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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

(८४०)

कवीरपंथी—

आपुन पहुँ लायो॥ कहैं कवीर मगन भये मनुवाँ, ज्यों गूंगा गुड खायो ॥ वाके स्वाद कहै अब कासों, मनही मन मुसकायो ॥

शब्द २०३ सतगुरु शब्द है अगम अगोचर, रहन गहन विन लख न परे ॥ टे० ॥ अनहद तार गगनमें बाजे, विन समुझै कछु लख न परे ॥ सुरत समेट धरो घट भीतर, सहजे सरवन अवाज परे ॥ उठत तरंग नाना विध बानी, भिन्न २ ज्ञानकार करे ॥ सुर गंभीर राग अतुरागी, चितदे सुनै ताको काज सरे ॥ सुन अनहद मनको बस करले, निरख परख निरधार करे ॥ सुन्न सिखर छाजेके ऊपर, मगन हुवा जम काह करे ॥ आदि अघर अस्थान पुरुषको, जहां वह बैठ कलोल करे ॥ सदा समीप रहत समर्थके, हंस हिरंमर चँवर ठरे ॥ छबि निरखो समर्थकी मूरत, कोट भान परकाश करे ॥ कहैं कवीर निज बानी दरसे, जब सतगुरु दिव्य दिष्टि करे ॥

शब्द २०४-नाम बिना धिग धिग नर नारी । तुम कहैं आय कियो संसारी ॥ टे० ॥ धिग वह रसना धिग वह ज्ञाना । आतम राम नहीं पहिचाना ॥ गरभ मुची मुच भई किन वंझा । सूकर स्वान फिरे गुलमुंझा ॥ जेहि कुल पुत्र ना भक्ति विचारी । बिधवा काहे न भई वह नारी ॥ गनिका पुत्र पिता कासों कहई । विन गुरु चेला ज्ञान न लहई ॥ बिधवा नारी करे सिंगारा । शोभा न पावे विन भरतारा ॥ राज बिना कैसो रजपूता । ज्ञान बिना कैसो अवधूता ॥ कहैं कवीर हम कहत न डरहीं । अंधे ना सूझैं तो हम का करहीं ॥

शब्द २०५-मेहदी-देवराके पिछवार रोचन, मेहदी हम भई मोरे लाल ॥ टे० ॥ या काया नगर मंझार, माया रूप बजार है मोरे लाल ॥ काम क्रोध मद लोभ तृष्णा, एक अनुप है मोरे लाल ॥

शब्दावली

(८४१)

तृष्णाको सब कोई लेय दया धरम नहिं चीन्हें मोरे लाल॥ या मनुवां है मुगध गँवार ओछी संगत लेरहो मोरे लाल॥ पांच पचीसको खेल निरगुन, काहु न चीन्हे मोरे लाल॥ या त्रिकुटी सोहंगम नार, सोहे सोहे होत है मोरे लाल॥ कहे कवीर बिचार संतन, पार उतारो मोरे लाल॥

शब्द २०६-पावस रिनु जबही जानवी आई॥ टे० ॥ जब तेरी निज दसा पलटी है, दुरिहै नहीं दुराई॥ खेत कुखेत वंजर औ भाटो, बरन भेद मिटजाई॥ जब या तनकी तपन बुझेहै, गगन गरजबरसाई॥ कहे कवीर रविउला ढांकिये, नदिया बार अघाई॥

शब्द २०७-गुरु दीजो दस दीदार, जामैं मन मगन रहे॥ टे० ॥ काहेके डंडिया करो, काहेके अजगर खंभ । तन तरवर डंडिया करो, मन कर अजगर खंभ॥ काह छवाऊं गुरुके झार झरोखा, काह छवाऊं चौपार । पानन छवाऊं गुरुके झार झरोखा, फूलन छवाऊं चौपार॥ बाहरसे गुरु भीतर आये, जगमग जोत अपार । धरम किवरिया खोलो मेरे सतगुरु, हंसा ठाढे द्वार॥ प्राननाथ एक बानी बोले, छत्रशाल बलिहार॥ ❁

शब्द २०८-जियरा जायगा हम जानी॥ टेक॥ पांच तत्त्वके पींजरामैं, जामैं वस्तु बिरानी॥ लोभ लहर बिच आयके, बूड मरे बिन पानी॥ तन भी जैहै मन भी जैहै, जैहै मखमल खासा॥ लाख टकाकी जिदगी जैहै, एक दिन जंगल बासा॥ दस भी जैहै बीस भी जैहै, जैहै वरस पचासा॥ बीसा सौ कोई बिरला रहिहै, फिर मरनेकी आशा॥ राज करंते राजा जैहै, रूप धरंती रानी॥ वेद पढंते ब्रह्मा जैहैं अरु जैहैं अभिमानी॥ चंदा जैहैं सूरज जैहैं, जैहैं पवन औ पानी॥ कहे कवीर ते संत न जैहैं, जिनकी मत ठहरानी॥

(८४२)

कवीरपंथी-

शब्द २०९-मेरा हो प्यारे सतगुरु साँइयां॥टेक॥ बह्यो जात थो भौसागरमें, गह लीन्ही प्रभु बहियां ॥ अगम निगम जाको पार न पावे, अगम पंथ दरसहियां ॥ सबद सरूप सो जिन रित मानी, ते भौजल निधि पहियां ॥ संतदास सो सतगुरु महिमा, और जतन नहिं लहियां ॥ ✽

शब्द २१०-दिन दिन जोबन जात हैं, पियसो मिल नार॥टेक॥ दिनते रैन रैनते रजनी, घरि घरि पल छिन होत अवार ॥ मिलना होय तो अबही मिलले, तन छुटे कछु वार न पार ॥ माझ धार नावरिया अटकी, पल ना लगे इहां कहधो बिचार ॥ जाना तुझे पारको चहिये, इहां खेवट सबही मतवार ॥ तेरो पिया तोहीमें दरसे, ज्ञान रतन ले सांचे ढार ॥ काशीराम काम साहब सो, सतगुरु खेड़ लगावौ पार ॥ ✽

