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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

(८१६)

कवीरपंथी—

शब्द १४१—मायाके गोविंद है, गोविंदकी माया॥ माया औ गोविंदके, काहू अन्त न पाया ॥ टे० ॥ राजकुँवारी द्वारे सोहई, माया बिन नंगी । माया घर चंडालके, सोहत अति चंगी॥ जेते वेद किताब है, माया बिन फीके । जेते देवी देहरा, माया सो नीके॥ शेख सैयद सुनि जना, सब मायाके वारी । ऊपर त्यागी सब कहें, अंतरकी प्यारी ॥ आगेसे माया चली, पीछे भी माया । कहें कवीर साधू बिना, कोई अंत न पाया ॥

शब्द १४२—भज भगवंत भूल मत जावो रे॥ मानुष जन्मको एही लाभो रे॥ गुरुसेवा कर भक्ति दिढाऊं । ताते मानुष देही पाऊं॥ जो देहीको सोचे देवा । सो देही कर हरिकी सेवा॥ अब न भजो भजो कब भाई । आवे अंत तोहि भजो न जाई॥ सतगुरु मिले तो होय ततसारा । फिर पछतैहो बारंबारा ॥ जौलों काल न आसे काया । तौलों जरा मरन नहीं आया ॥ जौलों हिये परो नहीं बान । तौलों भजो नर सारंगपान ॥ एही तेरो औसर एही तेरो दाव । घटहीमे एक शब्द चेताव ॥ कहें कवीर जीत भावे हार । बहु बिध कहाँ पुकार पुकार ॥

शब्द १४३—सत गुरुदेव दया करो बिधि देहु बताई ॥ जीव ब्रह्म कैसे भयो, केहि पूछों जाई ॥ टे० ॥ सुनो संत चित लायके, यह खेल अपारा । आवत जात लखे नहीं, यह अचरज सारा॥ जा घरते जिव आइया, सो तुम्हें लखाया । पवन डोर चढ संचरे, जल सिरजी काया ॥ पूरब पश्चिम दछिन, उत्तर फिर आया । दिव्यदृष्टि पावे नहीं, घर घर भरमाया॥ दश दरवाजा प्रगट है, चार कुलफ लगाये । दोय दरवाजा ऊघरे, हंसा सञ्चु पाये॥ पांच तत्त्व एकतत भये, नौ खंड बनाया । तामे भौर बिलंबिया, नख सिख लौ लाया॥ कुंभके जल सायर मिला, जल जलहि समाया॥

शब्दावली

(८१७)

सो जल कैसे काढिये, विधि देहु बताया ॥ सतगुरु खेवट साथले, जिन अथाह थहाया । कुंभके जल कुंभे मिला जल, जलहि समाया ॥ कहें कवीर धर्मदाससों, मैं कहों पुकारा । एक नाम चीन्हे बिना, अटके जमके द्वारा ॥

शब्द १४४-तुम सब घट पूरन साईं, मेरी ओर चितवत नाहीं ॥ टेक ॥ या घटके कोई ना जाने मेहरम साईं ॥ अबकी बार चितवो नेक मोपर, जिवकी कल्पना जाई ॥ सेवा सुभिरन कछु न जानो, औगुन है गुन नाहीं ॥ हमसे पतित तुम केते उबारो, हमहुंको तरु गोसाईं ॥ अधम उधारन सुन यह बिनती, अरजी बिसर न जाई ॥ साहब कवीर अधमको तारो, तुम्हरो विरद लजाई ॥

शब्द १४५-बोलनहारा राम रजा है ॥ पिंड ब्रह्मांड रहा भरपूरी, आप अकेला बांध धजा है ॥ टेक ॥ जैसे बुंद परो जल माहीं, जलहीते बुदबुद उपजा है ॥ मिट बुदबुद जल माँहि समाने, हो रहो एक सरूप सजा है ॥ जैसे कुंभ भरो जल माहीं, सबमें दरसे चंद सजा है ॥ विनसे कुंभ चंद ना विनसे, शब्द सरूपी अमर अजा है ॥ जामों हम सोई हम माँही, वाही तत्त्वमें गगन गजा है ॥ कहें कवीर संशय कछु नाहीं, तत्त्व लखा तब भस्म भजा है ॥

शब्द १४६-बैरागी रामा गांव ठाँव, खोजे सचु पाऊंगा ॥ टे० ॥ तीरथ जाऊं न जलमें पैठों, जीव जतन सत पाऊंगा ॥ सकल तीर्थ गुरु घटमें बतायो, तामें पैठ नहाऊंगा ॥ पानी ढोरों न पाहन पूजों, देव देवल नहि जाऊंगा ॥ व्रत अखंडल मंडल ऊपर, अनहद बीन बजाऊंगा ॥ बेद किताब सुमृति ना मानों, गीत कवित्त न गाऊंगा ॥ पाँच सोहंग करें नहि पूजा, भला भला न कहाऊंगा ॥

(८१८)

कवीरपंथी—

बैठ नाम निहछत्र सिगासन, अविगतसों लौ लाऊंगा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सहज समाध लगाऊंगा ॥

शब्द १४७—तुम चलोतो चाल निगोडा, मैं तो गंगा न्हाऊंगी ॥ टेक ॥ इमनी बेच्छं तिमनी बेच्छं, सेर दस गेहूं लाऊंगी ॥ पांच सेरकी करों कडाई, मंजिल मंजिल पर खाऊंगी ॥ छोरा पटकूँ छोरी पटकूँ, घरमें आग लगाऊंगी ॥ सुनियोरी मोरी पारपडोसन, दिना चारमें आऊंगी ॥ गंगाजीके तीर जायके, अजपा जाप जपाऊंगी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, मूंड मुंडाय घर आऊंगी ॥

शब्द १४८—कायागढ नगरियासे, गगरिया भरके लावो रे ॥ टेक ॥ पवनके इनरवासे, सुरति डोरिया लावोरे ॥ नौ नारी पनिहारी आई, लागा पूरा दावोरे ॥ पांच पचीसो रंगे चंगे, मनके माते भावो रे ॥ निरगुनके इंडरोया धारे, होले होले आवोरे ॥ गगन अटरिया चढके देखो, सबका भावो रे ॥ सदरद दिवाने खडे डुवारे, दरसे वाके पावोरे ॥ साहब कवीर गुरु भर भर लावे, संतनको पिलावोरे ॥ जन्म मरन भी संशय नहीं, ऐसा कहरा गावो रे ॥

