भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(७९)

कछु तेही ॥ तम त्रासक ध्यान धरो उधरो, सुधरे सुधि बुद्धि दया दग जेही । गुरु देव बिना निशि नाश नहीं, विश्वास करो एक युक्ति है एही ॥ ६ ॥

यह नींद सही है महा ठगनी, छनमें धन जोवन वृन्द बुहारी । गहि गोड जती नहि छोड मती, छलि साधुकी सम्पति लूटन हारी । सजि कण्ठको वेष न देखि परे, इमि आई है ओढ़िके कामरि कारी । यह है न नहीं कमरी पसरी, गठरी धनकी बांधि सँवारी ॥ ७ ॥

हरि नाम चरित्र पवित्र महा, सुत्तामणिके वन देत दवारी । घन घोर घरे नहि सूरि परै, धरि वज्र कपाट सुज्ञानकी द्वारी ॥ रिधि सिद्धि जहां लगि लाभ कहै, इन सर्व गहे ठगनी छल कारी । नहि कूछ रहा इन छूछ कियो, यहि कान भये ऋषिराज भिखारी ॥ ८ ॥

मनते भुख भ्रूख अहार गहे, व अहार ते नींद सो कालकी फांसी । यम दण्ड प्रचण्ड यही है यही, करसो सतखण्ड सो ज्ञान की रासी ॥ नहि शुद्ध स्वरूप लखे हरिके, धरि अन्ध कियो धर्मरायकी दासी । यदि जाल फँसायके काल हते, सब जीव बने भवसागर वासी ॥ ९ ॥

नहिं चेत रहा दुख देत महा, हरि हेत कहा दुर्बुद्धि बड़ी है । पिय आगु खड़े नहिं चीन्हि पड़े, दग सन्मुख कन्धकी सन्ध पडी है ॥ तजि राम हरामके काम लगे, चुहडी फुहडी जब आन अडी है । सुमती हरिगै कुमती भरिगै, यम सेल हिये बिच ठेलि गडी है ॥ १० ॥

मन रौन जो भौनते गौन कियो, तमसी तमसी तमसी तम ठोने । अति प्राण अधार अधार बिना, विलपात अधीर धराधर कोने ॥ यहि बैरिन पैरिन संग लिये, पहुँची विरहा विष बेलको पोने । सुख साच बिहाय अकाज भयो, नियरानि सुभाग सुभागि निधोने ॥ ११ ॥