शब्द २११-जोगी मन ना रंगावे, रंगावे कपडा॥टे०॥ तिल तिल जोर सरी बनाये, सिरजनहार नहीं पकरा ॥ या ठिकराके मरम न जाने, भटकत फिरे जंगल सेहरा ॥ सब सुख छाड़ जंगलमें बैठे, काम जराय भये हिजरा ॥ आसन मार डिभ धर बैठे, दाठी रखाय भये बकरा ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, साहेब छोड़ पुजे पथरा ॥

शब्द २१२-जोगी जन जागत रहिये भाई ॥ जागत रहिये चौकस करिये, चोर मूस ना पाई॥टे०॥ तस्कर तरन रहन मन चित कर, कंद्रप लेत चुराई ॥ चितके चले मन चले मुनिके, तनके चले व्रत जाई ॥ रस कस लेत चुराय नागिनि, बुध बल करके खाई ॥ ऊषहिते छोई कर डारी, नेकु न रहे मिठाई ॥ शृंगीऋषि बन भीतर लूटे, लेगइ संग लुगाई ॥ घृत पावक नर- नार संग रहु, विरला जन ठहराई ॥ जोगी जती तपी सब लूटे,

शब्दावली

(८४३)

तिहुपुर फिरी दोहाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, मारत ढोल बजाई ॥

शब्द २१३-भजन कब करिहौ जनम सिरान ॥ टे० ॥ गरभ बासमें भगति कबूले, बाहर आयके गये खुलान ॥ बालापनमें खोय गँवाये, तरुनामें अभिमान गुमान ॥ वृद्ध भये तन थाकन लागे, शिर धुनि धुनि मनुवाँ पछतान ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, जमके हाथमें गये विकान ॥

शब्द २१४-भजन दिन रे बीता जात ॥ टेक ॥ करले भजन भलो तन पायो, भजन बिना सुख पाया किन रे ॥ उपजत बिनसत जुग चारों गये, बेद विचारत गये गन सुनि रे ॥ पलमाँही परले हो जैहै, बिनसत लगे घरी ना छिन रे ॥ कहे कवीर भजन कर वाके, पानीसे पिंड सँवारा जिन रे ॥

शब्द २१५-भजन कर निशि दिन टूटे न तार ॥ टेक ॥ एक ब्रह्मका सकल पसारा, घरि घरि पल पल लिजे संभार ॥ या मन मिलिया साधन सो रे, सोहैं शब्दकी लगी लगार ॥ निश दिन भजन करो सतगुरुके, काया मधे है ततसार ॥ कहे कवीर सुनो भाई साधो, बिन सतगुरु ना होय उबार ॥

शब्द २१६-भजन कर जगमें जीवन सार ॥ टेक ॥ नर देहीको गरब न करिये, जर-बर होय छिनमें छार ॥ पाँचों मार पचीसों बस कर, जमराजाकी चोट संभार ॥ नदिया गहरी नाव पुरानी, बिन सतगुरु कैसे उतरे पार ॥ कहैं कवीर सतगुरुके भजन कर, भौसागरसे उतरो पार ॥

शब्द २१७-भजनको भाईरे ऐसो तन पायके ॥ टे० ॥ नाहिं रहै लंकापति रावन, नाहिं रहै दुर्योधन राई रे ॥ मात पिता सुत भाई बंद ठाढे, आइ जमराज पकर ले जाई रे ॥ लाल खंभ पर

(८४४)

कवीरपंथी—

देत ताड़ना, बिन सतगुरु को होत सहाई रे॥ धरमदासके अजर गोसाई, नाम कवीर कहो गोहराई रे ॥ ✽

शब्द २१८—जनम यह देखा देखी जात॥ टेक॥ ज्यों अंजुरीको नीर घटत है, ज्यों तरवरसे टूटै पात॥ चार पहर धंधेमें खोये, रैन गँवाये सोवत खात॥ जब जमराजा आन गहेगा, पकर जीभ तोहि मारे लात॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, कहालो कहों तेरी उतपात॥

शब्द २१९—तकसीर भई है कैसे, मैं पियाको मनाऊं॥ टे०॥ पांच पचीस मोहि रोकत टोकत, तीनों गुनसे बचाऊं॥ लिख लिख पतियां भेजों अमरपुर, मरजी होय तो आऊं॥ दीनदयाल दया कर जन पर, साहेब दरशन पाऊं॥ धरमदासने पाये कवीर गुरु, करमचूक बगसाऊं॥ ✽

शब्द २२०—कैसे जाऊं महलमें अटपट अगम चढाई॥ टेक॥ दश दरवाजा बने महलके, सात सिंधु सोरा खाई॥ चांद सूर दोय इत उत लागे, सुखमन सेज बिछाई॥ सतगुरु बहियां नाम- सनेही, बांह पकरि ले जाई॥ धरमदासने पाय कवीर गुरु, सबद सुरत मिल जाई॥

शब्द २२१—जो मैं साहब पाऊं, नेनोदी मांझ बसाऊं॥ टे०॥ नेनोदी मांझ बसे मोरे प्रीतम, उरसे पलक न लाऊं॥ एकटक ठाठी चरण निहारों, पलपल चौरं डुराऊं॥ त्रिकुटी महलमें बने झरोखा, दीदारोंदी सेज बिछाऊं॥ रोम रोम पिया संग राची, आनंद मंगल गाऊं॥ बिछूरे प्रीतम जो मैं पाऊं, तब स्यानी होय जाऊं॥ धरमदासके अरज गोसाई, सिंधुमें बूंद समाऊं॥ ✽

शब्द २२२—गुरु मोरे बहियाँ जनि छाड़ो पकरके॥ टेक॥ बहे जात थी भौसागरमें, काठ लियो जिन अपनो करके॥ ध्रुव

