कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 864, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(८५०)
कवीरपंथी-
शब्द २४०-साई मिलना नहीं आसानका ॥ टे० ॥ साईका मिलना बरतके चढना, चित चूके किस कामका ॥ सतीको सत् सूरमाको रन है, सनमुख घाव सहे बानका ॥ कहे सुने कछु काम न आवे, भर्म न मिटे जिव जानका ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, कठिन पंथ गुरुज्ञानका ॥ ❁
शब्द २४१-साई तेरा नाम बिना न उबारा ॥ टे० ॥ काम क्रोध औ लोभ मोहसंग, ये चारों बटपारा ॥ इनके बस जीव भुलाने, कैसे उतरे पारा ॥ आशा तृष्णा मनसा डाकिन, खाये जग संसारा ॥ कनक कामिनिके बस परिया, का करे जीव विचारा ॥ साधुके संग परम आनंदा, सहजे उतरे पारा ॥ सतगुरु खोज संतसे बूझो, कहें कवीर विचारा ॥ ❁
शब्द २४२-साई तेरे तकियामें जाना जरूर ॥ टे० ॥ खांड चिरोंजी मन नहीं भावे, साई तेरे टुकरा कबूल ॥ शाल दुशाला मन नहीं भावे, साई तेरी गुदरी कबूल ॥ कोट अटारी मन नहीं आवे, साई तेरे झुंपडा कबूल ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधू, साहेब हाल हजूर ॥ ❁
शब्द २४३-साई तेरे मत बिन नर नहीं छूटे ॥ जौलग पंथ न गहे पियाके, जम गये बडे घर लूटे ॥ टे० ॥ आयो नेम प्रेम परकाशा, छाडो कुल व्योहारा ॥ सरगुन निरगुन दोड छोडके, समुझके होजा न्यारा ॥ जैसे काग रहत वोहितमें, तैसे जगके प्रानी ॥ तज अनरीत प्रीत कुल लब्बा, सुरत फिरे भटकानी ॥ जौलग सत साहेब ना चीन्हे निहअछर लख आवे ॥ घटवरिया तोहे जान न देहै, सब तकलीफ बनावे ॥ है अजगैब गैब होय आया, ताहि कहो करतारा ॥ कहे कवीर चेत नर अंधा मैं बहु भांत पुकारा ॥ ❁