भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कबीरपंथी—

उह डोलत संग पिछार सखे, ढिल अंग लखी गठरी गहि भाजी । डुशियार हो संत सुजान सुनो, पलही भरमें वह मारत बाजी ॥ गठि कण्ठ लिये फँसरी करमें, सिद्ध साधुनके गल डारत पाजी । सत धर्म नशाय खँसाय लियो, तब नेक डुबावनको सज साजी १२

जबलों तन प्यार न प्यार पिया, तन आस तजे पिय खास सही है । नहिं मैं तब तू जब मैं नहिं तू, रह एक विवेककी टेक सही है ॥ जहाँ राम न दूसर काम तहाँ, रवि रैन यकत्र न होत कही है । जब प्रीति गही तहिये गहिरी, कुल कानि कहाँ सुलतान वही है ॥ १३ ॥

जिमि चुम्बक लोहसे मोह करे, जलहीन भई जस मीन दुखारी । अलि अम्बुज प्रीति न बीति कभी, पपिहा लपिहा सुख स्वातिकी बारी । जिमि चन्द चकोर यकोर लखे, सिख दीपक रंग पतंग निहारी । यहि राह न नाहसे नेह लगी, नहिं आशिक है वह फाँसिक यारी ॥ १४ ॥

दगपूरति नींद हराम भई, धनि लेत उसासहि बारहिं बारा । तन पीत भयो कृश गात भयो तस बात भयो लघु भोजन धारा ॥ अधरा पट सूख तृषा हियमें, नहिं जो पिय रूप पियूष निहारा ॥ गुन गान सदा हिय ध्यान धरे, बिरहिनके यह दश चिह्न उचारा १५

पथ देव अकाश नहीं जन है, असमान लियो निज पाग उतारी । पसराय दियो सगरे दुगरे, गुरु खाट निहारत पांव दे डारी ॥ बिखराय सबै मणि माणिकको, विरती बलि बैठि यती व्रत धारी । दिन भूषण ध्यान धरे सुनिहा, दुख दूखन पूषन पेखन टारी ॥ १६ ॥

कहुँ चोर चकोर रु चन्द बधू, विगसात अनन्द उलूक लही है । कहुँ बादुर बीर बहादुर भय, दुख दायक जंतु अनंत मही

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