कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरसंथी—
तो अब दुखस देख क्यों डरपे, जो पैराहि किया है॥ मूसर चोट ओट का भाई, उखरी मूंड दिया है॥ पांच तत्त्वका पिंजरा तेरा, दिन दिन होवै हाने॥ बाला ज्वान बृद्ध फिर होवै, सो क्या तू नहिं जानै॥ सुन समझाय कहत हों तिसपर, इसपर गरब गुमाने॥ माया महल जान ये धुवना, सुवना सीख सयाने॥ सतगुरु चरन सरन गडु बंदे, सीधी देही जाती॥ क्या लख भूला जात पांतमें, तात मात सुत नाती॥ ये सब ख्वार जगत है सपना, भोर होत ज्यों राती॥ माया रंग अंग ये काँचा, साँचा नाम संघाती॥ नर निहार ये कहाँ गये सब, माया सचन बटोरा॥ घोडा हाथी लाल जवाहिर, लाखन कोट करोरा॥ सो समुझाय कहत हों तिसपर, जीवन जगमें थोरा॥ जग जंजाल कालको फंदा, लागो प्रभुकी ओरा॥ इत जग लाज उते जिय कारज, दुई दुबीचा मूवा॥ यह अनिष्ट निज इष्ट मिलतही, सिष्ट उठाव न हूवा॥ पीछे भौजल बिरह भयानक, आगे दीसे हूवा॥ तिसपै नहीं सूझता सुझपै, तुजपै आशिक हूवा॥ श्रीगुरु सत्तनामका प्याला, भरिकै घूंट घुटका॥ काम कोध मद मोह भार शिर, ये भी डार पटकका॥ जो कुछ हतो कालको लशकर, लख निज नाम सटकका॥ सुख-लालदास साकटते कोरे, तोरे खूब घटकका॥ काल कराल दुख है भारी, व्यापै राजा परजा॥ देखतही सुख सूख जायगा, भूल जायगा तरजा॥ इंद्री फिरे लगाये अनुवाँ, मनुवाँ नेक न बरजा॥ उस दिन कहा करेगा बंदे, जिस दिन जम शिर गरजा॥
शब्द १९९-अछा निरंजन बनमें, कोई उलट समाना तनमें॥ टे०॥ का पहाड़पर धुनी लगाता, जिसकी भसम चढ़ाता है॥ अंचला कोपीन कछू न वाके, सेवा दिगंबर कराता है॥ तन कर कूंडी मन कर घोटा, ज्ञानकी गुदरी लगाता है॥ पांच पचीसों