कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(७९)
कछु तेही ॥ तम त्रासक ध्यान धरो उधरो, सुधरे सुधि बुद्धि दया दग जेही । गुरु देव बिना निशि नाश नहीं, विश्वास करो एक युक्ति है एही ॥ ६ ॥
यह नींद सही है महा ठगनी, छनमें धन जोवन वृन्द बुहारी । गहि गोड जती नहि छोड मती, छलि साधुकी सम्पति लूटन हारी । सजि कण्ठको वेष न देखि परे, इमि आई है ओढ़िके कामरि कारी । यह है न नहीं कमरी पसरी, गठरी धनकी बांधि सँवारी ॥ ७ ॥
हरि नाम चरित्र पवित्र महा, सुत्तामणिके वन देत दवारी । घन घोर घरे नहि सूरि परै, धरि वज्र कपाट सुज्ञानकी द्वारी ॥ रिधि सिद्धि जहां लगि लाभ कहै, इन सर्व गहे ठगनी छल कारी । नहि कूछ रहा इन छूछ कियो, यहि कान भये ऋषिराज भिखारी ॥ ८ ॥
मनते भुख भ्रूख अहार गहे, व अहार ते नींद सो कालकी फांसी । यम दण्ड प्रचण्ड यही है यही, करसो सतखण्ड सो ज्ञान की रासी ॥ नहि शुद्ध स्वरूप लखे हरिके, धरि अन्ध कियो धर्मरायकी दासी । यदि जाल फँसायके काल हते, सब जीव बने भवसागर वासी ॥ ९ ॥
नहिं चेत रहा दुख देत महा, हरि हेत कहा दुर्बुद्धि बड़ी है । पिय आगु खड़े नहिं चीन्हि पड़े, दग सन्मुख कन्धकी सन्ध पडी है ॥ तजि राम हरामके काम लगे, चुहडी फुहडी जब आन अडी है । सुमती हरिगै कुमती भरिगै, यम सेल हिये बिच ठेलि गडी है ॥ १० ॥
मन रौन जो भौनते गौन कियो, तमसी तमसी तमसी तम ठोने । अति प्राण अधार अधार बिना, विलपात अधीर धराधर कोने ॥ यहि बैरिन पैरिन संग लिये, पहुँची विरहा विष बेलको पोने । सुख साच बिहाय अकाज भयो, नियरानि सुभाग सुभागि निधोने ॥ ११ ॥
(८०)
कबीरपंथी—
उह डोलत संग पिछार सखे, ढिल अंग लखी गठरी गहि भाजी । डुशियार हो संत सुजान सुनो, पलही भरमें वह मारत बाजी ॥ गठि कण्ठ लिये फँसरी करमें, सिद्ध साधुनके गल डारत पाजी । सत धर्म नशाय खँसाय लियो, तब नेक डुबावनको सज साजी १२
जबलों तन प्यार न प्यार पिया, तन आस तजे पिय खास सही है । नहिं मैं तब तू जब मैं नहिं तू, रह एक विवेककी टेक सही है ॥ जहाँ राम न दूसर काम तहाँ, रवि रैन यकत्र न होत कही है । जब प्रीति गही तहिये गहिरी, कुल कानि कहाँ सुलतान वही है ॥ १३ ॥
जिमि चुम्बक लोहसे मोह करे, जलहीन भई जस मीन दुखारी । अलि अम्बुज प्रीति न बीति कभी, पपिहा लपिहा सुख स्वातिकी बारी । जिमि चन्द चकोर यकोर लखे, सिख दीपक रंग पतंग निहारी । यहि राह न नाहसे नेह लगी, नहिं आशिक है वह फाँसिक यारी ॥ १४ ॥
दगपूरति नींद हराम भई, धनि लेत उसासहि बारहिं बारा । तन पीत भयो कृश गात भयो तस बात भयो लघु भोजन धारा ॥ अधरा पट सूख तृषा हियमें, नहिं जो पिय रूप पियूष निहारा ॥ गुन गान सदा हिय ध्यान धरे, बिरहिनके यह दश चिह्न उचारा १५
पथ देव अकाश नहीं जन है, असमान लियो निज पाग उतारी । पसराय दियो सगरे दुगरे, गुरु खाट निहारत पांव दे डारी ॥ बिखराय सबै मणि माणिकको, विरती बलि बैठि यती व्रत धारी । दिन भूषण ध्यान धरे सुनिहा, दुख दूखन पूषन पेखन टारी ॥ १६ ॥
कहुँ चोर चकोर रु चन्द बधू, विगसात अनन्द उलूक लही है । कहुँ बादुर बीर बहादुर भय, दुख दायक जंतु अनंत मही
शब्दावली
(८१)
