कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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पेटमें, माखन हाट बिकाय ॥ एक अचंभा हमने देखा, गढ़ाके सिर सींग ॥ चींटीके पग डोरी लागे, खैंचे अर्जुन भीम ॥ कहें — कबीर सुनो भाइ साधू, या पद है निरबान ॥ या पदका कोई अरथ लगावे, सोई संत सुजान ॥
शब्द १५०-बानी छोड़दे अभिमानी ॥ टे० ॥ जे भईयाके गरब करत थे, सोई भये अगवानी ॥ जे सायरके गरब करत थे, तापै सिला उतरानी ॥ जे लंकाके गरब करत थे, सोई भये धुरधानी ॥ कहे कबीर सुनो भाइ साधू, शब्द लेउ पहिचानी ॥
शब्द १५१-अवधू कौन देश निज डेरा । तेरो हंसा लेत बसेरा ॥ टे० ॥ कौन देश है कौन दिशा है, कौन आपहो साई ॥ कौन महलकी टहल करत हो, कहो खबर केहि ताई ॥ नर नारीके गरभ भोगते, सहजे काया पाई ॥ की तुम जनमें मात पितासे, की बीचहि आन समाई ॥ चित्रगुप्त जब लेखा मांगे, बहु बल रूप सँवारा ॥ गोच केबार बांध फटकारे, अगिन कुंड ले डारा ॥ मझधार नइया डोलन लागी, अजहूं खेव सबेरा ॥ कह कबीर अबकी बेर चेतो, तब मिटिहैं जम जेरा ॥
शब्द १५२-दोय दिन खेल ले यह खेला ॥ ये तो नदी नावको मेला ॥ टे० ॥ कौड़ी कौड़ी माया जोरे, संग न जाय तेरे घेला ॥ और जनम बहुतेरे पावौ, मानुष जन्म दुहेला ॥ मात पिता सुत कुटुम्ब कबीला, संग न जाय तेरे भेला ॥ चार वेद षट्शास्त्र पुकारें, संत न देहैं हेला ॥ कहें कबीर सुनो भाई साधो, गतीका विरद दुहेला ॥
शब्द १५३-तुझे बोलनकी सुध नाही रे ॥ टे० ॥ चंद चढे कुल आलम देखे, मैं देखों तेरे ताई रे ॥ दुनियां पूजे पीर पैगम्बर, मैं पूजों गुरु साई रे ॥ काम क्रोध अभिमान भरो है, कालके फाँस