कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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शब्द २३६-जपो मन सतगुरु सत् कवीर ॥ टेक ॥ भौसागरसे जीव उबारै, जमके कागद चीर ॥ साह दमोदर बुडत बचावे, रतनागरके तीर ॥ ईंद्रमतीको लोक पठाये, काटे जमके पीर ॥ साहब कवीर मिले गुरु पूरे, देखत मन भौ थीर ॥
शब्द २३७-सतगुरु ज्ञानकि गांसी मारा । तीर न मारा तरवार न मारा, शब्दके मारा न्यारा ॥ टेक ॥ आंखभी अंधा कानभी बहरा, पांव अपंग कर डारा ॥ औषद मूल कछु ना लागे, का करे वैद विचारा ॥ कच्चा कोट पक्का दरवाजा, घायल आन पुकारा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, तीर निकसगो पारा ॥
शब्द २३८-हमारे मन बस गये साहब कवीर ॥ टेक ॥ काशीमें गुरु प्रगट भये हैं, गुनके गहिर गंभीर ॥ काशी तज मगहरमें आये, दोई दीनके पीर ॥ एक दिन साहेब बेन बजाये, कालिंदीके तीर ॥ सुर नर सुनि सब छकित भये हैं, छक गये जमुना नीर ॥ कोई गाडे कोई अगिन जरावे, कोई न धरना थीर ॥ चार दागसे न्यारा साहब, बिनसत नाहिं शरीर ॥ जगन्नाथके मंदिर थापे, हट गये सागर नीर ॥ दास मलूक सलूक कहत है, खोजो खसम कवीर ॥ *
शब्द २३९-पढो मन ओंनामासिंध ॥ टेक ॥ ओंकारते सब जग सिरजा, है वाहीका रंग ॥ वो तो पुरुष सबनसों न्यारा, कर वाहीका संग ॥ नाम निरंजन नैना माते, नाना रूप धरंग ॥ निरंकार निरगुन अविनाशी, निरखत सबके अंग ॥ माया मोह मगन होय नाचे, माते मत्त मतंग ॥ माटीके तन थिर ना रहता, मन मायाके संग ॥ शील सुभाव दयाके दरपन, सदा सम्हारो अंग ॥ साधुके बचन सत् कर माने, सिरजनवाला संग ॥ धत्ता ध्यान धरो दिल अंदर, लिख ले नाम अनंद ॥ गोरख जोगी मिले सतसंगी, नाम कवीर सोहंग ॥ *