कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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(८५)
नैन तृषा जल पूरित, सिन्धु स्वरूप बिना न अद्याये । हे हरि पातहुको खरका सुनि, जानि परे हमरो हरि आये ॥ १७ ॥
विलपात बिते दिन रात सबै, ढिलगात अनेक जो आँख झपाईं । कोइ स्वप्नमें द्वार पुकार कहै, सुनु बाल लला तब द्वारपै आईं ॥ जब आँखि उधारनको करके, करके शुभ अङ्क सगून लहाईं । हरषे दुख दोसरके विरहा, हरिके हरिके सुनि आगम पाईं ॥ १८ ॥
अब आवन आवन होय रहौ जिहि, बार विलम्ब मेरे घर ऐहैं । सुख सम्पति दम्पति देखतके, सुर नायकहु मनमाँह सिंहैं हैं ॥ हरि छूत विभूत भरी लभरी, कन धूलहु धूम न दूसर सैंहैं । तिहुँ लोक पलोक विलोकन सो, धन धान्यन धाम धन दुर पैहैं ॥ १९ ॥
अजहुँ नहि दूति संदेश दियो, मनै माहिँ अँदेश यही खटको । इतने महुँ धावन आई गयो, अब साज सिंगार सबै ठटको ॥ कछुवारमें आनि पहुँच पिया, धनि और नहीं मनमें भटको । सुनिके पिय आगम मोद महा, मग जोह सँताप घटा घटको ॥ २० ॥
कवित्त-
नैन मनि प्रवाह, सरितावलि अगाह, सागर सरूप हरि मिलन ललकमें । ठहरे कौन कौन विधि, पाये विनवार निधि, मिलनि निहाल भई पलक पलकमें ॥ चरनामृत परचो आनि, सुख घन भरी ज्ञान, गुन छन बुन्दकी छलकमें । प्रीतम प्यारे पग लागि, पड़े भागजागि, पदरज सज निज आँखिन अलकमें ॥ १ ॥ इति ।
ध्वनि इमन (समय ८ बजे रात्रि.)
अब दुख दीनानाथ निवारो । तब पद तजि त्रिलोकमें दीसत, मोहि न और संहारो ॥ टे० ॥ थाह रहित अपार भववारिध, अगम अग्राध किनारो । मध्य धारमें नैया अटँकी, खेयके पार उतारो ॥ जहाँ २ परति विपंति सन्तनको, तहाँ २ आप सिधारो ॥
१ नाश करो. २ अवलम्ब. ३ अपार. ४ अङ्गई. ५ संकट. ६ पधारै.