कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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(८१)
है ॥ कहुँ जोत खद्योत उद्योत भई, मनमें अपने अभिमान गही है । निसि डाट कहे मम तेज लखो, रविते हमरो कछु घाट नहीं है ॥ १७ ॥
सखि काह करो पिय दूरि गये, हिय पूरि गये विरहानल कैसे । मन भावन जासु विदेश गये, धूक जीवन है तिनको जग तैसे ॥ प्रभु वेगि कृपाकरिके सुधि लो, तुम दीनदयाल कहावत जैसे । पतिया पहुँचाव बसीट मेरी, अरु बाँचि गुनावहु पिया ढिग ऐसे ॥ १८ ॥
विनय पत्रिका ।
दनुजा मनुजा महाराज महा, सुर संत सती सिरताज कहाओ । जन दीनबन्धु हो सिन्धु दया, हृदय थलको मलको श्रुति गाओ ॥ सब मूल सोई नहि तूल (तुल्य) कोई, गुण-सागर नागर कौन थाहाओ । हमरी करनी सुधि ना करनी, दुःख द्रन्द विदार दिदार दिखाओ ॥ १९ ॥
सुरती इतो प्रति ॥
मम पायक शोक सहायक तू, सुरती कुरती पिय पाहँ पधारो । करजोरिके पा गाहियो प्रभु को, कहियो तेहि कोटि प्रणाम हमारो । जब कंत दुरंत संदेश सुनो, निज प्राण निछावर ताछन कारो । इमि ले अर्जी कर दूति चली, वरजी विरहा वर ध्यान को धारो ॥ २० ॥
पिछलो रातका विरह । दोहा-
यहि निश्चय के नखत गण, अपने अपने ढंग । भय भ्रम हटै न दुख मिटै, होय न तिमिर विभंग ॥ १ ॥ करुणामय करुणु निरखि, हरखि चितोनन ओर । सुखपावे मुख देखि हरि, होय विरह निसि भोर ॥ २ ॥ आवन आवन कहिगये, अजहुँ न आये लाल । धावन फिरा न पिउ फिरे, भामिनि हाल विहाल ॥ ३ ॥