंद भरथरी, शिरमें डारे धूर ॥ नानक नामा औ बाजिंदा, झिलमिल दरसे नूर ॥ खोजत खोजत उमर सिराने, ना पहुंचे रहे दूर ॥ या कलियुगके नर पाखंडी कबहुं न रहत हजूर ॥ इनके मनमें कुफर बसत है, मायाके मग हर ॥ गोरख काया खोज भुलाने, ना पाया भरपूर ॥ कहैं कवीर दया सतगुरुकी, सब घट दरसे नूर ॥

शब्द ३१४-अबहम सबही मध्य विराजे ॥ दोय दल जोर दिखावैं कौतुक, हम जूझें हम भाजें ॥ टे० ॥ हस्ती चीटी लख चौरासी, लघु दीरघ हत खेलें ॥ उत्पति परले खेल हमारा, आप पसा रस केलें ॥ त्रिभुवन सार सकल रसभोगी, घटघट हमरी पूजा ॥ सरग नरक दोउ खेल हमारा, हम बिन और न दूजा ॥ हमही देव असुर सुर राच्छस, हम ऋषि मुनि हम देवा ॥ हमही ठाकुर आप पुजारी, हम साहब हम सेवा ॥ अवनि अगिन जल पवन सुर शशि, हम जगसैं प्रगटाया ॥ कहैं कवीर तत दरसी जाने, कहेसे को पतियाया ॥

शब्द ३१५-मेरे जान मुझे न दिलसे भूल ॥ टे० ॥ डार डारमें, पात पातमें तुम्ही रंगीला फूल ॥ है हाजरको दूर बतावे, का नियरे का दूर ॥ मक्का दूढा मदीना दूढा तबहुं न मिलत रसूल ॥ स्याही गई सपेदी आई, कर चलनेका सुर ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, सब घट दरसे नूर ॥

शब्दावली

(८७५)

शब्द ३१६-साईका अरस तखत है दूर ॥ बिन सुरसद कोई भेद न पावै, भटक सुए सब कूर ॥ लाज छोड़ जिन काज किया है, भया कदमका धूर ॥ चौदा तबक खावकी रचना, ज्यों आतसका फूल ॥ जो निजके कोई समुझे बूझे, इसमें नहीं सहूर ॥ नासूतमें माया खड़ी, मलकूत गुन अस्थूल ॥ जबरूतमें जंजालह लाहूत अच्छर फूर ॥ हाहूतमें अर्चितपुर, बाजत अनहद तूर ॥ वेद पुरान कुरान कहिये, इहाँ लौं खबर हजूर ॥ सात सुन्न दोय बेसुन कहिये, दसो धाम निज मूल । ईछा सोहैं उहाँसो आये, घट घट व्यापक नूर ॥ कहैं कवीर हम खुदके अहदी, लाये हुकम हजूर ॥ सब रहनके दर्द जानके, संप्रथ वचन कबूल ॥

शब्द ३१७-जगतमें काहु न मन बस कीन्ह ॥ टेक ॥ भरथ खंडमें भरथ जोगी, भुग सुत मन हर लीन्ह ॥ ता कारन नर दोष लगाये, भरथ देह दोय दीन्ह ॥ सूखे पत्र पवन भस्व रहते, पारा सुरसे ज्ञानी ॥ तिनहुँ रूप देख बनिताके, कामकंदला ठानी ॥ शृंगीऋषी बन भीतर रहते, बिषै विकार न जाना ॥ पठई नार भूप दशरथने पकर अजोध्या आना ॥ पारबतीसी पतनी कहिये, तिनके मन क्यों डोला ॥ छकित भये शिव देख मोहनी, हाहा करके बोला ॥ सोरा सहस उरवसी जाके, ताका मन बौराना ॥ गौतम ऋषिकी नार अहिल्या, ताहि देख ललचाना ॥ नारद मुनिसे तपसी कहिये, कन्या हाथ दिखायो ॥ मांग्यो रूप भूपश्रीपतिको, स्वांग बंदरको लायो ॥ जमदग्नी जाके नारि रेनुका, जात जमुना जल भरने ॥ मोही देख भूपके मंदिर, छकित भये दोयनैने ॥ एकहि नाल कमलसुत ब्रह्मा, जग उपराज कहायो ॥ कहैं कवीर एक नाम भजन बिन, जिव बिसराम न पायो ॥

(८७६)

