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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 828

(८१४)

कवीरपंथी-

आदि ईंद्र सब भागे, सुध बुध सत बिसरी ॥ ये सबहीके देखा- देखी, दुनिया भगी बपुरी ॥ धीरज राख रहे ना कोई, छांड भगे नगरी ॥ कहैं कवीर हटको नहीं माने, धौखेकी बिडरी ॥

शब्द १३६-संतो काल रची जग बाजी ॥ वेद पठे पठ पंडित भूले, पठ कुरान भूले काजी ॥ टे० ॥ आप न बूझे जगत बुझावे, शब्द वेद अरथावे । अमृत विषहिं एक कर माने, भेद न कोई पावे ॥ आप कहे जग काल अपरबल, आपहि धारे ध्याना । जिन जिव दियो सोई जिव लेवै, सबका एही ज्ञाना ॥ वेद पठे औ अरथ विचारे, सूझ बूझ न पावे । जरा मरनके आस बंधै सब, फिर फिर जोनी आवे ॥ जोगी तपसी बुनिवर कहिये, संत साध सब धावे । आवत जात जन्म बहु बीते, अस्थिर घर ना पावे ॥ पीर औलिया गোস कुतबिया, फिर फिर यही पुजावे । मेहनत करे सोई फल भुगते, पाक साहब ना पावे ॥ उतपति परले पैठ लगाई, सकल जीव भरमावे । भँवरजाल कियो भौसागर, पार न कोई पावे ॥ कहैं कवीर जो सतगुरु चीन्हैं, सो यहि भेदका पावे । आवागमन दोऊ दुख मेटै, निहचल घरहिं पठावे ॥

शब्द १३७-माया काली नागनि जिन डसिया सब संसार ॥ टे० ॥ इंद्र डसे ब्रह्मा डसे, नारद डसिया व्यास । बात कहत शिवको डसी, जाके छिन एक बैठी पास ॥ कंस डसे सिसपाल डसे, रावन डसिया जाय । दस मस्तक जाके भूमि परे, ताकर लंका दर्ई लुटाय ॥ बड़ बड़ गारुड सब डसे, कोइ न कीलनहार । कच्छ देश गोरख डसे, जाका जोग अपार ॥ चुन चुन मारे चतुर सूरमा, जाकी करे जग आर । तोसे गरीबकी कौन गिने, कहैं कवीर विचार ॥

शब्द १३८-रामगति पार न पावे कोई ॥ चितामन प्रभु निकट