कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 845, कुल 968 में से
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पानीमें उपजे, पानी बिनसे, पानीके पंडित ज्ञानी । दस औतार पीर पैगंबर, पानीमें चारों खानी ॥ पानीके यह सकल रंग है, ताहि देख नर भूला । चिंता तेज कलप नहीं छूटे, फिर फिर संकट झूला ॥ पानीकेरे सकल भोग हैं, पानी सुखके रासी । जो पानीका मरम न जाने, सो भरमें चौरासी ॥ पानी ताता पानी सीरा, पानी खट्टा मीठा खारा । पानी झलक सपेद जरद है, लाल हरा औ कारा ॥ हिंदू तुरुक कहें हम दोनों, एक पानीते सिरजे । आपुसमें दोऊ लड़े मरत हैं, दुबधामें दोऊ उरझे ॥ पानी काया पानी माया, जित देखो तित पानी । पानीको करता घट भीतर, बोलत अमृत बानी ॥ जोग यज्ञ तीरथ व्रत संजम, ज्ञान ध्यान ले आया । कहैं कवीर एक समुझे बिन, काहू कछू न पाया ॥
शब्द १८३-मेरी प्रीत लगी गुरु नामसो ॥ टे० ॥ जैसे प्रीत है चंद चकोरकी, एकटक नैना ध्यानसो ॥ जा तन लगी सोई तन जाने, कठिन चोट गुरु ज्ञानसो ॥ जैसे मीन नीरके बिछुरे, तन मन तलफत प्रानसो ॥ भासिन प्रीत करि सतगुरुसों, छोड़ विरह रस कामसो ॥
शब्द १८४-दया करी गुरु जुगत बताई । आपा चीन्हे भरम नशाई ॥ टेक ॥ आपा चीन्हे त्रिभुवन सूझे । गुरु प्रताप कालसे जूझे ॥ बहुर न भटको रे नर भाई । पाप पुन्यको बीज नशाई ॥ पाप पुन्य दोनों कस बाती । जनम जनम इन जारी छाती ॥ काम कसाई क्रोध चंडाला । आशा बैरन तृष्णा काला ॥ लोभ डौमरो निद्रा डारा । मनसा चोर दियो दुखभारा ॥ कनक कामिनी कलहुको भोंडो । इन ठगनोने सब जग डाँडो ॥ कैसे छूटे मोहको फंदा । कैसे खिजमत पावे बंदा ॥ कैसे भँवर कमल जो पावे । कैसे जग जंजाल नशावै ॥ जब सतगुरुने सार मत दीन्हा । बडे