कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
शब्द २०९-मेरा हो प्यारे सतगुरु साँइयां॥टेक॥ बह्यो जात थो भौसागरमें, गह लीन्ही प्रभु बहियां ॥ अगम निगम जाको पार न पावे, अगम पंथ दरसहियां ॥ सबद सरूप सो जिन रित मानी, ते भौजल निधि पहियां ॥ संतदास सो सतगुरु महिमा, और जतन नहिं लहियां ॥ ✽
शब्द २१०-दिन दिन जोबन जात हैं, पियसो मिल नार॥टेक॥ दिनते रैन रैनते रजनी, घरि घरि पल छिन होत अवार ॥ मिलना होय तो अबही मिलले, तन छुटे कछु वार न पार ॥ माझ धार नावरिया अटकी, पल ना लगे इहां कहधो बिचार ॥ जाना तुझे पारको चहिये, इहां खेवट सबही मतवार ॥ तेरो पिया तोहीमें दरसे, ज्ञान रतन ले सांचे ढार ॥ काशीराम काम साहब सो, सतगुरु खेड़ लगावौ पार ॥ ✽
शब्द २११-जोगी मन ना रंगावे, रंगावे कपडा॥टे०॥ तिल तिल जोर सरी बनाये, सिरजनहार नहीं पकरा ॥ या ठिकराके मरम न जाने, भटकत फिरे जंगल सेहरा ॥ सब सुख छाड़ जंगलमें बैठे, काम जराय भये हिजरा ॥ आसन मार डिभ धर बैठे, दाठी रखाय भये बकरा ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, साहेब छोड़ पुजे पथरा ॥
शब्द २१२-जोगी जन जागत रहिये भाई ॥ जागत रहिये चौकस करिये, चोर मूस ना पाई॥टे०॥ तस्कर तरन रहन मन चित कर, कंद्रप लेत चुराई ॥ चितके चले मन चले मुनिके, तनके चले व्रत जाई ॥ रस कस लेत चुराय नागिनि, बुध बल करके खाई ॥ ऊषहिते छोई कर डारी, नेकु न रहे मिठाई ॥ शृंगीऋषि बन भीतर लूटे, लेगइ संग लुगाई ॥ घृत पावक नर- नार संग रहु, विरला जन ठहराई ॥ जोगी जती तपी सब लूटे,