शब्दावली

(८४५)

प्रहलाद बचे करनीसे, तिनहुको लूटे छलबल करके॥ शृंगीऋषि पाराशर लूटे, शंकर लूटे बन बन करके ॥ साहेब कवीर मिले गुरु पूरे, रख लेहु साहब आपन करके ॥ ✽

शब्द २२३-गुरु दरियाव नहानाहो, जाते डुरमत भागे॥ टे०॥ गुरु दरियाव सदा जल निरमल, पैठत उपजत ज्ञाना हो॥ जौलग गुरु दरियाव न पावे, तौ लग फिरत भुलाना हो॥ कोटिन तीरथ गुरुके चरनन, श्रीमुख आप बखाना हो॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, अजर अमर घर जाना हो ॥

शब्द २२४-दिल मगन हुवा जब को बोले ॥ टेक॥ हंसा पाये मान सरोवर, ताल तलैयाको डोले ॥ तेरा साहब है तुजहीमें, बाहर नैनाको खोले ॥ सुरत कलारी मन मतवाली, प्याला पीवे अनतौले ॥ धर्मदासके अरज गोसाईं, साहेब पाये तन बोले ॥ ✽

शब्द २२५-धुन सुनके मनुवा मगन हुवा ॥ लागसमाधि रहो गुरु चरनन, अंदरका दुख दूर हुवा ॥ सार सबदकी डोरी लागीं, ता चढ़ हंसा पार हुवा ॥ सुन्न सिखरपै झालर झलके, झरत अमी रस प्रेम चुवा ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, चाख चाख अलमस्त हुवा ॥

शब्द २२६-गावत कहां गायबो सुन रे ॥ टे० ॥ बाजत ताल पखावज बीना, निरतत अगम निगम नहीं गन रे ॥ अपने कहे कछु काम न आवे, मानत नहीं अपरबल मन रे ॥ सुन चातुर यह बचन हमारा, बिन सतगुरु लख पाया किन रे ॥ कहे कवीर सुनो भाई साधू, जब लख परी अगमकी धुन रे ॥

शब्द २२७-काया गढ़ जीतोर भाई, तेरो काल अवध टर जाई ॥ टेक ॥ भरमकोट चहुँ ओर फिराये, माया ख्याल रचाई ॥ कनककामिनी फंदा रोपे, जन राखे उरझाई ॥ पचीस जाल जाके

(८४६)

कवीरपंथी—

निश्चदिन व्यापे, काम क्रोध दोय भाई ॥ लालच लोभ खडे दरवाजे, मोह करे ठकुराई ॥ पांच मोरचा गढके भीतर, इन्हें नाँच जो जाई ॥ आशा मनसा तृष्णा कहिये, त्रिगुन बंधो है खाई ॥ ज्ञानके घोडा ध्यानके पारख, जुगतकी जीन बंधाई ॥ सतसुक्ति दोउ सिरके ऊपर, विवेक लगाम लगाई ॥ चेतन सुरत चढी ताजीपर, सतगुरु सांग गहाई ॥ मूल कमल सो दौर करी है, कुमतिको मार भगाई ॥ मूल कमलपर डेरा डारे, गुरुको शीश नवाई ॥ छऊ कमल एक सुरमें बेघे, चढे गगन गढ जाई ॥ सात कमल त्रिकुटीके ऊपर, तहवाँ पहुँचे जाई ॥ जोत निरंजन तहाँ विराजे, वेद नेति कहि गाई ॥ आवागमन वेद ना जाने, कुरान रहे ठहराई ॥ आवे न जाय मरे ना जीवे, ताकी खबर न पाई ॥ बंकनालकी घाटी कहिये, तहाँ न पग ठहराई ॥ सोहँ सुर लागे जहाँ दोहरे, अजपा नाम सहाई ॥ कोटि चंद्र सूर तारागन, छत्रकि छाँह छहाई ॥ जोजन एकके पैले कहिये, पुरुष विदेह रहाई ॥ स्वेत चंदेवा स्वेत सिंहासन, स्वेत चौर फहराई ॥ स्वेते फूल फूले निशिबासर, शोभा बरनि न जाई ॥ द्वादश ऊपर मुन्ना फेरे, मन पौना थक जाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, अमर लोकको पाई ॥

शब्द २२८-गगन गढ जीतो रे भाई जहाँ संत करें बादशाही ॥ टेक ॥ कच्चे कोट पके दरवाजा, गहरी जाकी खाई ॥ और मोरचा लगे बत्तीसों, उनमुन तोप झुकाई ॥ तनके बंदुक मनके जामा, प्रीतका प्याला पियाई ॥ अघर छात कुदरतका बंगला, गुरु बिन लियो न जाई ॥ गुरु बिन फौज किलेमें बाढी, अहँकार ठहनाई ॥ नेम धरम ले चल भाई गौरा, छिनमें देत दहाई ॥ उलटी

शब्दावली

(८४७)

नेह गगनको दौरी, भली बनी चतुराई । साहेब कवीर मिले गुरु पूरे, अदले अदल चलाई ॥

शब्द २२९-गगन गढ गेब निशान गड़े ॥ टे० ॥ गाडी मेख सेष शिर ऊपर, डेरा अदल खडे । चन्द्रभान एक तंबू ताने, रवि शशि जोत अडे ॥ संत सिपाही करत चाकरी, सो दरबार लडे । कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, शब्दमें सुरति मडे ॥ ❁

शब्द २३०-मिसलपर जाना होगा ठिकाना ॥ टे० ॥ आया प्यादा तलब तजीरा, जल्दी होगा जाना । माल तुम्हारा जपत हुवा है, अदली देत विराना ॥ जहाँके माया तहाँ लुटाये, बचे न एकौ दाना । साहेब तुम्हारा खफा हुवा है, टोटा परा खजाना ॥ मुंशी दरोगा पकर मँगावे, भगती होगा भरना ॥ जो भगतीमें चक्र परेगा, डार देगा बंदखाना । कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, या पद है निरवाना ॥ जब मोहर पर छाप चढेगी, छूट जायगा बंदखाना ॥ ❁

