कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 853, कुल 968 में से
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घटके भीतर, जिनहूँको भर भर पियाता है॥ तत्त्वकी रोटी सबते मोटी, तेहिते पिंड चलाता है॥ गंग जमुनके निर्मल नीरा, ठाकुर भोग लगाता है ॥ कहै कवीर सुनो भाई साधो, भूमंडल विचलाता है ॥
शब्द २००-नैनन आगे ख्याल घनेरा॥ जा कारन जग भरमत डोलै, सो साहब ढिग लेत बसेरा ॥ टे० ॥ पूर रहो असमान धरनलौं, जित देखो तित साहब मेरा ॥ लखत बने कछु कहत न आवे, जाने दिल बिच महरम हेरा ॥ अर्ध उर्ध बिच मनुवां राचे, का संध्या का रैन सबेरा ॥ माला एक दर्द मोहि सतगुरु, कहै कवीर बिनहीं कर फेरा ॥
शब्द २०१-गगनमें अवाज होती झीनी। कोई सुनता है गुरु-ज्ञानी ॥ टे० ॥ पहिले आया नाद बिंदसे, पीछे जमाया पानी ॥ सब घट पूरन पूर रहा है, अलख पुरुष निरबानी ॥ वहाँसे आया पटा लिखाया, जगमें कछु न आनी ॥ अमृत छोड़ बिषैरस चाखे, उलटा फांस फँसानी ॥ राज करते राजा जैहैं, रूप धरती रानी ॥ वेद पढंते पंडित जैहैं, जैहैं सुनिवर ज्ञानी ॥ सोहं सोहं बाजा बाजे, त्रिकुटी जाय समानी ॥ इंगला पिंगला बीचहिं छोड़े, सुन्न धजा फहरानी ॥ दीद पदीद न जरा देखो, है यह अमर निशानी ॥ कहै कवीर सुनो भाई साधो, यही आदकी बानी ॥
शब्द २०२-प्रीतम आपुहीमें पायो ॥ जनम जनमकी मिटी कल्पना, पूरे गुरु लखायो ॥ टे० ॥ जैसे कुँवर मन बिसर गई थी, अभरन कहाँ गँवायो ॥ एक सखीने बताय दिये तब, मनको तिमर नशायो ॥ जो युवती सपने सुत दूँदत, बालक कहाँ गमायो ॥ जाग परी जेहूँको तेहूँ, ना कहुँ गयो न आयो ॥ मृगा पास बसे कस्तूरी, दूँदत बन बन धायो ॥ नासा स्वाद परो जब वाके, फिर