शब्द १४९—नइया बिच नदिया डूबी जाय, कहीं देखेहो मिसरजी ॥ टे० ॥ एक अचंभा हमने देखा, कुवामें लागी आग ॥ जल हता सो जर गया, मछली न लागी आंच ॥ नदी किनारे नइया लागी, नदिया डूबी जाय ॥ ये माया भगवानकी, ताहीसे उबियाय ॥ चीटी चली सासरे, नौ मन काजर लाय ॥ हाथी मार बगलमें दावे, ऊंट लिये लटकाय ॥ एक चींटीके सुवले, खाये गिध हजार ॥ बाकी बचे सो काकरे, चील रही मड़राय ॥ एक चींटीके मूतमें, बहगये नदिया नाल ॥ पंडित पछारे धोतियाँ, धीमर डारे जाल ॥ गगन मंडिलमें गऊ वियानी, धरती दही जमाय ॥ बाछा वाके

शब्दावली

(८११)

पेटमें, माखन हाट बिकाय ॥ एक अचंभा हमने देखा, गढ़ाके सिर सींग ॥ चींटीके पग डोरी लागे, खैंचे अर्जुन भीम ॥ कहें — कबीर सुनो भाइ साधू, या पद है निरबान ॥ या पदका कोई अरथ लगावे, सोई संत सुजान ॥

शब्द १५०-बानी छोड़दे अभिमानी ॥ टे० ॥ जे भईयाके गरब करत थे, सोई भये अगवानी ॥ जे सायरके गरब करत थे, तापै सिला उतरानी ॥ जे लंकाके गरब करत थे, सोई भये धुरधानी ॥ कहे कबीर सुनो भाइ साधू, शब्द लेउ पहिचानी ॥

शब्द १५१-अवधू कौन देश निज डेरा । तेरो हंसा लेत बसेरा ॥ टे० ॥ कौन देश है कौन दिशा है, कौन आपहो साई ॥ कौन महलकी टहल करत हो, कहो खबर केहि ताई ॥ नर नारीके गरभ भोगते, सहजे काया पाई ॥ की तुम जनमें मात पितासे, की बीचहि आन समाई ॥ चित्रगुप्त जब लेखा मांगे, बहु बल रूप सँवारा ॥ गोच केबार बांध फटकारे, अगिन कुंड ले डारा ॥ मझधार नइया डोलन लागी, अजहूं खेव सबेरा ॥ कह कबीर अबकी बेर चेतो, तब मिटिहैं जम जेरा ॥

शब्द १५२-दोय दिन खेल ले यह खेला ॥ ये तो नदी नावको मेला ॥ टे० ॥ कौड़ी कौड़ी माया जोरे, संग न जाय तेरे घेला ॥ और जनम बहुतेरे पावौ, मानुष जन्म दुहेला ॥ मात पिता सुत कुटुम्ब कबीला, संग न जाय तेरे भेला ॥ चार वेद षट्शास्त्र पुकारें, संत न देहैं हेला ॥ कहें कबीर सुनो भाई साधो, गतीका विरद दुहेला ॥

शब्द १५३-तुझे बोलनकी सुध नाही रे ॥ टे० ॥ चंद चढे कुल आलम देखे, मैं देखों तेरे ताई रे ॥ दुनियां पूजे पीर पैगम्बर, मैं पूजों गुरु साई रे ॥ काम क्रोध अभिमान भरो है, कालके फाँस

(८२०)

कवीरपंथी—

पराई रे ॥ नारिको यार माते मदिरासे, विके बिराने हाथाई रे ॥ जो तनका तूं गर्ब करत है, सो तन नहीं रहाई रे ॥ अजहूं चेत सुगध नर मूरख, सतगुरु होय सहाई रे ॥ अरे मतिमंद जनमके अंधा, किन ऐसी मति दहाई रे ॥ कहैं कवीर अबकी बेर चेतो, योही न जन्म गवाई रे ॥

शब्द १५४—क्या लड़ना बिराने भागोंसे ॥ टे० ॥ एक जु खाते दूध बतासे, एक गुजारे सागोंसे ॥ एक जु चढ़ते हाथी घोडा, एक लगे वाके बागोंसे ॥ एक जु पहिरे मखमल खासा, एक गुजारे आगोंसे ॥ जो लिखनी बिघने लिख दीन्हा, सो न टरे वाके भागोंसे ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सतगुरु चरन दीदारौसे ॥

शब्द १५५—मायाका गुलाम गेदी क्या जाने बंदगी ॥ टे० ॥ साधुसे धूमधाम, चोरनसे करे काम । धीगनसे हाथ जोरे, कपटकी बंदगी ॥ कपटके माला लीन्हे, पाखंड तिलक दीन्हे । आधारंगी धोती पहिरे, करत मिजाजगी ॥ होद न सके बंदगी, किया चाहे सिद्धगी । कहैं कवीर धिक्कार ऐसी जिदगी ॥

शब्द १५६—गाफिला साईका नाम विसारा ॥ टे० ॥ पानीके बुंदसे पिंड प्रगट भये, ऐसा सिरजनहारा ॥ नीचे शिर ऊपर पग तेरा, जब तूं किया पुकारा ॥ नौ दस मास गर्भ प्रतिपाले, वहां तोहि दिया अहारा ॥ जठर अगिनमें राख लियो है, ऐसा राखन- हारा ॥ कौल बोलके बाहिर आये, यहां भये वटपारा ॥ कहैं कवीर समुझ नर अंधा, कौलको करो संभारा ॥

शब्द १५७—दोय दिन पडाव हैदा भाई ॥ टे० ॥ हिंदू श्रवर घेरके मारे, मुसलमान काटे गार्ई ॥ घड पखानके सुरत बनाये, ता पूजन दुनिया धार्ई ॥ सुरदा गाड मसीत बनाये, तासों पीर कहे भाई ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, विन समुझे परलैं जाई ॥

