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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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कवीरपंथी—

शब्द २४८—जगमें या बिधि साधु कहावे। दया सरूप सकल जीवनपर, और दृष्टि ना आवे॥८०॥ झलकत दशा ब्रह्मके जामें, सबहीके मन भावे ॥ शीतल बचन सर्व सुखदाई, आनंद प्रेम बढ़ावे ॥ जाको निशदिन प्रेम भगति है, दूजा देव ना ध्यावे ॥ कहैं कवीर हम वा घर परगट, आप अपनपो पावे ॥

शब्द २४९—साधुका होना सुसकल है। काम क्रोधकी चोट बचावे, सोई निज साधू है॥८०॥ कायामध्ये धुनी रमावे, रमता राम गहे ॥ सत बिस्वास हृदयमें राखे, जगसो न्यार रहै ॥ या माया झूठ परपंचिन, जगमें दौर करै ॥ जीव जंत जितना धर पावे, सबको जपत करै॥ माला तिलक औ बाना बांधे, ममता दूर करै ॥ आठ पहर गुरु ज्ञान भजनमें, कम्भर बांध लरै॥ मोटी माया सब कोई त्यागे, झीनी तजी न जाय ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधू, झीनी सबको खाय ॥

शब्द २५०—ठगनी क्या नैन झमकावे, तेरे हाथ कवीर न आवे ॥ टेक ॥ कददू काट मृदंग बनावे, निम्बू काट मजीरा ॥ झिंगा तुरैया मंगल गावे, नाचे बालमखीरा ॥ रूपा पहिरके रूप दिखावे, सोना पहिर ललचावे ॥ गले डार तुलसीकी माला, तीन लोक भरमावे ॥ मुसोंकी सभा सरप एक नाचे, मेंडक ताल लगावे ॥ चोलनी पहिरके गदही नाचे, ऊंट विस्नुपद गावे ॥ बृच्छ चढी मछली फल तोरे, कछुवा भोग लगावे ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, बिरला अर्थ लगावे ॥

शब्द २५१—या तन धनकी कौन बढाई, देखत नैनो माटी मिल जाई ॥ टेक ॥ कंकर चुन चुन महल बनाया। आपन जाय जंगल बसाया ॥ हाड़ जरे जस लाकर झूरी। केस जरे जस घासकी