कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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पूरी॥ या तन धन कछु काम न आई। ताते नाम जपो लौलाई॥ कहैं कवीर सुनो मेरे सुनियां। आप सुवे पाछे डूबगइ दुनियां॥
शब्द २५२—ऐसे लोगनको वहि जाने दे॥ टेक॥ हंस हंस मिल चले सरोवर, बकुलन मछरी खाने दे॥ हंस गयंद चले मदमाते, कूकर लोग भुसाने दे ॥ हंस हंस मिल चलो अमरपुर, कागा आमिख खाने दे ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सत्य शब्दमें काने दे॥
शब्द २५३—साहेव कैसे करें तोहे राजी। चाकरी चोरनेवाला हाज़िर, ऐसा बंदा पाजी ॥ टे० ॥ पांचों चोर करै कुफराना, इन संग दीन गमाऊं। इन संग लडूँ कि कहूँ बंदगी, किन किनका समुझाऊं ॥ इन संग रहों तुमें ना पाऊं, घटके बीचमें गासा। तखत तरेका पेडा मारे, याका अजब तमाशा॥ काह कहों कछु कहन न पाऊं, देत जगत मोहि गारी। दोजक भिस्त दोऊ हम त्यागे, रहूं पनाह तुम्हारी॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, ये सब झूठी बाजी। नाम बिना कोई पार न पावे, का पंडित का काजी॥
शब्द २५४—देखो दुरमत या संसारकी। नामसो हीरा छांड हाथसे, बांधत मोट बिकारकी ॥ टे० ॥ कोई खेती कोई बनिजे चाले, कोईको हवस हथियारकी ॥ अंध धुंदमें जनम गँवाये, सुध बिसरी करतारकी ॥ जान बूझके पंथ चलत है, सुन सुन विप्र लबारकी॥ आपन हाथ गलेमें डारी, फांसी माया जारकी॥ नाना बिधके कर्म कमावे, खबर नहीं शिर भारकी॥ झूठी साखमें रौंच रहे हैं, फूटी आंख गँवारकी ॥ बारंबार पुकार कहत हौं, मोहि शरम सिरजनहारकी ॥ कहैं कवीर या बिनस जायगी, छिनमें काया छारकी ॥