शब्दावली

(८२१)

शब्द १५८-सोवें मन मेरा जगे न जगायेसों॥ आलस अमलरस मदरस पायेसों॥ टे०॥ ऐसो पापी मन पंचो, ठग न ठगायेसों॥ गुरुमुख बात न सुने सुनायेसों॥ आगे बात न वनिहै बनायेसों॥ गुरुउपदेश न सुने सुनायेसों॥ फिर नहिं बात आगे वनिहै बनायेसों॥ छूछी भरी गगरी करम ढरकायेसों॥ का सोया बहुत न सुने गोहरायेसों॥ कहें कवीर सुन या जग आयेसों॥ अमृत छोड़ विपैरस पायेसों॥

शब्द १५९-येरे सतगुरु गह लई बांह, नहीं तो मैं बहे जाती॥ टे०॥ जग झूठा बदनाम है, मन ज्ञानी अभिमान। सतगुरु बोली बोलिया, जासे झनक पुरी मेरे कान॥ बारू नग पैदा किया, धन कारीगर तोहि। सिकलीगर सतगुरु मिले, दरस दिखावो मोहि॥ माया मार ममता तजे, शब्द सनेही होय। लोभ लालच ये सब तजे, सतगुरु परसे सोय॥ काम क्रोध जो त्याग है, तिन घट ब्रह्म समय। कहें कवीर ते बांचहीं, ना तो जमपुर जाय॥

शब्द १६०-कित गया रे पंछी बोलता॥ टे०॥ अन भी खाता पंछी पानी भी पीता, उड तरवर पर बैठता। सेत सुपेती नरम गेंदरा, तापर पंछी पौढता॥ लटपट पाग बांधे मूछ सँवारे, ले दृपन सुख देखता। कहें कवीर सुनो भाई साथो, रती रती कर भेजता॥

शब्द १६१-साईके चरण चित लाव मना॥ टे०॥ उदर भरनके कारणे, सुरही वनको जाहिं। त्रिन चरे चहुँ दिस फिरे, वाके सुरत बछरुवा माहिं॥ पांच सात सहेलरी, हिलमिल पनियां जाहिं। दै तारी सुख वे इंसी, वाके सुरत गगरिया माहिं॥ नटनी नाचे चौहटे, लोग करत हैं शोर। सुरति बांध चढी बांससे, वाके चित्त डगे कहुँ और॥ ज्वारी राचे जुवामें, कामी राचे काम। कहें कवीर धर्मदाससों, तुम या विध सुमरो नाम॥

(८२२)

कबीरपंथी-

शब्द १६२-हमारे पिया मिले ब्रह्मज्ञानी॥ टे० ॥ काग बरनते हंसा कीन्हे, दीन्हा शब्द निशानी ॥ सुंदर रूप सोहावन मूरत, पूरन है ब्रह्मज्ञानी ॥ सेज सँवारो गुरुज्ञानकी, सुरति निरतिसे आनी ॥ कुमत जराय कियो हम काजर, प्रेम प्रीतसों आनी ॥ शील संतोष पहिर दोय कंकन, होरही मगन दिवानी ॥ इतना सिंगार कियो जब बिरहिन, तब पियाके मन मानी ॥ ऐसे पिया मोहि कबहुं न मिलिया, देख सुरत ललचानी ॥ कहें कबीर सुनो भाई साधू, तनकी तपन बुझानी ॥

शब्द १६३-तोहे बान पर गई देखनकी, दो नैननके बीचमें ॥ टे० ॥ ररा मम्मा अच्छर दोई, भूल गई सुध लेखनकी ॥ बहदा खूब दोई घट साहब, जान परें कोई भेषनकी ॥ कहें कबीर सुनो भाई साधो, संत निशानी टेकनकी ॥

शब्द १६४-सतनाम हीरा सार, हिरदे लगाय राखो रे ॥ टे० ॥ मनकी रे मनोरथ माला, मनको पहिरावो रे ॥ कपटके कँडुला उतार डारो रे ॥ मनकारे मनोरथ धोबी, मनको नहि धोया रे ॥ दिलके दगवा, छुटाय डारो रे ॥ प्रेम प्रीतके बिरछा, ले अमृत सीचोरे, बिषके बेली उपार डारो रे ॥ कबीर अपने तनमें, दिल अंदर खोजो रे, मूरतसे मूरत मिलाय राखो रे ॥

शब्द १६५-छाड़ो मन मेरा जगतके खटका ॥ टे० ॥ बैद तो बैदाई करे, नारी मन अटका ॥ पिंजरासे सुवटा कौन बिधि सटका ॥ पंडित तो पंडिताई करें, पोथी मन अटका ॥ औरनको राह बतावे, आप खाय भटका ॥ गुनियां मांगे पान फूल, देवी मांगे झिटका ॥ कितना माँगे और और, आवत काल कोई ना हटका ॥ कहें कबीर सुनो भाई साधो, काल कला घर आवत नटका ॥

शब्द १६६-बाबा साईजी ए तो ख्याल तुम्हारा ॥ टेक ॥

शब्दावली

(८२३)

असमानी एक बाज उड़ा है, कडवा तीर चलावे ॥ जद बकरीने बाघ पछारा, उसको कौन छुडावे ॥ चहाने तो विछी पकरी, सुरगा घर घर रोवे ॥ बंदरके घर धूम मची है, ऊंट विसुन पद गावे ॥ गूंगा कहे बधिरसों बातों, अंधा पुरान बांचे ॥ जद ठूँटा मुदंग बजावे, लंगडा क्या खूब नाचे ॥ कहें कवीर यह उलटा पद है, बिरला जाने ज्ञानी ॥ सतगुरु घरका पूरा होई, सो यह बात पिछानी ॥

