कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 868, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(८५४)
कबीरपंथी-
शब्द २५५-कोई पिये पियाला प्रेमका, दया दुलीचा ऊपर बैठो, तिमर नाश गये नैनका ॥ टेक ॥ ज्ञानकी कुंडी विवेकका घोटा, छानो उत्तम नेमका ॥ पांच पचीस घोटक काढो, औबल चाखा प्रेमका ॥ आठो जाम रहो मतवाला, अनलपछि कोई गगनका ॥ रोम रोम भरपूर रहा है, मार लिया दल मनका ॥ जल तरंग जलहीसे उपजे, धोखा मिट गये फैनका ॥ कहैं कवीर दया सतगुरुकी, ठौर पाये सुख चैनका ॥
शब्द २५६-काया चलत प्रान काहे रोई ॥ टे० ॥ तुम्हरे संग बहुत सुख कीन्हो, नित उठ मल मल धोई ॥ तुमतो हंस चले घर अपने, हमको चलत बिगोई ॥ हंस कहै सुन काया बौरी, मेरो तेरो संग न होई ॥ तोसे घट बहुतेरे छोड़े, संग न लागे कोई ॥ लट छरियाय वाके माता रोवे, खाट पकर वाके भाई ॥ आंगनमें जाके तिरिया रोवै, हंस अकेला जाई ॥ शिव शनकादिक औ ब्रह्मादिक, शेष सहस मुख जोई ॥ जिन जिन देह धरी दुनियामें, थिर ना रहिया कोई ॥ पाप पुन्य दोउ जनमसंघाती, समुझ देख नर सोई ॥ कहैं कवीर प्रभु पूरनकी गति, बूझे विरला कोई ॥
शब्द २५७-करमगति टारिहु नाहिं टरे ॥ गुरु वशिष्ठ महासुनि ज्ञानी, लिख लिख लगन धरे ॥ टेक ॥ सीता हरन मरन दशरथको, बन बन बिपति परे ॥ कहाँ वे राहु कहाँ वे रवि शशि, आन संजोग परे ॥ सतबादी हरीचंद राजा, नीच घर नीर भरे ॥ दुरबासा ऋषि आप दियो है, जदुकुल नाश करे ॥ पंडवनके हरि सदा साथी, सो भी बन बन बिचरे ॥ तीनों लोक कर्मगतिके बस, जीवनसे काह सरे ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, भूला भटक मरे ॥
शब्द २५८-नामको या बिधि ध्यान धरे । जैसे अमली अमलको चाहे, छिन छिन सुरत करे ॥ टे० ॥ जो लग अमली