है ॥ कहुँ जोत खद्योत उद्योत भई, मनमें अपने अभिमान गही है । निसि डाट कहे मम तेज लखो, रविते हमरो कछु घाट नहीं है ॥ १७ ॥
सखि काह करो पिय दूरि गये, हिय पूरि गये विरहानल कैसे । मन भावन जासु विदेश गये, धूक जीवन है तिनको जग तैसे ॥ प्रभु वेगि कृपाकरिके सुधि लो, तुम दीनदयाल कहावत जैसे । पतिया पहुँचाव बसीट मेरी, अरु बाँचि गुनावहु पिया ढिग ऐसे ॥ १८ ॥
विनय पत्रिका ।
दनुजा मनुजा महाराज महा, सुर संत सती सिरताज कहाओ । जन दीनबन्धु हो सिन्धु दया, हृदय थलको मलको श्रुति गाओ ॥ सब मूल सोई नहि तूल (तुल्य) कोई, गुण-सागर नागर कौन थाहाओ । हमरी करनी सुधि ना करनी, दुःख द्रन्द विदार दिदार दिखाओ ॥ १९ ॥
सुरती इतो प्रति ॥
मम पायक शोक सहायक तू, सुरती कुरती पिय पाहँ पधारो । करजोरिके पा गाहियो प्रभु को, कहियो तेहि कोटि प्रणाम हमारो । जब कंत दुरंत संदेश सुनो, निज प्राण निछावर ताछन कारो । इमि ले अर्जी कर दूति चली, वरजी विरहा वर ध्यान को धारो ॥ २० ॥
पिछलो रातका विरह । दोहा-
यहि निश्चय के नखत गण, अपने अपने ढंग । भय भ्रम हटै न दुख मिटै, होय न तिमिर विभंग ॥ १ ॥ करुणामय करुणु निरखि, हरखि चितोनन ओर । सुखपावे मुख देखि हरि, होय विरह निसि भोर ॥ २ ॥ आवन आवन कहिगये, अजहुँ न आये लाल । धावन फिरा न पिउ फिरे, भामिनि हाल विहाल ॥ ३ ॥
(८२)
कवीरपंथी—
सर्वथा—
हग मानसरोवर नन्दननिमै विवि मीन फिरे कहि कारनते । जबते रतिनाथ विछोह भयो, मनके विरहानल जारनते ॥ प्रभु दीन दयाल दया करिये, विन्ती सुनि लाख हजारनते । कहूणाधर धार हिये करुण, पति या पतिपाह सकारनते ॥ १ ॥ उनमाद उचाट भये मनमाँ, उदवेग न चाट सिंगारनते । नित लेत उसांस है आस लगी; तन छीन भयो मन मारनते ॥ गुण गान प्रलाप कलापनते, तन तापत ताहि विचारनते । पलना विसरे ललना सुरती, मूरति हरि हीय सँभारन ते ॥ २ ॥
जग जान जहान उधारन हो, कलि कायर कूर उधारन ते ॥ गनिका मनिका कह फेरत है, मोहिं सों कपटी भव तारनते ॥ प्रभु नाम जहाज तरी लदके, छनमें जगती जिव भारनते । न मिले पिय नेह कवीर विना, विधि मीन फिरे यहि कारनते ॥ ३ ॥
सोरठा ।
निशिदिन साले घाव, नींद मोहिं आवे नहीं । पीय मिलनकी चाव, सो नैहर भावै नहीं ॥ १ ॥
तबैया ।
उर सालत घाव दिना रतिया, धरके छतिया नहिं चैन लई है ॥ सुख भूरि भरा तृण तोरि धगा, भल भोग सबै दुख रोग गई है ॥ पिय आजइ काल कहे परसों, बरसों बरसों नहिं भेट भई है । मन मोहन मोहन मोह दर्द, विन दर्द दर्द दिन सदै दर्द है ॥ ४ ॥
जिनके चित चिन्त खचिन्त भयो, उर अन्तर ज्वाल निरं- तर जारी । तन टट्ट रहे मन भट्ट दहै नित सोचन पोखन खोचन भारी ॥ तिय साधु मती निमती विधिको, झुखै पुखै किमि आस हमारी । यहि औसर चौसर खेल्हुँगी, तनहु मनहु धन दावपै धारी ॥ ५ ॥
शब्दावली
(८३)
हरि नेरे अहों कियौ दूर कहूँ, भरि पूर हजूर हो नेनन मेरे । हिय ठाहर हो कियौ बाहर हो; धरती अस्मान तुही तुहि टेरे ॥ गलि गोरिनने तरुतोरिनमें जड़ साखन फूलन पातन हेरे । मोहिं समाय लखाय नहीं, कहु कौन उपाय गहौ पद तेरे ॥ ६ ॥