शब्द १६७-संतो अचरज एक मोहि लागे ॥ कुलकी रीत सदा उर धारे, सत्यशब्दसो भागे ॥ टे० ॥ कुलकी रीति भगति ना होई, ये सब बिषै व्योहारा ॥ मन मायासो अटके प्रानी, सूझे वार न पारा ॥ औरनसों कहें त्यागों भाई, आप सर्वस लपटाने ॥ जो लग जोग जुगत ना आवे, सकल काल घर जाने ॥ बांस बड़ाई छांडत नाहीं, ढिग चंदनके बासा ॥ आप तजे न बांस बड़ाई, ताते गयो निरासा ॥ जोपै लोक हमारा चाहो, धर्मनि तजो बड़ाई ॥ सतगुरु शब्द खोजके देखो, करम भरम छेजाई ॥ कहें कवीर मैं कहों पुकारी, सुनो संत निज बैना ॥ जब लग कुलकी रीत न छूटे, तब लग फूटे नैना ॥

शब्द १६८-कितने दिननके ठानो ठाठ ॥ टे० ॥ जो देहिया तुम निशदिन पालो, सो देहिया मिले माटी माट ॥ परनपखेर नगर एक काया, ना जानो जाये कोने बाट ॥ मर मर जैहो फिर फिर ऐहो, सौदा कर सतगुरुके हाट ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, अब का करिहो कागद फाट ॥

शब्द १६९-माली सींचता फुलवारी ॥ टे० ॥ ऊपर माली घर किया है, नीचे राखी द्वारी ॥ पानीसे जिन पिंड रचा है, ऐसा

(८२४)

कवीरपंथी—

अविगत प्याली॥ नौका बैठे रहट चलावे, सौंचत काया बारी॥ कहे कवीर सुनो भाई साधो, सतगुरुकी बलिहारी ॥

शब्द १७०—लग्गी न छूटे चाहे जिय जाय॥टे०॥ सारके भाले सार रहे, गुरु ज्ञान कमान चढाई॥ सतगुरु केवल वहियां, कोई अंदर भाल रमाई ॥ ध्रुव लागी प्रहलादे लागी, लागी विभीषन राई ॥ बिप्र सुदामाको ऐसी लागी, कंचन पुरी बसाई ॥ गोरख गोपीचंद भरथरी लागी, मीरा बाई ॥ पीपाजूको ऐसी लागी। कूद परा दह मांही॥ रंका लागी बंका लागी, लागी सदन कसाई॥ साह बलखको ऐसी लागी छाड़ चला बदसाई ॥ शेख फरीद कुवा बिच लटके, कागा चुन चुन खाई॥ वाजिंदाको ऐसी लागी; दौलत सबै लुटाई ॥ पैडेमें एक घायल पडा, वाके घाव नजर नहि आई ॥ पाव पलककी खबर न जाने, गहरी नीव दिवाई ॥ भौसागरमें नाव परी है, पार लगावो साई ॥ कहे कवीर दया सतगुरु बिन, कायर बूडा जाई ॥

शब्द १७१—हीरा जनम न बारम्बार, समुझ मन चेत करो॥टे०॥ पूरन परमानंद किया सब ताका होई। जब तब राखनहार, तरन तारन है सोई॥ संग आवै संग जायगे, अजहू संग रहाय। संग तुमारा छोड़के, अंत न कतहुं जाय॥ ठहर अगिनकी आंख तहां, प्रभु सिरजे अंगा। तहवां रच्छा करी आप, तुम्हारे होय संग॥ एक बुंदके साजमें, ऐसा किया बनाव। सरवन नैन मुख नाशिका, छबि दिये चलनको पांव ॥ कीट पतंग पखान भये, तरवर पशु पंछी। जलतरंग शिव भये, भये मगरा औ मछी ॥ अंग उघारे ते फिर, कतहुं न पावे सुकर। एक नाम जाने बिना, जनम जनम बहु दुकर ॥ बूडे दुख बिहाल जबे, औंचे सुख झूले। सो दिन बेग सँभार, कहैवा जाते अब भूले॥ मन भ्रमताके कारने, कीन्है

शब्दावली

(८२५)

नरक निवास । सुगंध रूप हो रहे, तब जीव गरभ दस मास ॥ इन दुखनसे काढ़ि, प्रगट बाहेर प्रभु कीन्हा । भगति अंगकी छांप प्रभू, दस्कत लिख दीन्हा ॥ उनको नाम न ले सके, जिन पठये भव मांह । रंचक सुखके कारने, विसर गये निज नाह ॥ बालक बुध अजान, कहा कछु मर्म न जाने । खेले सहज सुभाव, जहाँ वाके मन माने ॥ अधिक हठीले हो रहे, ना काहूको मान । भला बुरा चित ना धरे, बारा बरस अजान ॥ नौ दस भीतर आय जान, जब जुरी सगाई । नारीते पहिचान, नाम बद कीन्हे भाई ॥ पुरुष नाम ना ले सके, जिन पठये भौ माहिं । येहुं उमर भूले फिरे, देख कुटुम्बकी बांह ॥ जोवन जोर झकोर, मसी जब मुखपर आई । अंग सुगंध लगाय, शीश पगिया ढरकाई ॥ अंध भये सूझे नहीं, फूट गये जो चार । झूठे काम पंतंग जो, देख बिरानी नार ॥ जैसे रंग कुसुम, बहुत दीखतके नीके । भावे दिन दस चार, अंत लागेंगे फीके ॥ माया निकट बुलायके, देवै छाती बाढ । लीन्हे रंग निचोयके, ज्यों कोल्हू तिल काढ ॥ नाम जो रंग मजीठ लगे, छूटे ना भाई । रचे रच रहे शरीर, सबे दिन दिन अधिकई ॥ बारम्बार धोवाइये, देव करारी धोय । ज्यों ज्यों फटे पिछोरा, दिन दिन ऊजल होय ॥ जोधा अजर अजीत, पलट पुहमी पग धरते । दुश्मन रहत डराय जाहि छल बल कर गहते ॥ सौ जोजन मरजाद है, सिंधु करत एक फाल । हाथन परबत तौलते, तो धरि खायो काल ॥ जिन बांधा बलबीर, देव तेतीस करोरी । तिनके बिगरे राज, जरत जस फागुन होरी ॥ देखो दिष्टि पसारके, नर तुम्हरे केतिक बात । देखतही तुम जावगे, ज्यों तरवरके पात ॥ सोवतहौ केहि नींद, सूठ मुरख अज्ञानी । अंत समय पछताव, हंस जब देय पयानी ॥ काहे खोटी करत हो,

