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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(८३५)

रुच रुच पहिरों, कांचकी चुरिया लजाती ॥ काजर सिंदुर मनहि न आवै, द्वादश तिलक बनाती ॥ कहै कवीर सुनो भाइ साधू, अमरलोकको जाती ॥

शब्द १९४—नाचरे मन मेरा नट होय ॥ टे० ॥ ज्ञानके ढोल बजाव रैन दिन, शब्द सुने सब कोई । राहु केतु नवग्रह कपै, जम घर बंदन होई ॥ द्वादश तिलक बनावे बांस चढ़ि, जगते होरहु न्यारा । सहस कला होय नाच मन मेरे, रीझे साहब तेरा ॥ जो रीझे जगदीश जगतगुरु, दैहैं दान बुलाई । भरी सभामें चोला बगसे, फाट न कबहू जाई ॥ जो भवसागर कूद परोगे, कला न बदिहों तेरा । कहै कवीर सतोब्रत साधो, नौ निधि होवे चेरा ॥

शब्द १९५—भव भंजन गुन गाऊं, रमता राम रिझाऊं ॥ टे० ॥ तन कर घोडा मनकर चाबुक, सुरत लगाम लगाऊं ॥ पांच पचीस बखतरिया मारो, फिर मुजरेको आऊं ॥ ना मैं पूजों देवी देवा, ना मैं देवल बनवाऊं ॥ पांच मवासी इस नगरीमें, मान गुमान बहाऊं ॥ देवल जाते पत्थर पूजा, तीरथ भगती पाऊं ॥ इस कायामें कोटन तीरथ, जहवाँ बैठ अन्हवाऊं ॥ आगे आगे ओट दुलीचा, पीछे नौबत बाजा ॥ दस्तके ऊपर लाल बन्दूके, फिर बैरीको साजा ॥ लोभ मोहकी गरदन मारौं, ज्ञान कमान चढ़ाऊं ॥ कहै कवीर सुनौ भाइ साधू, बेद विमल जस गाऊं ॥

शब्द १९६—तेरा रोकनवाला कौन, सुरतसों आव चली ॥ लोकलाज कुलकी मरजादा, सिरतें डार अली ॥ टे० ॥ पटको भार मोह मायाको, सन्मुख डगर धरी ॥ काम क्रोध हंकार कल्पना, डुरमति दूर करी ॥ मन अभिमान दोऊ धर पटके, निरभै राह गही ॥ क्षमा शील संतोष धीरज धर, कर गहि ज्ञान छही ॥ अगल बगलकी झार मार सब, होय निहशंक चली ॥