कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
बैठ नाम निहछत्र सिगासन, अविगतसों लौ लाऊंगा ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, सहज समाध लगाऊंगा ॥
शब्द १४७—तुम चलोतो चाल निगोडा, मैं तो गंगा न्हाऊंगी ॥ टेक ॥ इमनी बेच्छं तिमनी बेच्छं, सेर दस गेहूं लाऊंगी ॥ पांच सेरकी करों कडाई, मंजिल मंजिल पर खाऊंगी ॥ छोरा पटकूँ छोरी पटकूँ, घरमें आग लगाऊंगी ॥ सुनियोरी मोरी पारपडोसन, दिना चारमें आऊंगी ॥ गंगाजीके तीर जायके, अजपा जाप जपाऊंगी ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, मूंड मुंडाय घर आऊंगी ॥
शब्द १४८—कायागढ नगरियासे, गगरिया भरके लावो रे ॥ टेक ॥ पवनके इनरवासे, सुरति डोरिया लावोरे ॥ नौ नारी पनिहारी आई, लागा पूरा दावोरे ॥ पांच पचीसो रंगे चंगे, मनके माते भावो रे ॥ निरगुनके इंडरोया धारे, होले होले आवोरे ॥ गगन अटरिया चढके देखो, सबका भावो रे ॥ सदरद दिवाने खडे डुवारे, दरसे वाके पावोरे ॥ साहब कवीर गुरु भर भर लावे, संतनको पिलावोरे ॥ जन्म मरन भी संशय नहीं, ऐसा कहरा गावो रे ॥
शब्द १४९—नइया बिच नदिया डूबी जाय, कहीं देखेहो मिसरजी ॥ टे० ॥ एक अचंभा हमने देखा, कुवामें लागी आग ॥ जल हता सो जर गया, मछली न लागी आंच ॥ नदी किनारे नइया लागी, नदिया डूबी जाय ॥ ये माया भगवानकी, ताहीसे उबियाय ॥ चीटी चली सासरे, नौ मन काजर लाय ॥ हाथी मार बगलमें दावे, ऊंट लिये लटकाय ॥ एक चींटीके सुवले, खाये गिध हजार ॥ बाकी बचे सो काकरे, चील रही मड़राय ॥ एक चींटीके मूतमें, बहगये नदिया नाल ॥ पंडित पछारे धोतियाँ, धीमर डारे जाल ॥ गगन मंडिलमें गऊ वियानी, धरती दही जमाय ॥ बाछा वाके