(८२६)

कवीरपंथी-

तुम्हारा बड़ा अभाग । लेखा मांगे वह धनी, तब का देहु जबाब॥ झीनी भाषा बोल, चेत चित कामिन चोरी । छिन छिन प्रीत बढाय, नामसे नाता तोरी ॥ लीन्हे अंग संग करी, रही ठगोरी मेल । या विध भंवर विलंबिया, कैवल रहे मुख फेर ॥ माया खोटी हाट, समुझके सौदा कीजे । खोटा खरा बिचार, परख अपने दिल लीजे ॥ तुम जिन खोवौ बावरे, हरि हीराकी सांट । कितने नर डहका गये, इन साहुनके हाट ॥ जोबन जोर झकोर, नहीं उर अंतर बाड़ी । होहु संत हुशियार, परख निज बांधो गाढी ॥ दे गजगीरा प्रेमको, मूदो दसों हुवार । वहि साहबके मिलनको, पलक न लागे बार ॥ सोवत हो केहि नौद, मूठ मूरख अभिमानी । भोर भये पछताव, हंस जब देह सिरानी ॥ छूटत है यह अंगते, ज्यों सरवरके वार । अब मैं सांची कहत हों, उडिहो पंख पसार ॥ ना जाने केह हेत, भये मानुष तन येहा । मन बच करम बिचार, जान निज चेतो देहा ॥ लख चौरासी भरमके, पाये मानुष देह । सो तन पाय न खोइये, झूठे प्रेम सनेह ॥ बिदा भये पछताव, जबें तीनों पन हारो । समुझ पुरानी प्रीत, बोल लागे तब प्यारो ॥ लचक धनुहियां जब गई, केस भये सब श्वेत । बोल बचन आवे नहीं, लूटे लियो घर प्रेत ॥ नांव झांझरी लाद, साज बैठे बैपारी । बोझे लोह पखान, मोहिं डर लागत भारी ॥ मांझधार पर भँवरमा, आन परी तब भीर । एक नाम जाने बिना, को गहिलावे तीर ॥ सौ भइयाके बाँह तपे, दुजौधन राना । परे नरायन बीच, भूमिमें विग्रह ठाना ॥ युद्ध रचा कुश्लेत्रमें, वानन बरसे मेह । तिनहुंके अभिमान गा, गीध न खाई देह ॥ छत्रपती महिपाल रहत, देखा नहीं कोई । दिन दस गये बजाय, अंत गरदहु मिल सोई ॥ परिहो नर्क अघोरमें,

शब्दावली

(८२७)

तब का चेतो अंध । एक नाम जाने बिना, परो कालके फंद ॥ ऊंट सलीता बहुत बहुत, हाथी ओ घोडा । चलत वारके समय, न लागे एको डोरा ॥ कंचन महला घर रही, और सुंदरी नार । जो आये सो जात हैं, चले दोऊ कर झार ॥ ऐसा यह संसार जान, जस रहटके घरिया । एक आवे एक जाय, एक पुन आवे भरिया ॥ उपज उपज बिनसत फिरे, फिर फिर करे गरास । एही तमाशा देखके, चितमें भये उदास । खेत बिराने लागे मृगा, एक बनसे गाधा । नित प्रति चर चर जाय, एक दिन आया व्याधा ॥ छूटन चाहे बल करे, मनही मन पछताय । अब कैसेके छूटनो, जब धनी पहुँचा आय ॥ ऐसा यह संसार जान, जस गुडकी मंखी । लागी चाखन बैठ, बाझगये दोनों पंखी ॥ पंख मरोरें शिर धुने, मनही मन पछताय । वह मलयगर छोड़के, यह दुख पायेउ आय ॥ काह कहुँ कित जाउं, आन चहुँ दिशसे घेरा । मात पिता पुचकार, हाथ चोटीसे फेरा ॥ मोह फांसमें बांधके, छूट न पावे जान । नारी तो बैरी भई, पुत्र भये निगमान ॥ यहाँ दूधका दूध, और पानीका पानी । सुनो संतो चितलाय, कहुँ यह अकथ कहानी ॥ कँवल कली बिगसित भई, अनभौ शब्द उचार । यह लीला है मुक्तिका, कहें कवीर बिचार ॥ ❁

शब्द १७२-हीरा तन पाय तूने सुमति गँवाई ॥ टे० ॥ नौ दस मास गरभमें राखे, नरक योनि भुगताई ॥ नरक योनिसे बाहिर काटे, मात पिताकी सुध बिसराई ॥ बालापनमें खेल गँवाये, पीछे ज्वानी आई ॥ जो माताने दूध पिलाई, सो माताको लात चलाई ॥ बृद्ध भये कफ आवन लागे, द्वारे खाट बिछाई ॥ पार- परोसी सब जुर आये, घरके कहैं यहि मौत न आई ॥ भवसा-

(८२८)

कवीरपंथी-

गरकी अगम बात है, जाके पार न पाई॥ कहें कवीर सुनो भाई साधू, छोड़ चले सबही ठकुराई ॥

शब्द १७३-संतो करो साहबी तनमें ॥ टे० ॥ पांच पचीस फौज या मनकी, खेलेँ भीतर घरमें॥ भरम मोरचा साहब काटे, बैठ जुगतके घरमें ॥ मूल कँवलकी खोल किंवारी, प्रेम मगन भये दिलमें॥ श्वेत फूल निश बासर फूले, लेत लहरिया जलमें॥ बंकनालको धावा देवे, चढ़ गया सूर गगनमें ॥ घाट पाट सब औघट देखे, आवे तखत नजरमें॥ ताल पखाल मृदंग जो बाजे, शोभा नगर महलमें ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, छायो नाम अधरमें ॥

