कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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रहो नियार। एक दिष्टि चितवत नहिं तनमें, को है सिरजनहार॥ वेद पठे पर भेद न जाने, कथनी कथे अपा। आपर न बूझे जगहिं बुझावे, सूझे वार न पार॥ भ्रगानाभि बसे कस्तूरी, ढूँढे घास उजार। कहें कवीर वा घट परगट, है कोई बूझनहार॥
शब्द १३३-जगमें करता काल कहावे॥ निराकार जग बाडा बांधे, बाहर जान न पावे॥ टे०॥ तीन लोक बाडा बिच कीन्हे, ठौर ठौर रखवारा। ऊपर कोऊ जान न पावे, आप करे संधारा॥ साधे बान धनुष धर लीन्हे, दूतन बाहिर पठावे। भागे जीव ठौर ना पावे, फिर फिर मुखमें आवे॥ सुन्नमें वर्षक जात सरूपी, बैठे घंट बजाई। सुनके जीव सबे उठ दौरे, परे कालमुख जाई॥ सोई रैन उजियारी, देख जीव सब धावे। इनको मारत बिलम न लागे, उसे दरद ना आवे॥ कहें कवीर जो सतगुरु चीन्हे, सो यह भेदहिं पावे। बाडा तोर बाहिर ले निकसे, निहचल घरहिं पठावे॥
शब्द १३४-संतन ज्ञान लहर धुन माडी॥ शब्द अतीत अनाहद राचे, या विधि तृष्णा खाडी॥ टे०॥ खाड बुने कोरीमें बैठा, भौ खूंट दे गाडी। ताना वाना परो उनासा, सुत कहें बुन गाडी॥ वनके ससे ससुंदर कीन्हा, मक्षा चढी पहाडी। शुद्ध पिवे ब्राह्मण मतवाले, फल लागे बिन डारी॥ मूसा तपे बिलारी सेवे, स्यार सिंहको खाई। एक अचंभा देखो भाई, जलमें अगिन रहाई॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधू, अगम ज्ञान पद माहीं। गुरुप्रताप सुईके नाके, हस्ती आवे जाई॥
शब्द १३५-सहज एक ऐसी हूल परी॥ भागे शिव शनकादिक नारद, मोहे अचेत हरी॥ नौ दस भाग भगे तैतीसौं, चौरासी सगरी॥ भेख अभेख करे को लेखा, काहु न जान परी॥ ब्रह्मा