कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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तृष्णाको सब कोई लेय दया धरम नहिं चीन्हें मोरे लाल॥ या मनुवां है मुगध गँवार ओछी संगत लेरहो मोरे लाल॥ पांच पचीसको खेल निरगुन, काहु न चीन्हे मोरे लाल॥ या त्रिकुटी सोहंगम नार, सोहे सोहे होत है मोरे लाल॥ कहे कवीर बिचार संतन, पार उतारो मोरे लाल॥
शब्द २०६-पावस रिनु जबही जानवी आई॥ टे० ॥ जब तेरी निज दसा पलटी है, दुरिहै नहीं दुराई॥ खेत कुखेत वंजर औ भाटो, बरन भेद मिटजाई॥ जब या तनकी तपन बुझेहै, गगन गरजबरसाई॥ कहे कवीर रविउला ढांकिये, नदिया बार अघाई॥
शब्द २०७-गुरु दीजो दस दीदार, जामैं मन मगन रहे॥ टे० ॥ काहेके डंडिया करो, काहेके अजगर खंभ । तन तरवर डंडिया करो, मन कर अजगर खंभ॥ काह छवाऊं गुरुके झार झरोखा, काह छवाऊं चौपार । पानन छवाऊं गुरुके झार झरोखा, फूलन छवाऊं चौपार॥ बाहरसे गुरु भीतर आये, जगमग जोत अपार । धरम किवरिया खोलो मेरे सतगुरु, हंसा ठाढे द्वार॥ प्राननाथ एक बानी बोले, छत्रशाल बलिहार॥ ❁
शब्द २०८-जियरा जायगा हम जानी॥ टेक॥ पांच तत्त्वके पींजरामैं, जामैं वस्तु बिरानी॥ लोभ लहर बिच आयके, बूड मरे बिन पानी॥ तन भी जैहै मन भी जैहै, जैहै मखमल खासा॥ लाख टकाकी जिदगी जैहै, एक दिन जंगल बासा॥ दस भी जैहै बीस भी जैहै, जैहै वरस पचासा॥ बीसा सौ कोई बिरला रहिहै, फिर मरनेकी आशा॥ राज करंते राजा जैहै, रूप धरंती रानी॥ वेद पढंते ब्रह्मा जैहैं अरु जैहैं अभिमानी॥ चंदा जैहैं सूरज जैहैं, जैहैं पवन औ पानी॥ कहे कवीर ते संत न जैहैं, जिनकी मत ठहरानी॥