शब्द १७४-में सत्तनामका बैपारी ॥ टे० ॥ काह लादे कांसा पीतर, काहू सामर खारी॥ संतन लादे नाम धनीका विष लादे संसारी ॥ पूंजी न टूटे नफा चौगुने, बनज किया एक भारी ॥ गैल जगाती रोक ना सके, है निरभय राह हमारी ॥ हाल हजूर रहत साहबके, पटा चढो दरबारी ॥ जब साहबने पंजा रोपे, जम पर अदल हमारी ॥ हीरालाल घटहीमें उपजे, सुकिति लगी किंवारी ॥ नाम साहबका लाद चले हैं, धर्मदास बैपारी ॥ लख चौरासी जिया जो इनसे, इनसे राह नियारी ॥ कहें कवीर एक बनज किया है, कबहुँ न आवे हारी ॥

शब्द १७५-अलमस्ता जोगी नाम अमल रस चाखा ॥ टे० ॥ याही तनकी कूंडी करले, शब्दके करले घोटा । भरम भांगको निशदिन घोटा, ज्ञानका साफी छनौटा ॥ आव संत जुर-मिलके पीवो, प्रेम मगन विस्वास । सुरत समेट धरौ हदैमें, छूट जाय भरम फासा ॥ रतन कटोरा भर भर पीवो, पांचों ईद्री साथ । रोम रोममें छाय गया है, का टंढा का ताता ॥ गुरुका शब्द

शब्दावली

(८२९)

अगिनका टनका, जब लागा तब चेता । सार शब्द खांडेकी धारा, सब हारा कोइ जीता ॥ सिरके साँटे भगत कबूले, का तनकी कुसलाता । साहेब कवीर मगन होय गावे, का संध्या परभाता ॥

शब्द १७६-साहब तेरा भेद न जाने कोई ॥टे०॥ पानी ले ले साबू लेले, मल मल काया धोई । अंदर घटका दाग न छूटे, निरमल कैसे होई ॥ जा घट भीतर बैल बंचे हैं, निरमल खेती होई । सुखिया बैठे भजन करत हैं, दुखिया दिल भर रोई ॥ या घट भीतर अगिन जरत है, धुवां न परगट होई । कै दिल जाने आपना, के सिर बीती होई ॥ जर बिन बेल बेल बिन तूबा, बे फूले फल होई । कहें कवीर सुनो भाई साधू, गुरु बिन ज्ञान न होई ॥

शब्द १७७-साहब मेरा मैं द्वालीबंद तेरा ॥टे०॥ पांच हथियार कमर कस बांधो, ठग ठाकुर बहुतेरा ॥ हनमस्ता चौकीपै राखो, चोर न मूसे डेरा ॥ सब दिन जीन छुटन ना पावे, चरन न पावे घोडा ॥ निश दिन लडे धनीके आगे, रनमें लडत अकेला ॥ पांचों मार पचीसों बसकर, जब मुजरा है तेरा ॥ मुजरा तेरा होन न पावे, लुटन लगे सब डेरा ॥ काया गढमें फिरे दोहाई, दुतिया रहन न पावे ॥ कहें कवीर ताहिको मारो, जो कोइ शीश उठावे ॥

शब्द १७८-ग्वालिन दधि बेच न जाना । मेरा सतगुरु दुहत दुहाना ॥टे०॥ मूल चक्रपै रोपी मटकिया, सुषमन खेंच मथाना ॥ सुरति निरतिकी करो कडनियां, धीरज फुलका भवना ॥ माखन खेंच छाछ कर न्यारी, त्रिकुटि महलमें छवना ॥ गुहिज कमलमें कुपीका बासा, माखन उलट समाना ॥ उलटके मीन चढी गिरवरको, कहें कवीर पहिचाना ॥

(८३०)

कवीरपंथी-

शब्द १७९-संतो अमल करे सो पावे, बिन ससुझे का गावे ॥ टे० ॥ जैसे सुराही लिये हाथमें, पल पल दरस दिखावे ॥ औरन आगे करत उजैरो, आप अंधेरे जावे ॥ बनी समाध रूपी घट भीतर, दिलवर दिलहि मिलावे ॥ चढो नसा उतरे ना कबहुँ, नैनन बीच रमावे ॥ बांचे पोथी अरथ उचारे, जगको कथा सुनावे ॥ जानत नहीं कहाँ हम जैहैं, घर जरे पूर बुतावे ॥ ध्रुव प्रहलाद नामदेव छाके, सुरदा गाड़ ज़िवावे ॥ कहैं कवीर देख सद्नाको, एकै घरे तुलावे ॥

शब्द १८०-हों जग जाहिरा मेरा नाम कवीर ॥ टे० ॥ तीन लोक ताना तनों, खूँटी है असमान ॥ पानी पवन सरूप हमारा, या विधि रचों जहान ॥ अनहद नाद गगन धुन गाजें, लागी सोहैं तार ॥ ब्रह्मबीज हमहीते आयो, हमहीं सिरजनहार ॥ गगन मंडलमें रहन हमारी, त्रिकुटी है अस्थान ॥ सुर नर मुनिवर पार न पावे, है कोई संत सुजान ॥ जम बंधनसे जाय छुड़ाऊँ, निरभै करो शरीरा ॥ सुक्तिभेद ताहीसे भाखों, जो मत गहिर गंभीरा ॥ वेद किताबसे रहते न्यारा, ऐसा मतको धीर ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, दोई दीनको पीर ॥

शब्द १८१-तुम बिन कौन गरीब निवाजे ॥ त्रिनसे बज्र बज्रसे तिनका, जोई करे सो छाजे ॥ टे० ॥ जलमें थल थलमें जल कीन्हो, बिगरी फेर संभारे ॥ नरते नार किये नारदको, अजामिलसे तारे ॥ मत कोई गर्व करो करनीको, करता कितम विचारे ॥ कहैं कवीर करतासे डरिये, मत कछु औरन टारे ॥

शब्द १८२-संतो पानीमें रजधानी । पानी पिंड ब्रह्मांड सकल सब, पानीकी मंडानी ॥ टे० ॥ पानी खेत बीज है पानी, पानी सांचे दारा । नाद बिंद संजोग समाना, जुगल स्वरूप सँवारा ॥

शब्दावली

(८३१)

