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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(८५५)

अमल न पावै, तो लग तलफ मरै॥ फनि मनियां भुई काढ़ धरत है, फैलके ओस चरै ॥ कछू चरै कछू मन तन चितवे, विछुरत तलफ मरै ॥ जैसे सती जरै पियके संग, नेक न सोच करै ॥ आपन चरि पियाको लेके, विहँसत जाय जरै॥ जैसे सुरत गगनको चाहे, महलन खोज करै ॥ कहै कवीर सुनो भाइ साधो, भूला सो भटक मरै ॥

शब्द २५९-रस भँवर गुफामें अजर झरै ॥८०॥ गंगा जमुना मध्य सरस्वति, नाद बिंदसे गाँठ जुरै ॥ आसन मार अमृतसर चाखे, दिलकी दुविधा दूर करै ॥ दस दरवाजे तारी लागी, कोइ कोइ हंसा ध्यान घरै ॥ कहै कवीर सुनो भाई साधो, अजर अमर कबहुँ न मरै ॥

शब्द २६०-कूंची घडाय लावो बिन लोहराके ॥ टेक ॥ नरम निहाय नरम है औटन, ज्ञानके हथौरासे चोट घलाय लावो ॥ खालहि खाल खालपर सोहै, वोहँ सोहँ दोय पवन डोलाय लावो ॥ संसे खीच बज्रको पकड़े, पानी बानी जायके डुझाय लावो ॥ साहेब कवीर कूंची घड लाये, खोल किंवरवा दरस कराय लावो ॥

शब्द २६१-जाय रे दिनही दिन देहा । कर ले बावरे तू नाम सनेहा ॥ टेक ॥ बालापन गये जोबन जन जासी । फिर फिर या जोनी संकट आसी ॥ पलटे केस नैन जल छाये । मूरख चेत बुढापा आये ॥ नाम लेत लज्जा ना कीजै । पल पल अवध घटै तन छीजै ॥ सत्त नाम जे चितहिं बिसारा । कहै कवीर सोई जन हारा ॥

शब्द २६२-जारों भैया जगकी चतुराई । प्रभुको नाम लेत ना कबहुँ, जिन यह देही जुगति बनाई ॥ टेका ॥ जोरत दाम काम अपनेको, हम खैहैं लरका बिलसाई ॥ सो धन राजा चोर ले जैहैं,