शब्द २३१-सत मत खेल ले मैदाना ॥ शब्द सिरोही बांध कमरसे, त्रिगुन तीर कमाना ॥ टे० ॥ कडाबीन कमरसे बांधे, माया मोह निशाना ॥ फाँका फरी ज्ञानका, गदका बांध बनेटी बाना ॥ सन्मुख जाय कालसो लड़ई, सोई सूर मरदाना ॥ रंजक नाम ज्ञानका पेटी, बेद बहूद खजाना ॥ तोप धर्मका भर भर मारे, लूटत मुलक विराना ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधु, द्वालीबंदे मस्ताना । सतलोकमें डेरा दीन्हा, सतगुरु हनत निशाना ॥

शब्द २३२-अब तू खबरदार रहो भाई ॥ टे० ॥ सतगुरु दीन्हा माल खजाना, राखौ हिये लगाई ॥ पाव रती भर घटन न पावे, दिन दिन बढ़त सवाई ॥ तन बंदूक सुरतके सिंधरो, ज्ञान गजा ठहराई ॥ प्रेम पलीता हरदम चमके, कर पर राखु चढाई ॥ क्षमा

(८४८)

कवीरपंथी—

शीलके बखतर पहिरे, जुगतके लांग चढाई ॥ नाम टोष माथेपे धरके, जौ भर अनी न आई ॥ पहरेदार सिपाही सांचे, वो नहिं सोवे भाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, छिनपल देत जगाई ॥ ❁

शब्द २३३—सतगुरु निरबानी निरबानी, जाके सुक्ति भरत है पानी ॥ टे० ॥ अष्ट सिद्ध नौ निध करत मजूरी, और विधाता रानी ॥ चंद सूर दोउ बरे मसाले, सुरत गगन ठहरानी ॥ अर्थ धर्म और काम मोक्ष फल, बैल फिरे ज्यों घानी ॥ तहवाँ है एक अगोचर, निगम नेति ना जानी ॥ चार वेद नौ व्याकरण कहिये, अष्टादशो पुरानी ॥ सत्य भगति विन चार पदार्थ, काग विष्ट सम जानी ॥ अवरन वरन रूप सब वाको, गरज गगन चहरानी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, अजरा अमर निशानी ॥

शब्द २३४—सतगुरु अबिनाशी अबिनाशी, जाके सुक्ति रहत है दासी ॥ टे० ॥ ब्रह्मा जाको पार न पावे, निरंजन करे खवासी ॥ सेष सहस्र सुख निशि दिन गावें, सो भी पार न पासी ॥ शंकर जाको ध्यान धरत हैं, कहिये जोग उपासी ॥ चार वेद जाके भेद न जाने, खोज खोज मरजासी ॥ ओंकारमें भरमत डोले, विष्णु फिरे उदासी ॥ नाम पदार्थ हाथ न आवे, परे कालकी फांसी ॥ अजर अमर वे परम पुरुष हैं, कहिये फूल सुबासी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, अमरलोकके बासी ॥

शब्द २३५—सतगुरु आदि संदेसी आये ॥ सोरा असंख जुग वीत गयो है, भेद न काहू पाये ॥ टे० ॥ दुनियाँ रही खुलाय रूबाबमें, सोवत नींद जगाये ॥ दया भाव औं नाम पान ले हंसन पार लगाये ॥ काशीमें सतगुरु प्रगट भये हैं, नाम कवीर कहाये ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, जीवन फंद बुढाये ॥ ❁

शब्दावली

(८४९)

शब्द २३६-जपो मन सतगुरु सत् कवीर ॥ टेक ॥ भौसागरसे जीव उबारै, जमके कागद चीर ॥ साह दमोदर बुडत बचावे, रतनागरके तीर ॥ ईंद्रमतीको लोक पठाये, काटे जमके पीर ॥ साहब कवीर मिले गुरु पूरे, देखत मन भौ थीर ॥

शब्द २३७-सतगुरु ज्ञानकि गांसी मारा । तीर न मारा तरवार न मारा, शब्दके मारा न्यारा ॥ टेक ॥ आंखभी अंधा कानभी बहरा, पांव अपंग कर डारा ॥ औषद मूल कछु ना लागे, का करे वैद विचारा ॥ कच्चा कोट पक्का दरवाजा, घायल आन पुकारा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, तीर निकसगो पारा ॥

शब्द २३८-हमारे मन बस गये साहब कवीर ॥ टेक ॥ काशीमें गुरु प्रगट भये हैं, गुनके गहिर गंभीर ॥ काशी तज मगहरमें आये, दोई दीनके पीर ॥ एक दिन साहेब बेन बजाये, कालिंदीके तीर ॥ सुर नर सुनि सब छकित भये हैं, छक गये जमुना नीर ॥ कोई गाडे कोई अगिन जरावे, कोई न धरना थीर ॥ चार दागसे न्यारा साहब, बिनसत नाहिं शरीर ॥ जगन्नाथके मंदिर थापे, हट गये सागर नीर ॥ दास मलूक सलूक कहत है, खोजो खसम कवीर ॥ *

शब्द २३९-पढो मन ओंनामासिंध ॥ टेक ॥ ओंकारते सब जग सिरजा, है वाहीका रंग ॥ वो तो पुरुष सबनसों न्यारा, कर वाहीका संग ॥ नाम निरंजन नैना माते, नाना रूप धरंग ॥ निरंकार निरगुन अविनाशी, निरखत सबके अंग ॥ माया मोह मगन होय नाचे, माते मत्त मतंग ॥ माटीके तन थिर ना रहता, मन मायाके संग ॥ शील सुभाव दयाके दरपन, सदा सम्हारो अंग ॥ साधुके बचन सत् कर माने, सिरजनवाला संग ॥ धत्ता ध्यान धरो दिल अंदर, लिख ले नाम अनंद ॥ गोरख जोगी मिले सतसंगी, नाम कवीर सोहंग ॥ *

