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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(८१७)

सो जल कैसे काढिये, विधि देहु बताया ॥ सतगुरु खेवट साथले, जिन अथाह थहाया । कुंभके जल कुंभे मिला जल, जलहि समाया ॥ कहें कवीर धर्मदाससों, मैं कहों पुकारा । एक नाम चीन्हे बिना, अटके जमके द्वारा ॥

शब्द १४४-तुम सब घट पूरन साईं, मेरी ओर चितवत नाहीं ॥ टेक ॥ या घटके कोई ना जाने मेहरम साईं ॥ अबकी बार चितवो नेक मोपर, जिवकी कल्पना जाई ॥ सेवा सुभिरन कछु न जानो, औगुन है गुन नाहीं ॥ हमसे पतित तुम केते उबारो, हमहुंको तरु गोसाईं ॥ अधम उधारन सुन यह बिनती, अरजी बिसर न जाई ॥ साहब कवीर अधमको तारो, तुम्हरो विरद लजाई ॥

शब्द १४५-बोलनहारा राम रजा है ॥ पिंड ब्रह्मांड रहा भरपूरी, आप अकेला बांध धजा है ॥ टेक ॥ जैसे बुंद परो जल माहीं, जलहीते बुदबुद उपजा है ॥ मिट बुदबुद जल माँहि समाने, हो रहो एक सरूप सजा है ॥ जैसे कुंभ भरो जल माहीं, सबमें दरसे चंद सजा है ॥ विनसे कुंभ चंद ना विनसे, शब्द सरूपी अमर अजा है ॥ जामों हम सोई हम माँही, वाही तत्त्वमें गगन गजा है ॥ कहें कवीर संशय कछु नाहीं, तत्त्व लखा तब भस्म भजा है ॥

शब्द १४६-बैरागी रामा गांव ठाँव, खोजे सचु पाऊंगा ॥ टे० ॥ तीरथ जाऊं न जलमें पैठों, जीव जतन सत पाऊंगा ॥ सकल तीर्थ गुरु घटमें बतायो, तामें पैठ नहाऊंगा ॥ पानी ढोरों न पाहन पूजों, देव देवल नहि जाऊंगा ॥ व्रत अखंडल मंडल ऊपर, अनहद बीन बजाऊंगा ॥ बेद किताब सुमृति ना मानों, गीत कवित्त न गाऊंगा ॥ पाँच सोहंग करें नहि पूजा, भला भला न कहाऊंगा ॥