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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(८३३)

काहीं । जो तुम्हरे कछु उद्यम नाहीं, भीख मांग किन खाहीं ॥ मूल सजीवन जानत नाहीं, मत परबोधा काहीं । नाव तुम्हरी करिया नाहीं, लहर उठे विकरारा । गुरु सहित सब चेला बूड़े, कौन उतारे पारा ॥ सूखे काटे जो घुन लागे, लोहे लागे काई । बिन परतीत गुरु का कीजे, काल घसीटे जाई ॥ अमृतकुंड सदाकी चौकी, बेली बेला राखे । नेवर देखे विषहर कंपे, चपल अमीरस चाखे ॥ माया आय चौकमें बैठी, नवल विवाहन आहीं । दये कपाट महलमें पौड़े, अब कछु संशय नाहीं ॥ समझ न होय तो समझो गुरुजी, नातर होत बिगारा । कहैं कवीर सुनो रामानंद, यह सिख लेउ हमारा ॥

शब्द १८८—नगरीया वौरी कोई चतुर न पावे पार ॥ टे० ॥ साकट सूकर कूकरा, तीनोंका मत एक ॥ कोट जतन परबोधिये, तऊ न छाड़े टेक ॥ तास नाम बेगमपुरा, बसे सो बेगम होय ॥ या नगरी जो घर करे, बहुरि न आवन होय ॥ जात बरन यहाँ है नहीं, दरस दिवाना देश ॥ जतन जतनसों पाइये, बहुरि नहीं धरे भेश ॥ पांच तत्त्व तत्त्वहि मिले, पढ़ि समाने ग्रान ॥ ज्ञान ध्यान पैड़े थके, ततका ना गलतान ॥

शब्द १८९—जिनकी गगन घटा घहरानी ॥ चमको बीज भयो उजियारो, मिट गई तिमिर निशानी ॥ टे० ॥ ज्ञान ध्यानके बैल चराये, खेत जोत निरबानी ॥ दुबिधा दूब खोद किन डारो, फिर बोवो नामकी धानी ॥ अपनी अपनी बंधिया बांधो, बहि न जाय कहुं पानी ॥ चित चेतन रखवारे राखो, चरि न जाय मिरगानी ॥ उपजे खेत नाज घर आवे, आनंद मगन किसानि ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, तृष्णा तपन बुझानी ॥

कवीरपंथी शब्दावली २७