कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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शब्द २४४-पानी बिच मीन पियासी ॥ मोहि देखत आवे हांसी ॥ टे० ॥ ब्रह्मज्ञान बिना नर भूला, का मथुरा का काशी ॥ घरकी माया मनहि न आवे, बन बन फिरे उदासी ॥ है हाजरको दूर बतावै, दूरकी आश निरासी ॥ जल बिच कमल कमल बिच कलिया जहाँ, पुरुष अविनाशी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सिरपर काल मवासी ॥
शब्द २४५-तेरी पानी बिच प्यास न गई ॥ टेक ॥ बाहर आयके का सुख पाया, अंदर लहर न लई ॥ ऐसे सुखसागरके पाये, आश न पूरन भई ॥ अरे मन मूरख भीन अनारी, किन तोहि डुरमति दर्ई ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, हो रहो आनंद मई ॥
शब्द २४६-पानी बीच बतासा संतो तनका एही तमाशा है ॥ टेक ॥ का ले आया का ले जायगा का बैठे पछताता है ॥ मूठी बांधे आया बंदे, हाथ पसारे जाता है ॥ किसकी नारी कौन पुरुष है, कहाँसे नाता लाया है ॥ बडे बिहाल खबर ना तनकी, विरही लहर बुझाता है ॥ एक दिन जीना दो दिन जीना, जीना बरस पचासा है ॥ अंतकाल बीसा सौ जीना, फिर मरनेकी आशा है ॥ ज्यों ज्यों पांव धरो धरनीमें, त्यों त्यों काल नियराता है ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, गाफिल गोता खाता है ॥
शब्द २४७-साधु घट शील संतोष बिराजे ॥ दयासरूप सकल जीवनपर, शब्द सरोत्तर गाजे ॥ टेक ॥ जहवां मनकी मनोरथ दौरे, ताहि संग ना जावे ॥ सत्तबादी सतगुरु पहिचाने, आतम दृष्टि दिखावे ॥ निर्मल दशा सरब सुखदाई, आनंद घर रहिवासा ॥ शुद्ध सुचाल सदा शीतल गति, निश दिन शब्द विलासा ॥ सतगुरु गहे निशि बासर, सत्त नाम परकाशा ॥ कहैं कवीर कोइ संत बिवेकी, तहाँ हमारो बासा ॥