कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
शब्द १४१—मायाके गोविंद है, गोविंदकी माया॥ माया औ गोविंदके, काहू अन्त न पाया ॥ टे० ॥ राजकुँवारी द्वारे सोहई, माया बिन नंगी । माया घर चंडालके, सोहत अति चंगी॥ जेते वेद किताब है, माया बिन फीके । जेते देवी देहरा, माया सो नीके॥ शेख सैयद सुनि जना, सब मायाके वारी । ऊपर त्यागी सब कहें, अंतरकी प्यारी ॥ आगेसे माया चली, पीछे भी माया । कहें कवीर साधू बिना, कोई अंत न पाया ॥
शब्द १४२—भज भगवंत भूल मत जावो रे॥ मानुष जन्मको एही लाभो रे॥ गुरुसेवा कर भक्ति दिढाऊं । ताते मानुष देही पाऊं॥ जो देहीको सोचे देवा । सो देही कर हरिकी सेवा॥ अब न भजो भजो कब भाई । आवे अंत तोहि भजो न जाई॥ सतगुरु मिले तो होय ततसारा । फिर पछतैहो बारंबारा ॥ जौलों काल न आसे काया । तौलों जरा मरन नहीं आया ॥ जौलों हिये परो नहीं बान । तौलों भजो नर सारंगपान ॥ एही तेरो औसर एही तेरो दाव । घटहीमे एक शब्द चेताव ॥ कहें कवीर जीत भावे हार । बहु बिध कहाँ पुकार पुकार ॥
शब्द १४३—सत गुरुदेव दया करो बिधि देहु बताई ॥ जीव ब्रह्म कैसे भयो, केहि पूछों जाई ॥ टे० ॥ सुनो संत चित लायके, यह खेल अपारा । आवत जात लखे नहीं, यह अचरज सारा॥ जा घरते जिव आइया, सो तुम्हें लखाया । पवन डोर चढ संचरे, जल सिरजी काया ॥ पूरब पश्चिम दछिन, उत्तर फिर आया । दिव्यदृष्टि पावे नहीं, घर घर भरमाया॥ दश दरवाजा प्रगट है, चार कुलफ लगाये । दोय दरवाजा ऊघरे, हंसा सञ्चु पाये॥ पांच तत्त्व एकतत भये, नौ खंड बनाया । तामे भौर बिलंबिया, नख सिख लौ लाया॥ कुंभके जल सायर मिला, जल जलहि समाया॥