पानीमें उपजे, पानी बिनसे, पानीके पंडित ज्ञानी । दस औतार पीर पैगंबर, पानीमें चारों खानी ॥ पानीके यह सकल रंग है, ताहि देख नर भूला । चिंता तेज कलप नहीं छूटे, फिर फिर संकट झूला ॥ पानीकेरे सकल भोग हैं, पानी सुखके रासी । जो पानीका मरम न जाने, सो भरमें चौरासी ॥ पानी ताता पानी सीरा, पानी खट्टा मीठा खारा । पानी झलक सपेद जरद है, लाल हरा औ कारा ॥ हिंदू तुरुक कहें हम दोनों, एक पानीते सिरजे । आपुसमें दोऊ लड़े मरत हैं, दुबधामें दोऊ उरझे ॥ पानी काया पानी माया, जित देखो तित पानी । पानीको करता घट भीतर, बोलत अमृत बानी ॥ जोग यज्ञ तीरथ व्रत संजम, ज्ञान ध्यान ले आया । कहैं कवीर एक समुझे बिन, काहू कछू न पाया ॥

शब्द १८३-मेरी प्रीत लगी गुरु नामसो ॥ टे० ॥ जैसे प्रीत है चंद चकोरकी, एकटक नैना ध्यानसो ॥ जा तन लगी सोई तन जाने, कठिन चोट गुरु ज्ञानसो ॥ जैसे मीन नीरके बिछुरे, तन मन तलफत प्रानसो ॥ भासिन प्रीत करि सतगुरुसों, छोड़ विरह रस कामसो ॥

शब्द १८४-दया करी गुरु जुगत बताई । आपा चीन्हे भरम नशाई ॥ टेक ॥ आपा चीन्हे त्रिभुवन सूझे । गुरु प्रताप कालसे जूझे ॥ बहुर न भटको रे नर भाई । पाप पुन्यको बीज नशाई ॥ पाप पुन्य दोनों कस बाती । जनम जनम इन जारी छाती ॥ काम कसाई क्रोध चंडाला । आशा बैरन तृष्णा काला ॥ लोभ डौमरो निद्रा डारा । मनसा चोर दियो दुखभारा ॥ कनक कामिनी कलहुको भोंडो । इन ठगनोने सब जग डाँडो ॥ कैसे छूटे मोहको फंदा । कैसे खिजमत पावे बंदा ॥ कैसे भँवर कमल जो पावे । कैसे जग जंजाल नशावै ॥ जब सतगुरुने सार मत दीन्हा । बडे

(८३२)

कवीरपंथी-

भागसे आतम चीन्हा ॥ बडे भागसे आतम जागे । कहें कवीर जबही भरम भागे ॥

शब्द १८५-साधू यो संसारमें, कमला जल माही ॥ सदा सर्वदा संग रहहे, जल परसत नाहिं ॥ टे० ॥ जुगत जान जलकूकरी, जल मध्य रहाई । पानी पंख न लागई, कछु कसरत पाई ॥ मीन तेर जल ऊपरे, कछु लगत न भारा । आड अटक माने नहीं, पैरे जल सारा ॥ जुगत जमूरा पाइया, सरपे लपटाई । वाको बिष व्यापे नहीं, गुरुगम्य बताई ॥ स्वीर खांड घृत भोजना, करसो लपटाई । जिभ्याको लागे नहीं, वाका चिकनाई ॥ भगल कला नट खेलेई, घर न्यारा न्यारा । खंड बिहंडल होरहे, ज्योंका त्यों सारा ॥ जैसे सीष समुद्रमें, चित धरत अकाशा । ऐसे पपीहा स्वातीको, नित प्यासा प्यासा ॥ कुंज ग्रह का संचरे, वाका को रखवारा । भौमें गलते राखिया, ऐसे गुरु हमारा ॥ बंबीमें बिषधार बसे, कोई पकर न पावे । कहें कवीर गुरु मंत्रसो, सहजे चलि आवे ॥

शब्द १८६-वा घरमें तुम घर करो, घर बहुर न होई ॥ कोट कल्प जुग बीतिया, बिनसे नहीं कोई ॥ टे० ॥ सैतन नीव गहरी दई, दे विवेकको गारा । सारशब्द ईंटे दई, गुरु राज हमारा ॥ भक्ति महल ऊंचे बने, धीरज घर पाटे । सत सुकित छहियां करो, पावे सिरके साटे ॥ प्रेम संदला गारके, गच प्रीतिसों डारे । शील दुलीचा डारके, साधुन बैठारे ॥ दया क्षमा चौकी करो, राखो घर बारा । कहे कवीर सतगुरु मिले, तब होय उबारा ॥

शब्द १८७-गुरुजी समुझ पकड़ियो बाँहीं ॥ जो बालक झुन- झुनियां खेले, सो बालक हम नहीं ॥ टे० ॥ हमतो लेहीं सत्तका सौदा, परपंच पूजत नहीं । चौदासो चेला तुम जो कीन्हे, ले धरिहो केहि ठाहीं ॥ जियत ठिकानो सर्बहि बतावे, सुए ठिकानो

शब्दावली

(८३३)

काहीं । जो तुम्हरे कछु उद्यम नाहीं, भीख मांग किन खाहीं ॥ मूल सजीवन जानत नाहीं, मत परबोधा काहीं । नाव तुम्हरी करिया नाहीं, लहर उठे विकरारा । गुरु सहित सब चेला बूड़े, कौन उतारे पारा ॥ सूखे काटे जो घुन लागे, लोहे लागे काई । बिन परतीत गुरु का कीजे, काल घसीटे जाई ॥ अमृतकुंड सदाकी चौकी, बेली बेला राखे । नेवर देखे विषहर कंपे, चपल अमीरस चाखे ॥ माया आय चौकमें बैठी, नवल विवाहन आहीं । दये कपाट महलमें पौड़े, अब कछु संशय नाहीं ॥ समझ न होय तो समझो गुरुजी, नातर होत बिगारा । कहैं कवीर सुनो रामानंद, यह सिख लेउ हमारा ॥