(८५०)

कवीरपंथी-

शब्द २४०-साई मिलना नहीं आसानका ॥ टे० ॥ साईका मिलना बरतके चढना, चित चूके किस कामका ॥ सतीको सत् सूरमाको रन है, सनमुख घाव सहे बानका ॥ कहे सुने कछु काम न आवे, भर्म न मिटे जिव जानका ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, कठिन पंथ गुरुज्ञानका ॥ ❁

शब्द २४१-साई तेरा नाम बिना न उबारा ॥ टे० ॥ काम क्रोध औ लोभ मोहसंग, ये चारों बटपारा ॥ इनके बस जीव भुलाने, कैसे उतरे पारा ॥ आशा तृष्णा मनसा डाकिन, खाये जग संसारा ॥ कनक कामिनिके बस परिया, का करे जीव विचारा ॥ साधुके संग परम आनंदा, सहजे उतरे पारा ॥ सतगुरु खोज संतसे बूझो, कहें कवीर विचारा ॥ ❁

शब्द २४२-साई तेरे तकियामें जाना जरूर ॥ टे० ॥ खांड चिरोंजी मन नहीं भावे, साई तेरे टुकरा कबूल ॥ शाल दुशाला मन नहीं भावे, साई तेरी गुदरी कबूल ॥ कोट अटारी मन नहीं आवे, साई तेरे झुंपडा कबूल ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधू, साहेब हाल हजूर ॥ ❁

शब्द २४३-साई तेरे मत बिन नर नहीं छूटे ॥ जौलग पंथ न गहे पियाके, जम गये बडे घर लूटे ॥ टे० ॥ आयो नेम प्रेम परकाशा, छाडो कुल व्योहारा ॥ सरगुन निरगुन दोड छोडके, समुझके होजा न्यारा ॥ जैसे काग रहत वोहितमें, तैसे जगके प्रानी ॥ तज अनरीत प्रीत कुल लब्बा, सुरत फिरे भटकानी ॥ जौलग सत साहेब ना चीन्हे निहअछर लख आवे ॥ घटवरिया तोहे जान न देहै, सब तकलीफ बनावे ॥ है अजगैब गैब होय आया, ताहि कहो करतारा ॥ कहे कवीर चेत नर अंधा मैं बहु भांत पुकारा ॥ ❁

शब्दावली

(८५१)

शब्द २४४-पानी बिच मीन पियासी ॥ मोहि देखत आवे हांसी ॥ टे० ॥ ब्रह्मज्ञान बिना नर भूला, का मथुरा का काशी ॥ घरकी माया मनहि न आवे, बन बन फिरे उदासी ॥ है हाजरको दूर बतावै, दूरकी आश निरासी ॥ जल बिच कमल कमल बिच कलिया जहाँ, पुरुष अविनाशी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सिरपर काल मवासी ॥

शब्द २४५-तेरी पानी बिच प्यास न गई ॥ टेक ॥ बाहर आयके का सुख पाया, अंदर लहर न लई ॥ ऐसे सुखसागरके पाये, आश न पूरन भई ॥ अरे मन मूरख भीन अनारी, किन तोहि डुरमति दर्ई ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, हो रहो आनंद मई ॥

शब्द २४६-पानी बीच बतासा संतो तनका एही तमाशा है ॥ टेक ॥ का ले आया का ले जायगा का बैठे पछताता है ॥ मूठी बांधे आया बंदे, हाथ पसारे जाता है ॥ किसकी नारी कौन पुरुष है, कहाँसे नाता लाया है ॥ बडे बिहाल खबर ना तनकी, विरही लहर बुझाता है ॥ एक दिन जीना दो दिन जीना, जीना बरस पचासा है ॥ अंतकाल बीसा सौ जीना, फिर मरनेकी आशा है ॥ ज्यों ज्यों पांव धरो धरनीमें, त्यों त्यों काल नियराता है ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, गाफिल गोता खाता है ॥

शब्द २४७-साधु घट शील संतोष बिराजे ॥ दयासरूप सकल जीवनपर, शब्द सरोत्तर गाजे ॥ टेक ॥ जहवां मनकी मनोरथ दौरे, ताहि संग ना जावे ॥ सत्तबादी सतगुरु पहिचाने, आतम दृष्टि दिखावे ॥ निर्मल दशा सरब सुखदाई, आनंद घर रहिवासा ॥ शुद्ध सुचाल सदा शीतल गति, निश दिन शब्द विलासा ॥ सतगुरु गहे निशि बासर, सत्त नाम परकाशा ॥ कहैं कवीर कोइ संत बिवेकी, तहाँ हमारो बासा ॥

(८५२)

कवीरपंथी—

शब्द २४८—जगमें या बिधि साधु कहावे। दया सरूप सकल जीवनपर, और दृष्टि ना आवे॥८०॥ झलकत दशा ब्रह्मके जामें, सबहीके मन भावे ॥ शीतल बचन सर्व सुखदाई, आनंद प्रेम बढ़ावे ॥ जाको निशदिन प्रेम भगति है, दूजा देव ना ध्यावे ॥ कहैं कवीर हम वा घर परगट, आप अपनपो पावे ॥

शब्द २४९—साधुका होना सुसकल है। काम क्रोधकी चोट बचावे, सोई निज साधू है॥८०॥ कायामध्ये धुनी रमावे, रमता राम गहे ॥ सत बिस्वास हृदयमें राखे, जगसो न्यार रहै ॥ या माया झूठ परपंचिन, जगमें दौर करै ॥ जीव जंत जितना धर पावे, सबको जपत करै॥ माला तिलक औ बाना बांधे, ममता दूर करै ॥ आठ पहर गुरु ज्ञान भजनमें, कम्भर बांध लरै॥ मोटी माया सब कोई त्यागे, झीनी तजी न जाय ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधू, झीनी सबको खाय ॥

