कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 846, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(८३२)
कवीरपंथी-
भागसे आतम चीन्हा ॥ बडे भागसे आतम जागे । कहें कवीर जबही भरम भागे ॥
शब्द १८५-साधू यो संसारमें, कमला जल माही ॥ सदा सर्वदा संग रहहे, जल परसत नाहिं ॥ टे० ॥ जुगत जान जलकूकरी, जल मध्य रहाई । पानी पंख न लागई, कछु कसरत पाई ॥ मीन तेर जल ऊपरे, कछु लगत न भारा । आड अटक माने नहीं, पैरे जल सारा ॥ जुगत जमूरा पाइया, सरपे लपटाई । वाको बिष व्यापे नहीं, गुरुगम्य बताई ॥ स्वीर खांड घृत भोजना, करसो लपटाई । जिभ्याको लागे नहीं, वाका चिकनाई ॥ भगल कला नट खेलेई, घर न्यारा न्यारा । खंड बिहंडल होरहे, ज्योंका त्यों सारा ॥ जैसे सीष समुद्रमें, चित धरत अकाशा । ऐसे पपीहा स्वातीको, नित प्यासा प्यासा ॥ कुंज ग्रह का संचरे, वाका को रखवारा । भौमें गलते राखिया, ऐसे गुरु हमारा ॥ बंबीमें बिषधार बसे, कोई पकर न पावे । कहें कवीर गुरु मंत्रसो, सहजे चलि आवे ॥
शब्द १८६-वा घरमें तुम घर करो, घर बहुर न होई ॥ कोट कल्प जुग बीतिया, बिनसे नहीं कोई ॥ टे० ॥ सैतन नीव गहरी दई, दे विवेकको गारा । सारशब्द ईंटे दई, गुरु राज हमारा ॥ भक्ति महल ऊंचे बने, धीरज घर पाटे । सत सुकित छहियां करो, पावे सिरके साटे ॥ प्रेम संदला गारके, गच प्रीतिसों डारे । शील दुलीचा डारके, साधुन बैठारे ॥ दया क्षमा चौकी करो, राखो घर बारा । कहे कवीर सतगुरु मिले, तब होय उबारा ॥
शब्द १८७-गुरुजी समुझ पकड़ियो बाँहीं ॥ जो बालक झुन- झुनियां खेले, सो बालक हम नहीं ॥ टे० ॥ हमतो लेहीं सत्तका सौदा, परपंच पूजत नहीं । चौदासो चेला तुम जो कीन्हे, ले धरिहो केहि ठाहीं ॥ जियत ठिकानो सर्बहि बतावे, सुए ठिकानो