शब्द १८८—नगरीया वौरी कोई चतुर न पावे पार ॥ टे० ॥ साकट सूकर कूकरा, तीनोंका मत एक ॥ कोट जतन परबोधिये, तऊ न छाड़े टेक ॥ तास नाम बेगमपुरा, बसे सो बेगम होय ॥ या नगरी जो घर करे, बहुरि न आवन होय ॥ जात बरन यहाँ है नहीं, दरस दिवाना देश ॥ जतन जतनसों पाइये, बहुरि नहीं धरे भेश ॥ पांच तत्त्व तत्त्वहि मिले, पढ़ि समाने ग्रान ॥ ज्ञान ध्यान पैड़े थके, ततका ना गलतान ॥

शब्द १८९—जिनकी गगन घटा घहरानी ॥ चमको बीज भयो उजियारो, मिट गई तिमिर निशानी ॥ टे० ॥ ज्ञान ध्यानके बैल चराये, खेत जोत निरबानी ॥ दुबिधा दूब खोद किन डारो, फिर बोवो नामकी धानी ॥ अपनी अपनी बंधिया बांधो, बहि न जाय कहुं पानी ॥ चित चेतन रखवारे राखो, चरि न जाय मिरगानी ॥ उपजे खेत नाज घर आवे, आनंद मगन किसानि ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, तृष्णा तपन बुझानी ॥

कवीरपंथी शब्दावली २७

(८३४)

कवीरपंथी-

शब्द १९०—चलोरी वहि देशवा जहाँ बरषत रंग अपार । वहि देशकी औघट घाटी, बिरले पावे पार ॥ टे० ॥ सतगुरु सिंधु नाम पहिचानो, तन मन धन सब वार ॥ वहि देशमें नौबत बाजे, तत मत झीनो तार ॥ सरवन सुनत कटे जम बाधा, साध सबद अधार ॥ वहि देशमें जगमग जगमग, वहि शोभा उजियार ॥ तहवां हंस करे कौतूहल, पुरुषको रूप निहार ॥ एक हंसकी बरनो शोभा, षोडस रवि छिटकार ॥ भोजन सुधा पुहुषकी सज्या, आनंद अखंड अपार ॥ उबरे नाम पायते जगते, भगते होय नियार ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, आवागमन निवार ॥

शब्द १९१—यो मन ऐसा नीच संचाती ॥ डोलत फिरत नीच नीचनमें, आठ पहर दिन राती ॥ टे० ॥ बिषकी बात लगत अति शीतल, हरि चरचा लग ताती । शुभ करमनको भगे पीठ दे, कुकरमन रोपे छाती ॥ वे जीव जाय परत नरकमें, मन सुख बांधे गाती । कहें कवीर सुनो भाइ साधू, जाको जोन सजाती ॥

शब्द १९२—भले आये सतगुरु मैं बलि जाय । आतम अंध जगायो आय ॥ टे० ॥ अंधरी आतमके भरम भगाय । लख चौरासीकी बंद छुडाय ॥ अंधरी आतम जब उतरे पार । कोट करम फंदा भरमजार ॥ पूरन सतगुरु प्रगटे आय । नौ लख तारे गये छिपाय ॥ पूरे गुरुनकी पूरी कला । और कला दीसे ना भला ॥ और कला त्रिगुनकी ओट । सतगुरु कला परम संतोष ॥ येही कला मन राखो थीर । जनम जनमकी मेटो पीर ॥ दस मास जननीको मारो बोझ । भगति बिना भये बनके रोझ ॥ साहब कवीर गुरु जीत लियो सार । पाये हम सतगुरु दीनदयाल ॥

शब्द १९३—माई मैं जनम जनम अहिवाती ॥ टे० ॥ अब हम रांड होवें ना कबहुँ, वर पायौ अविनाशी ॥ तुलसीकी माला

शब्दावली

(८३५)

रुच रुच पहिरों, कांचकी चुरिया लजाती ॥ काजर सिंदुर मनहि न आवै, द्वादश तिलक बनाती ॥ कहै कवीर सुनो भाइ साधू, अमरलोकको जाती ॥

शब्द १९४—नाचरे मन मेरा नट होय ॥ टे० ॥ ज्ञानके ढोल बजाव रैन दिन, शब्द सुने सब कोई । राहु केतु नवग्रह कपै, जम घर बंदन होई ॥ द्वादश तिलक बनावे बांस चढ़ि, जगते होरहु न्यारा । सहस कला होय नाच मन मेरे, रीझे साहब तेरा ॥ जो रीझे जगदीश जगतगुरु, दैहैं दान बुलाई । भरी सभामें चोला बगसे, फाट न कबहू जाई ॥ जो भवसागर कूद परोगे, कला न बदिहों तेरा । कहै कवीर सतोब्रत साधो, नौ निधि होवे चेरा ॥

शब्द १९५—भव भंजन गुन गाऊं, रमता राम रिझाऊं ॥ टे० ॥ तन कर घोडा मनकर चाबुक, सुरत लगाम लगाऊं ॥ पांच पचीस बखतरिया मारो, फिर मुजरेको आऊं ॥ ना मैं पूजों देवी देवा, ना मैं देवल बनवाऊं ॥ पांच मवासी इस नगरीमें, मान गुमान बहाऊं ॥ देवल जाते पत्थर पूजा, तीरथ भगती पाऊं ॥ इस कायामें कोटन तीरथ, जहवाँ बैठ अन्हवाऊं ॥ आगे आगे ओट दुलीचा, पीछे नौबत बाजा ॥ दस्तके ऊपर लाल बन्दूके, फिर बैरीको साजा ॥ लोभ मोहकी गरदन मारौं, ज्ञान कमान चढ़ाऊं ॥ कहै कवीर सुनौ भाइ साधू, बेद विमल जस गाऊं ॥

शब्द १९६—तेरा रोकनवाला कौन, सुरतसों आव चली ॥ लोकलाज कुलकी मरजादा, सिरतें डार अली ॥ टे० ॥ पटको भार मोह मायाको, सन्मुख डगर धरी ॥ काम क्रोध हंकार कल्पना, डुरमति दूर करी ॥ मन अभिमान दोऊ धर पटके, निरभै राह गही ॥ क्षमा शील संतोष धीरज धर, कर गहि ज्ञान छही ॥ अगल बगलकी झार मार सब, होय निहशंक चली ॥