शब्द २५०—ठगनी क्या नैन झमकावे, तेरे हाथ कवीर न आवे ॥ टेक ॥ कददू काट मृदंग बनावे, निम्बू काट मजीरा ॥ झिंगा तुरैया मंगल गावे, नाचे बालमखीरा ॥ रूपा पहिरके रूप दिखावे, सोना पहिर ललचावे ॥ गले डार तुलसीकी माला, तीन लोक भरमावे ॥ मुसोंकी सभा सरप एक नाचे, मेंडक ताल लगावे ॥ चोलनी पहिरके गदही नाचे, ऊंट विस्नुपद गावे ॥ बृच्छ चढी मछली फल तोरे, कछुवा भोग लगावे ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, बिरला अर्थ लगावे ॥

शब्द २५१—या तन धनकी कौन बढाई, देखत नैनो माटी मिल जाई ॥ टेक ॥ कंकर चुन चुन महल बनाया। आपन जाय जंगल बसाया ॥ हाड़ जरे जस लाकर झूरी। केस जरे जस घासकी

शब्दावली

(८५३)

पूरी॥ या तन धन कछु काम न आई। ताते नाम जपो लौलाई॥ कहैं कवीर सुनो मेरे सुनियां। आप सुवे पाछे डूबगइ दुनियां॥

शब्द २५२—ऐसे लोगनको वहि जाने दे॥ टेक॥ हंस हंस मिल चले सरोवर, बकुलन मछरी खाने दे॥ हंस गयंद चले मदमाते, कूकर लोग भुसाने दे ॥ हंस हंस मिल चलो अमरपुर, कागा आमिख खाने दे ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सत्य शब्दमें काने दे॥

शब्द २५३—साहेव कैसे करें तोहे राजी। चाकरी चोरनेवाला हाज़िर, ऐसा बंदा पाजी ॥ टे० ॥ पांचों चोर करै कुफराना, इन संग दीन गमाऊं। इन संग लडूँ कि कहूँ बंदगी, किन किनका समुझाऊं ॥ इन संग रहों तुमें ना पाऊं, घटके बीचमें गासा। तखत तरेका पेडा मारे, याका अजब तमाशा॥ काह कहों कछु कहन न पाऊं, देत जगत मोहि गारी। दोजक भिस्त दोऊ हम त्यागे, रहूं पनाह तुम्हारी॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, ये सब झूठी बाजी। नाम बिना कोई पार न पावे, का पंडित का काजी॥

शब्द २५४—देखो दुरमत या संसारकी। नामसो हीरा छांड हाथसे, बांधत मोट बिकारकी ॥ टे० ॥ कोई खेती कोई बनिजे चाले, कोईको हवस हथियारकी ॥ अंध धुंदमें जनम गँवाये, सुध बिसरी करतारकी ॥ जान बूझके पंथ चलत है, सुन सुन विप्र लबारकी॥ आपन हाथ गलेमें डारी, फांसी माया जारकी॥ नाना बिधके कर्म कमावे, खबर नहीं शिर भारकी॥ झूठी साखमें रौंच रहे हैं, फूटी आंख गँवारकी ॥ बारंबार पुकार कहत हौं, मोहि शरम सिरजनहारकी ॥ कहैं कवीर या बिनस जायगी, छिनमें काया छारकी ॥

(८५४)

कबीरपंथी-

शब्द २५५-कोई पिये पियाला प्रेमका, दया दुलीचा ऊपर बैठो, तिमर नाश गये नैनका ॥ टेक ॥ ज्ञानकी कुंडी विवेकका घोटा, छानो उत्तम नेमका ॥ पांच पचीस घोटक काढो, औबल चाखा प्रेमका ॥ आठो जाम रहो मतवाला, अनलपछि कोई गगनका ॥ रोम रोम भरपूर रहा है, मार लिया दल मनका ॥ जल तरंग जलहीसे उपजे, धोखा मिट गये फैनका ॥ कहैं कवीर दया सतगुरुकी, ठौर पाये सुख चैनका ॥

शब्द २५६-काया चलत प्रान काहे रोई ॥ टे० ॥ तुम्हरे संग बहुत सुख कीन्हो, नित उठ मल मल धोई ॥ तुमतो हंस चले घर अपने, हमको चलत बिगोई ॥ हंस कहै सुन काया बौरी, मेरो तेरो संग न होई ॥ तोसे घट बहुतेरे छोड़े, संग न लागे कोई ॥ लट छरियाय वाके माता रोवे, खाट पकर वाके भाई ॥ आंगनमें जाके तिरिया रोवै, हंस अकेला जाई ॥ शिव शनकादिक औ ब्रह्मादिक, शेष सहस मुख जोई ॥ जिन जिन देह धरी दुनियामें, थिर ना रहिया कोई ॥ पाप पुन्य दोउ जनमसंघाती, समुझ देख नर सोई ॥ कहैं कवीर प्रभु पूरनकी गति, बूझे विरला कोई ॥

शब्द २५७-करमगति टारिहु नाहिं टरे ॥ गुरु वशिष्ठ महासुनि ज्ञानी, लिख लिख लगन धरे ॥ टेक ॥ सीता हरन मरन दशरथको, बन बन बिपति परे ॥ कहाँ वे राहु कहाँ वे रवि शशि, आन संजोग परे ॥ सतबादी हरीचंद राजा, नीच घर नीर भरे ॥ दुरबासा ऋषि आप दियो है, जदुकुल नाश करे ॥ पंडवनके हरि सदा साथी, सो भी बन बन बिचरे ॥ तीनों लोक कर्मगतिके बस, जीवनसे काह सरे ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, भूला भटक मरे ॥

शब्द २५८-नामको या बिधि ध्यान धरे । जैसे अमली अमलको चाहे, छिन छिन सुरत करे ॥ टे० ॥ जो लग अमली

