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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(८३७)

जगत जात औ आप गात सों, वह कछु बात जुदी है ॥ सतगुरु बिना कौन दरसावे, जाको सब घट तेजा ॥ सुर नर मुनि औतार आदि सब, वाही थानक रेजा ॥ सो नर समुझ उसीको गहना, जिसने जगमें भेजा ॥ गहिये अविचल खान पुरुषकी, सत्पुरुषकी सेजा ॥ गरभवास प्रतपाल साहेवा, तिसपै कपट गुठे है ॥ सुन वे सुमर उमर गुजरानी, बाला जवान बुठे है ॥ बिना बिवेक देख दिग अपने, जमकर बूथा सुदूट्ट है ॥ तिसपर नहीं सीखता अंधे, तुझको मूढ तुदूट्ट है ॥ निश दिन बिषै वासमें भूला, प्रभुकी खबर बिसारी ॥ औसर परे कहत है तिसपर, लेवेगा खबर हमारी ॥ माया हिरदै मोहकी फांसी, हांसी आवत भारी ॥ पहिरे अंग टाटकी चोलिया, कर नवाबसों यारी ॥ कंठी तिलक छाप उर धारे, बिषै वासना गौरै ॥ भगत कहाय जुगत ना जानी, परम धामकी लौरै ॥ ना प्रभु भजन ना गुरुकी सेवा, एको नाहीं भौरै ॥ फिरत लगावत ऐसे अंधे, अंडन मांझ बिजौरै ॥ वेद पुराना बांचना बूझा, प्रभुको भारत जुझा ॥ जहांसे सवे तिसे नहि जाना, भये आप कुछ कुछा ॥ सुर नर मुनि सब एक ठीकसे, ऐसी भूलनि भुछा ॥ या जग अंधा फूट मसीदी, मिले अंधेरें मुछा ॥ ऊंचे नीचे फिरे करमसे, कर्म कीचमें कुलबुछा ॥ खबर नहीं कुछ या कायाकी, है मायाके तुललुछा ॥ गहि निज नाम तजे नहि या जग, महाकालकी भुलभुल ॥ करत घैंसुवा फिरत बटोई जैसे अंधी बुलबुल ॥ माया जोर किया सबहीको, जपी तपी बहु भेखो ॥ कर बनवासा ऋषि डुरबासा, अजब तमाशा पेखो ॥ सुर नर मुनि औ पीर औलिया, नर निहारके देखो ॥ जगत ज्वालमें बरंत गांजसे, कह पूरनको लेखो ॥ सिरजनहार ताहि बिसराया, जग सिर भार लिया है ॥ उरझे बूथा जगतके ज्वाला, प्याला बिषै पिया है ॥