कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
पांच पचीस करे बस अपने, गहिलई ज्ञान गली॥ करत बिलास रहत संतनमें, आनंद प्रेम भरी ॥ सबर विवेक चुनरिया पहिरी, घरकी खबर करी॥ कपट किंवार खुले जब तनके, सतगुरु मिहर करी ॥ दया धरम हिरदय कर राखो, कर उपकार चली ॥ दया स्वरूप सकल जीवनपर, ज्ञान गुमान भरी॥ समझ विचार करो जिय अपने, कर सिंगार चली॥ भये हुलास मिलन जद पियको, फूली कमवल कली॥ दीपक ज्ञान धरो घट भीतर, जगत बिसार चली ॥ निरखत बदन मदन छवि लाजत, आनंद प्रेम भरी ॥ कहें कवीर मिली जद पियको, पिय हिय लाग रही ॥
शब्द १९७-अपने लाल मनाइले, सुन आतम प्यारी ॥ टे० ॥ पहिले पहरे रैनके, गुडियन संग साजे ॥ सो प्रीतम मन भावते, तेरे निकट बिराजे ॥ दूजे पहरे रैनके, कछु मरम न जाना ॥ जोबन मँहगे मोलके, तुम विषमें साना ॥ तीजे पहरे रैनके, तुम बहु बिध चूकी ॥ अंग न दियो सुजानको, तुम बहु बिध भूली ॥ चौथे पहरे रैनके, शशि जोत समानी ॥ कहें कवीर धर्मदाससों, सुंदरि पछतानी ॥
शब्द १९८-औगुन कहा निहारो स्वामी, ओर आपनी हेरो ॥ टे० ॥ होवे नहीं निवेरो तन सब, भरे कर्मके ढेरो ॥ वस्तु लई सो लई कृपानिधि, अब का लेकर फेरो ॥ कहि सुखलाल कहाया जगमें तेरो, तेरो तेरो ॥ वस्तु लई सो फेर न दीजे, लगे बातमें बंटा ॥ यह दुकान कोई फेर न आवै, उठ जैह यो टंटा ॥ ताते मुनो कृपानिधि स्वामी, साख राखिये हंटा ॥ अधम उधारन नाम टेरेके, लिख दीन्है है संटा ॥ जग जिव अंधे लखे न वाको, जो सब आप खुदी है ॥ वह अखंड सो व्यापे घट घट, परघट नहीं सुंदी है ॥ निरगुन सरगुन मास एकपै, जैसे बंदी सुंदी है ॥