शब्दावली

(८५५)

अमल न पावै, तो लग तलफ मरै॥ फनि मनियां भुई काढ़ धरत है, फैलके ओस चरै ॥ कछू चरै कछू मन तन चितवे, विछुरत तलफ मरै ॥ जैसे सती जरै पियके संग, नेक न सोच करै ॥ आपन चरि पियाको लेके, विहँसत जाय जरै॥ जैसे सुरत गगनको चाहे, महलन खोज करै ॥ कहै कवीर सुनो भाइ साधो, भूला सो भटक मरै ॥

शब्द २५९-रस भँवर गुफामें अजर झरै ॥८०॥ गंगा जमुना मध्य सरस्वति, नाद बिंदसे गाँठ जुरै ॥ आसन मार अमृतसर चाखे, दिलकी दुविधा दूर करै ॥ दस दरवाजे तारी लागी, कोइ कोइ हंसा ध्यान घरै ॥ कहै कवीर सुनो भाई साधो, अजर अमर कबहुँ न मरै ॥

शब्द २६०-कूंची घडाय लावो बिन लोहराके ॥ टेक ॥ नरम निहाय नरम है औटन, ज्ञानके हथौरासे चोट घलाय लावो ॥ खालहि खाल खालपर सोहै, वोहँ सोहँ दोय पवन डोलाय लावो ॥ संसे खीच बज्रको पकड़े, पानी बानी जायके डुझाय लावो ॥ साहेब कवीर कूंची घड लाये, खोल किंवरवा दरस कराय लावो ॥

शब्द २६१-जाय रे दिनही दिन देहा । कर ले बावरे तू नाम सनेहा ॥ टेक ॥ बालापन गये जोबन जन जासी । फिर फिर या जोनी संकट आसी ॥ पलटे केस नैन जल छाये । मूरख चेत बुढापा आये ॥ नाम लेत लज्जा ना कीजै । पल पल अवध घटै तन छीजै ॥ सत्त नाम जे चितहिं बिसारा । कहै कवीर सोई जन हारा ॥

शब्द २६२-जारों भैया जगकी चतुराई । प्रभुको नाम लेत ना कबहुँ, जिन यह देही जुगति बनाई ॥ टेका ॥ जोरत दाम काम अपनेको, हम खैहैं लरका बिलसाई ॥ सो धन राजा चोर ले जैहैं,

(८५६)

कवीरपंथी—

रहो सहो ले जात जँमाई ॥ या माया कलवारन कहिये, मद पिवाय राखै बिलमाई ॥ एक जे परे धरनमें लोटे, एक कहे चोखा दे माई ॥ या माया सुर नर सुनि डसिया, देवा देवा बैठी खाई ॥ कोइ कोइ भाग बचे शरनागत, जासो माया रही लजाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधू, ले फांसी हमहूँ पर धाई ॥ गुरु प्रताप संतनकी संगति, अब हम रहे निशान बजाई ॥

शब्द २६३—ऐसी रहन रहे सो बैरागी। सदा उदास नाश मायासे, सत्तनाम अनुरागी ॥ टे० ॥ क्षमाकि कंठी शील सुमिरनी, सुमति सुमरती जागी ॥ टोपी अभयगत माथेपै, कलह कलपना त्यागी ॥ ज्ञानगूदरी मुक्ति मेखला, सहज सुई ले त्यागी ॥ जुगत जमात कूबरी करनी, अनहद धुन लौ लागी ॥ शब्द अधार अधारी कहिये, भीक दयाकी मांगी ॥ कहैं कवीर प्रीति सतगुरुसे, सुरति निरंतर लागी ॥

शब्द २६४—कोई दोष न दीजै, करमकि बात नियारी ॥ टे० ॥ काहे बकुला स्वेत बरन भये, काहे कोयल कारी ॥ काहे कूप जल मीठो लगत है, काहे ससुंदर खारी ॥ काहे मूरख राज करत है, पंडित काहे भिखारी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, गुरु चरनन बलिहारी ॥

शब्द २६५—अब मोहि ऐसेही बनि आई ॥ भावे कोई निंदे भावे कोई बंदे, छोडेउं लोक बडाई ॥ कुलसो निकस भई जग गनिका, फिर ना कुलहि समाई ॥ हाथीको दंत कटे सुख बाहिर, फिर ना सुखमहैं जाई ॥ कोटन लंघन करत केहरी, भूखे घास न खाई ॥ सौ जोजन मरजाद सिंधुकी, जल अचवे ना भाई ॥ सो जल पीवे कोई संत बिवेकी, जिनकी भरी तलाई ॥ भवसागर तरबेके कारन, नामकी नाव बनाई ॥ हलके हलके पार उतर गये,

शब्दावली

(८५७)

बूढे जो गुरुवाई॥ जैसे मिरगा नाद धुनि सुनके, प्रान तजत है भाई॥ ऐसे मीन मरे बिन नीरा, जल बिन रहो न जाई॥ लागी छाप भक्ति निरभयकी, अब ना दूर-दुराई॥ कहें कवीर छूटे ना कबहुँ, ऐसी अटल सगाई॥

शब्द २६६-बानेका मरद दुहेला है॥ टेक॥ आगे चले पाछे ना चितवे, सोई शूरोंका मेला है। चढे तुरंग जब बाग सँवारे, कूद परे रन पेल्ला है॥ गहे टेक छूटे ना कबहुँ, भगति हंसी ना खेला है। कहें कवीर सुनो भाई साधो, सो सतगुरुका चेला है॥

शब्द २६७-अबकी भली विसाहन बन गई॥ टेक॥ जनम जनमके टोटा बाढो नाम, नफा गुरु कर दर्ई॥ दीपक बार दिये मोहि सतगुरु, बस्तु अगोचर मिल गई॥ दुष्ट जगाती निकट न आवे, अटल छाप गुरु कर दर्ई॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, सकल भरमना मिट गई॥

