भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(८३)

हरि नेरे अहों कियौ दूर कहूँ, भरि पूर हजूर हो नेनन मेरे । हिय ठाहर हो कियौ बाहर हो; धरती अस्मान तुही तुहि टेरे ॥ गलि गोरिनने तरुतोरिनमें जड़ साखन फूलन पातन हेरे । मोहिं समाय लखाय नहीं, कहु कौन उपाय गहौ पद तेरे ॥ ६ ॥

हमसूं कियो भिन्न कियो यक है, तू सुहिमें कियो मैं तुहि मांही । सब पूरन देखत तूहि तुही, किछु एक अहो धो अनेकन आही ॥ कियो स्वर्ग बसौ अपवर्ग कियो, निसिवासर वास कियो मोहिं पाही ॥ पिय आपै आप जो व्याप सही, किहि कारन तेहु विधा दरसाही ॥ ७ ॥

कहूँ गोय रहे विष बोय रहे, नित मो मन मन्दिर माहि विहारी । विनु लालन बाल विहालपरी, वह कौन घरी जो हरी पग धारी ॥ सुखको नहीं लेश कलेश भयो कर, काह पिया परदेश पधारी । सपने अपने हरि भेट भई, सुँह खोल लखे हग लोल लबारी ॥ ८ ॥

कबहूँ न पिया अपमान किया, किमि कै विधि बाम बिछोह करी है । लकुटी कर ले मोहिं मार कहूँ जनु, कांटकी मारहु फूल छरी है ॥ दुर दूरि कह्यो दबि दूरि दुरा, जब टेरे हरी तब पांय परी है । जिहि भांति से राखि रही त्योहि त्यो, कछु भोग धरी तिहिं पेट भरी है ॥ ९ ॥

कह वीर करो तन पीर परो, किमि धीर धरो नहिं प्रीतम आयो । दिन रात कराहि कराहि उठे, विरहा दव दाहि जो ताहि न पायो ॥ हिय हूक परी कह चूक परी, विधना सिधना मम काम पुरायो । सुन हेरि भटू अब ठाट टटू, मति धूसर दूसर वेष बनायो ॥ १० ॥

सब भूषण भू छटकाय दियो, सतसङ्ग विभूतिले अङ्गन मेली ।