कवीरपंथी-

शब्द ३१८-अलख हमारे राजा जाके बाजत अनहद-बाजा ॥ टेक ॥ शंकरसे जाके जोगी कहिये, ब्रह्मासे ब्रह्मचारी ॥ सुर-पतिसे जाके सुरता कहिये, कृष्णसे औतारी ॥ सात समुंदर शायर कहिये, अनगिनती नदि नारा ॥ अठरा भार रोमावसि कहिये, गिरि परवतसे भारा ॥ भूपति एक महाबलि राजा, चहुँ दिशि फिरे दोहाई ॥ अनंत कोट करताके बागो, यहां प्रगटे ठकुराई ॥ तन बिन मेख तारबिन तंबू, ऐसा तंबूताना ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, तंबू माँहि समाना ॥

शब्द ३१९-पाछे समुझ परेगा भाई ॥ टेक ॥ इहाँ अहार उदरभर कीन्हें बहुविधि मांस कढाई ॥ जीव जंत बहु झटका मारे, यह लेखा सब जाई ॥ इहवाँ लूट खावत तुम परधन, गले फाँसरी लाई ॥ सात सिपाही आगे पाछे, पल पल खबर जनाई ॥ या जग आये राज कराये, पातुर भांड नचाई ॥ एक बुंदके कारन मेरे, कुलके धरम नशाई ॥ ईहां तो कीन्हें साधुकि निंदा सातो जनम नशाई ॥ पैग पैग जम कांटा गाडे, उलटा फाँस लगाई ॥ सांच कहाँ तो मारन धावे, झूठा जग पतियाई ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, भरम भूल दुनियाई ॥

शब्द ३२०-निगम सुत कोन ऋषी उबरे ॥ टेक ॥ प्रथमें ब्रह्मा विष्णु भुलाने, जननी सो बिगरे । सत्यभक्ति जाने बिन डुरलभ, कहु कोने उबरे ॥ नारद मुनि जो डुरमति कीन्हें, बन-चर रूप धर । पराशरऋषि कुहरा उपराजे, पुत्रीसों बिगरे ॥ आसन मार जंगलमें बैठे, वृच्छके चाम चरे । सो भगवान भोगके कारन, शृंगीऋषि बिगरे ॥ दूब अहार कीन डुरबासा, अन्नको त्याग करे । ममता जोर रहे कायामें, इंद्रसभा बिगरे । गुरुगनेश बुद्धिके सागर, शिवके पास खडे । चले अजोग जोग

शब्दावली

(८७७)

के कारण, नीरंजन बिगरे ॥ चौदालोक वेदको मंडल, जहां लग व्यास पड़े । सोरा खंड अच्छर भगवाना, उपजके बिनस मरे ॥ सत्राखंड पर अधर दीप जहां, शब्द अतीत खड़े । ताके आगे चार धाम है, रैन दिवस न टरे ॥ लोमस हंस मिले साहेबसों, चहुं जुग मुक्ति भरे, कहें कवीर सुनो मतिमंदा, सो हंसा उबरे ॥

शब्द ३२१-नानक ऐसा न्याय निवेरो । कलह कालकी ज्वाल न झंपे, मिटे भरमके फेरो ॥ टेक ॥ जो तन तंबू बहु विस्तारा, बिनही मेख लगाना ॥ महातत्त्वका लकडा गाडो, पांच सदर ले ताना ॥ जैसे घटा आवमें ढूबे बिन सीझेना बाजे ॥ पांच तत्त्वके मिश्रित लागी सहजे करत अवाजे ॥ जैसे जंत्री जंत्र बजावे, बाजे सोई बजावे ॥ वाजत है पर दीसत नाही, ताकौ कहा लखावे ॥ चाम महलमें बानी बोले, रूप सवाया रानी ॥ ना जानो यह कहाँसे आया, बिनसे कहाँ समानी ॥ तत है वितमें वित है ततमें, तत बित कहिये सोई ॥ पहले देखै ब्रह्म आरसी, दूजा धोखा होई ॥ कहें कवीर फकीर फिकर तज, न्याय सहित रहो भाई ॥ आवा जाई झूठ कल्पना, सहजे रहो समाई ॥

शब्द ३२२-मन हरना बड हुशियार एकदिन चोरवा आवेगा ॥ टेक ॥ तबल तीर तलवार वरछी, ना बंदूक चलावेगा ॥ आवत जात लखे ना कोई, घरमें दुंद मचावेगा ॥ ना गढ तोरे ना गढ फोरे, ना कछु रूप दिखावेगा ॥ नगरीसे कछु काम नहीं है, तुम्हें पकर लेजावेगा ॥ नहीं सुने फिरियाद सकल पुनि, ऐसा तस्कर आवेगा ॥ लोग कुटम परिवार घनेरे, खोजी खोज न पावेगा ॥ ऐसा है कोई संत विवेकी, नाम भजन गुन गावेगा ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, खोल किंवारी जावेगा ॥