शब्द २६८-अपने घट दीपक बासरी॥ तत्त्वको तेल दयाकी बाती, ब्रह्म अगिन उजासरी॥ टेक॥ निरमल जोत निहार गगनमें, तन मन धन सब वाररी॥ सुरत सोहागिन जोग ध्यानमें, गुरु-गमपंथ सुधाररी॥ काम क्रोध मद लोभ मोहकी, झोंको ये सब भाररी॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, अपने कंथ निहाररी॥

शब्द २६९-काह कहों अनकही भली है॥ टे०॥ उहवां वेद शास्त्र कछु नाहीं, उहाँ अकथ ईहां कथा चली है॥ जहवां मूल बीज कछु नाहीं, ना तरवर ना सुमति फली है॥ जहवां नहीं घाट औघट, ना खेवट ना तीर सई है॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, सो है हंसा सर्व मई है॥

शब्द २७०-कैसे कैसे मिलाव बालम परदेसिया, रोकत दौय दरबानी हो॥ टेक॥ पांच पचीस बैठे रखवरिया, इन मोरी राह

(८५८)

कवीरपंथी—

बिगारीहो॥ दिल ना चैन रैन निशबासर, अपनेअपने बारी हो॥ नैन हमार महा दारुन है, स्वास स्वास जमुहाई हो॥ जबजब करव प्रीतमसो गह गह पलकन पारी हो ॥ दसहुँ द्वार रोक जम बैठे, सुमति किंवाड लगाई हो॥ जिन दुख दीन्ह मान गढ ऊपर, पकर जंजीर भराई हो ॥ गहो गुरु चरन दया कर उपजे, ज्ञानके खरग बनाई हो ॥ होय निहशंक नाम गुन गावे, ममता दूर बहाई हो ॥ अर्ध उर्ध बिच तार लगाई, जहवां सुरति समाई हो॥ कहैं कवीर वा घरका भेदी, बहुर न भौजल आई हो ॥

शब्द २७१—गाँठ परी पिया बोले न हमसे ॥ टेक ॥ नित उठ देखों पिया तुम्हारी सेजरिया, लग गई नौद निकसगये घरसे ॥ जो मैं जानति पिया रिसियैहैं, काहेको प्रीत लगाती ऐसे ठगसे ॥ अपने पियाको फेर मनाऊं, सौ तकसीर होत हरिजनसे ॥ धर्म- दासकी अरज गोसाईं, साहेब कवीर पिया पाये बडे तपसे ॥

शब्द २७२—कैसे बोले अधरमें बोलवा रे॥ टेक॥ या बोलवाके सकल पसारा, घट घट करत किलोलवा रे ॥ या बोलवासे तीन देव भये, ब्रह्मा विष्णु मद्देशवा रे ॥ या बोलवासे तीन लोक भये, चंद सूर तारागनवा रे ॥ कहैं कवीर बोलवाको चीन्है, उतर जाय भौपरवा रे ॥

शब्द २७३—ऐसी लगन लगाय कहाँ जासी ॥ टेक॥ मूठ सुवा सेम्हर एक सेयो, छाँड चला संग साथी ॥ फूल झरे जबही फल लागे, सुवना भये हुलासी ॥ चौंच मार सुवना पछताने, लाग गले बिच फांसी ॥ हमतो जाने अमृत फल है, लाल फूल बिसवासी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सुवना भये निरासी ॥

शब्द २७४—को सिखवे अधमनको ज्ञाना ॥ टे० ॥ जहाँसे आया ताहि बिसराया, फूटी आँख भयो निज काना ॥ गुरु साधकी

शब्दावली

(८५९)

कहीं न माने, चाहत है हमरो परवाना ॥ गीता और भागवत बाँचे, ना लागे गुरु उनके काना ॥ मारहिं मार होरहे जमद्वारे, साहेब कवीर देख सुसकाना ॥

शब्द २७५—बिन सतगुरु नर फिरत भुलाना ॥ टेक ॥ एकके हरिसुत लाय गडरिया, पोष पालके कियो सयाना ॥ रहत अचेत फिरत अजयन संग, अपना हाल उनहु ना जाना ॥ एक केहरि सुत आय जंगलसे, देखत ताहि बहुत सकुचाना ॥ बकरन भेद तुरत उन दीन्हा, आपन दशा देख सुसकाना ॥ मिरगा नाभि बसे कस्तूरी, वह मूरख दूँदत चौगाना ॥ करत सोच पछतात मनहिं मन, यारे सुगंध कहाँसे आना ॥ अधर उधर बिच डोरी लागी, रूप छका गहि जात बखाना ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, उलटा राह सूत हम ताना ॥

शब्द २७६—बाबुल मरियो हो दइया मारे, कूर को दीन्ही ॥ टे० ॥ कूर अरोसी कूर परोसी कूरे भई सगाई ॥ कूरे कूर बराती आये, कूरे मिले संघाती ॥ अकवारमें गदहा दीन्हे, द्वारे दीन्हे घूस ॥ मंडवातरमें दीन्ह लुखरिया, लंबी लंबी पूछ ॥ दाल बनाये भात बनाये, बरा बनाये कच्चे ॥ सबे बराती जेवन बैठे सारसके-से बच्चे ॥ मंडवौ जरगै दुलहौ मरगै, दुलही भई अहवाती ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, नाचत चले बराती ॥

शब्द २७७—जियरा पराये बसनमें ॥ टे० ॥ सास ननद मोरी जनमकि बैरन, चरचा करे दसनमें ॥ काम क्रोध मद लोभ मोह बस, नफा नहीं है इसमें ॥ पांच पचीस घट भीतर, टरे नहीं निश दिनमें ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, सतगुरु चरन हियेमें ॥

शब्द २७८—निश बासर मोहिं नींद न आवै, लगा शब्दका तीरा हो ॥ टे० ॥ गांसी मारी सार शब्दकी, बिंध गइ सकल