कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
रहो सहो ले जात जँमाई ॥ या माया कलवारन कहिये, मद पिवाय राखै बिलमाई ॥ एक जे परे धरनमें लोटे, एक कहे चोखा दे माई ॥ या माया सुर नर सुनि डसिया, देवा देवा बैठी खाई ॥ कोइ कोइ भाग बचे शरनागत, जासो माया रही लजाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधू, ले फांसी हमहूँ पर धाई ॥ गुरु प्रताप संतनकी संगति, अब हम रहे निशान बजाई ॥
शब्द २६३—ऐसी रहन रहे सो बैरागी। सदा उदास नाश मायासे, सत्तनाम अनुरागी ॥ टे० ॥ क्षमाकि कंठी शील सुमिरनी, सुमति सुमरती जागी ॥ टोपी अभयगत माथेपै, कलह कलपना त्यागी ॥ ज्ञानगूदरी मुक्ति मेखला, सहज सुई ले त्यागी ॥ जुगत जमात कूबरी करनी, अनहद धुन लौ लागी ॥ शब्द अधार अधारी कहिये, भीक दयाकी मांगी ॥ कहैं कवीर प्रीति सतगुरुसे, सुरति निरंतर लागी ॥
शब्द २६४—कोई दोष न दीजै, करमकि बात नियारी ॥ टे० ॥ काहे बकुला स्वेत बरन भये, काहे कोयल कारी ॥ काहे कूप जल मीठो लगत है, काहे ससुंदर खारी ॥ काहे मूरख राज करत है, पंडित काहे भिखारी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, गुरु चरनन बलिहारी ॥
शब्द २६५—अब मोहि ऐसेही बनि आई ॥ भावे कोई निंदे भावे कोई बंदे, छोडेउं लोक बडाई ॥ कुलसो निकस भई जग गनिका, फिर ना कुलहि समाई ॥ हाथीको दंत कटे सुख बाहिर, फिर ना सुखमहैं जाई ॥ कोटन लंघन करत केहरी, भूखे घास न खाई ॥ सौ जोजन मरजाद सिंधुकी, जल अचवे ना भाई ॥ सो जल पीवे कोई संत बिवेकी, जिनकी भरी तलाई ॥ भवसागर तरबेके कारन, नामकी नाव बनाई ॥ हलके हलके पार उतर गये,