कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
सर्वथा—
हग मानसरोवर नन्दननिमै विवि मीन फिरे कहि कारनते । जबते रतिनाथ विछोह भयो, मनके विरहानल जारनते ॥ प्रभु दीन दयाल दया करिये, विन्ती सुनि लाख हजारनते । कहूणाधर धार हिये करुण, पति या पतिपाह सकारनते ॥ १ ॥ उनमाद उचाट भये मनमाँ, उदवेग न चाट सिंगारनते । नित लेत उसांस है आस लगी; तन छीन भयो मन मारनते ॥ गुण गान प्रलाप कलापनते, तन तापत ताहि विचारनते । पलना विसरे ललना सुरती, मूरति हरि हीय सँभारन ते ॥ २ ॥
जग जान जहान उधारन हो, कलि कायर कूर उधारन ते ॥ गनिका मनिका कह फेरत है, मोहिं सों कपटी भव तारनते ॥ प्रभु नाम जहाज तरी लदके, छनमें जगती जिव भारनते । न मिले पिय नेह कवीर विना, विधि मीन फिरे यहि कारनते ॥ ३ ॥
सोरठा ।
निशिदिन साले घाव, नींद मोहिं आवे नहीं । पीय मिलनकी चाव, सो नैहर भावै नहीं ॥ १ ॥
तबैया ।
उर सालत घाव दिना रतिया, धरके छतिया नहिं चैन लई है ॥ सुख भूरि भरा तृण तोरि धगा, भल भोग सबै दुख रोग गई है ॥ पिय आजइ काल कहे परसों, बरसों बरसों नहिं भेट भई है । मन मोहन मोहन मोह दर्द, विन दर्द दर्द दिन सदै दर्द है ॥ ४ ॥
जिनके चित चिन्त खचिन्त भयो, उर अन्तर ज्वाल निरं- तर जारी । तन टट्ट रहे मन भट्ट दहै नित सोचन पोखन खोचन भारी ॥ तिय साधु मती निमती विधिको, झुखै पुखै किमि आस हमारी । यहि औसर चौसर खेल्हुँगी, तनहु मनहु धन दावपै धारी ॥ ५ ॥