भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(८४)

कबीरपंथी—

शिर टोप दया है कोपीन हया, जपमाल कथा सतनामकी सेली ॥ करमण्डल कर्म गहे करमें, चलि खोज पिया परिवारहिं पेली । बनि योगिन वेष विरागिनसों, सुख दुःख सबै अपने तन झेली ११॥

हरिद्वार गया नहिं मेल भया, न बनारस माहिं बनारस पीना । मथुरा न अवध न द्वारदरी, ददरी बदरीवन मक्का मदीना । न प्रयाग न पुष्कर थान जिया, भलछान किया सो पिया है कहीना । सब अरसठ भर्मत भर्म भरी, कछु हाथ नरी निजनाथ न चीना १२॥

गिरिनारन पैठि पहारनपै, ऋषिराय अखारन जायके जोही । सुनसान परो चवगान थरो, दुख दून करो तिहिं जूनमें ओही । केहि पूछों अबै लखि छूछौ सबै, कोय पीय बतावहु बाट बटोही । सब खोज थकी पिय प्रेम छकी टरी, काहू जो नाट मिले अब मोही १३॥

तब पैठि गुहा हरि ध्यान गहा, दम संयम नेम तपोधन भारी ॥ जप योग अचार विचार घने, हठ योग ठने हट लावहिं तारी ॥ नभ जायके देखत ज्योति जगे, छबि छाई है मोतिनकी लर झारी ॥ तनको किसिकें मनको वसिकें, षट चक्रको बेध चढी है अटारी ॥ १४॥

चढ जाइ अटा गढ छाया छटा, नहिं चित्त उठा निजहित्त न हेरो । जब और न दौर रही कतहुँ, मतहु पतहु गतहु गतगेरो ॥ परि पाप विनय सतभाय करो, शरणागत माँगत हौं प्रभु तेरो । अब आन उपाय उपाय कहा, नहिं पायहिं पाय थका इहि मेरो ॥ १५ ॥

हाहरि पान शरीरमें बेधत, सीर समीरहु तीर सो लागे । हे हरि ! चन्द्र समी शर मारत, मानहु आगि लुकारन दागे ॥ हे हरि धन्य सुभाव सुभागिन, सोच रही बिरही नित जागे । हे हरि सो सुखसे किमि सोवत, दुःख सोहागिन जो पति त्यागे ॥ १६ ॥

हे हरि आजु कन्हार्ई नहीं ग्रह, श्रीषम ताप सो लाग जु न्हाये ॥ हे हरि ई निसि नागिन डंसत, पीव विना जीव कौन बनाये । हे हरि