कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
आपुन पहुँ लायो॥ कहैं कवीर मगन भये मनुवाँ, ज्यों गूंगा गुड खायो ॥ वाके स्वाद कहै अब कासों, मनही मन मुसकायो ॥
शब्द २०३ सतगुरु शब्द है अगम अगोचर, रहन गहन विन लख न परे ॥ टे० ॥ अनहद तार गगनमें बाजे, विन समुझै कछु लख न परे ॥ सुरत समेट धरो घट भीतर, सहजे सरवन अवाज परे ॥ उठत तरंग नाना विध बानी, भिन्न २ ज्ञानकार करे ॥ सुर गंभीर राग अतुरागी, चितदे सुनै ताको काज सरे ॥ सुन अनहद मनको बस करले, निरख परख निरधार करे ॥ सुन्न सिखर छाजेके ऊपर, मगन हुवा जम काह करे ॥ आदि अघर अस्थान पुरुषको, जहां वह बैठ कलोल करे ॥ सदा समीप रहत समर्थके, हंस हिरंमर चँवर ठरे ॥ छबि निरखो समर्थकी मूरत, कोट भान परकाश करे ॥ कहैं कवीर निज बानी दरसे, जब सतगुरु दिव्य दिष्टि करे ॥
शब्द २०४-नाम बिना धिग धिग नर नारी । तुम कहैं आय कियो संसारी ॥ टे० ॥ धिग वह रसना धिग वह ज्ञाना । आतम राम नहीं पहिचाना ॥ गरभ मुची मुच भई किन वंझा । सूकर स्वान फिरे गुलमुंझा ॥ जेहि कुल पुत्र ना भक्ति विचारी । बिधवा काहे न भई वह नारी ॥ गनिका पुत्र पिता कासों कहई । विन गुरु चेला ज्ञान न लहई ॥ बिधवा नारी करे सिंगारा । शोभा न पावे विन भरतारा ॥ राज बिना कैसो रजपूता । ज्ञान बिना कैसो अवधूता ॥ कहैं कवीर हम कहत न डरहीं । अंधे ना सूझैं तो हम का करहीं ॥
शब्द २०५-मेहदी-देवराके पिछवार रोचन, मेहदी हम भई मोरे लाल ॥ टे० ॥ या काया नगर मंझार, माया रूप बजार है मोरे लाल ॥ काम क्रोध मद लोभ तृष्णा, एक अनुप है मोरे लाल ॥