हमसूं कियो भिन्न कियो यक है, तू सुहिमें कियो मैं तुहि मांही । सब पूरन देखत तूहि तुही, किछु एक अहो धो अनेकन आही ॥ कियो स्वर्ग बसौ अपवर्ग कियो, निसिवासर वास कियो मोहिं पाही ॥ पिय आपै आप जो व्याप सही, किहि कारन तेहु विधा दरसाही ॥ ७ ॥
कहूँ गोय रहे विष बोय रहे, नित मो मन मन्दिर माहि विहारी । विनु लालन बाल विहालपरी, वह कौन घरी जो हरी पग धारी ॥ सुखको नहीं लेश कलेश भयो कर, काह पिया परदेश पधारी । सपने अपने हरि भेट भई, सुँह खोल लखे हग लोल लबारी ॥ ८ ॥
कबहूँ न पिया अपमान किया, किमि कै विधि बाम बिछोह करी है । लकुटी कर ले मोहिं मार कहूँ जनु, कांटकी मारहु फूल छरी है ॥ दुर दूरि कह्यो दबि दूरि दुरा, जब टेरे हरी तब पांय परी है । जिहि भांति से राखि रही त्योहि त्यो, कछु भोग धरी तिहिं पेट भरी है ॥ ९ ॥
कह वीर करो तन पीर परो, किमि धीर धरो नहिं प्रीतम आयो । दिन रात कराहि कराहि उठे, विरहा दव दाहि जो ताहि न पायो ॥ हिय हूक परी कह चूक परी, विधना सिधना मम काम पुरायो । सुन हेरि भटू अब ठाट टटू, मति धूसर दूसर वेष बनायो ॥ १० ॥
सब भूषण भू छटकाय दियो, सतसङ्ग विभूतिले अङ्गन मेली ।
(८४)
कबीरपंथी—
शिर टोप दया है कोपीन हया, जपमाल कथा सतनामकी सेली ॥ करमण्डल कर्म गहे करमें, चलि खोज पिया परिवारहिं पेली । बनि योगिन वेष विरागिनसों, सुख दुःख सबै अपने तन झेली ११॥
हरिद्वार गया नहिं मेल भया, न बनारस माहिं बनारस पीना । मथुरा न अवध न द्वारदरी, ददरी बदरीवन मक्का मदीना । न प्रयाग न पुष्कर थान जिया, भलछान किया सो पिया है कहीना । सब अरसठ भर्मत भर्म भरी, कछु हाथ नरी निजनाथ न चीना १२॥
गिरिनारन पैठि पहारनपै, ऋषिराय अखारन जायके जोही । सुनसान परो चवगान थरो, दुख दून करो तिहिं जूनमें ओही । केहि पूछों अबै लखि छूछौ सबै, कोय पीय बतावहु बाट बटोही । सब खोज थकी पिय प्रेम छकी टरी, काहू जो नाट मिले अब मोही १३॥
तब पैठि गुहा हरि ध्यान गहा, दम संयम नेम तपोधन भारी ॥ जप योग अचार विचार घने, हठ योग ठने हट लावहिं तारी ॥ नभ जायके देखत ज्योति जगे, छबि छाई है मोतिनकी लर झारी ॥ तनको किसिकें मनको वसिकें, षट चक्रको बेध चढी है अटारी ॥ १४॥
चढ जाइ अटा गढ छाया छटा, नहिं चित्त उठा निजहित्त न हेरो । जब और न दौर रही कतहुँ, मतहु पतहु गतहु गतगेरो ॥ परि पाप विनय सतभाय करो, शरणागत माँगत हौं प्रभु तेरो । अब आन उपाय उपाय कहा, नहिं पायहिं पाय थका इहि मेरो ॥ १५ ॥
हाहरि पान शरीरमें बेधत, सीर समीरहु तीर सो लागे । हे हरि ! चन्द्र समी शर मारत, मानहु आगि लुकारन दागे ॥ हे हरि धन्य सुभाव सुभागिन, सोच रही बिरही नित जागे । हे हरि सो सुखसे किमि सोवत, दुःख सोहागिन जो पति त्यागे ॥ १६ ॥
हे हरि आजु कन्हार्ई नहीं ग्रह, श्रीषम ताप सो लाग जु न्हाये ॥ हे हरि ई निसि नागिन डंसत, पीव विना जीव कौन बनाये । हे हरि
शब्दावली ।
(८५)
नैन तृषा जल पूरित, सिन्धु स्वरूप बिना न अद्याये । हे हरि पातहुको खरका सुनि, जानि परे हमरो हरि आये ॥ १७ ॥
विलपात बिते दिन रात सबै, ढिलगात अनेक जो आँख झपाईं । कोइ स्वप्नमें द्वार पुकार कहै, सुनु बाल लला तब द्वारपै आईं ॥ जब आँखि उधारनको करके, करके शुभ अङ्क सगून लहाईं । हरषे दुख दोसरके विरहा, हरिके हरिके सुनि आगम पाईं ॥ १८ ॥
अब आवन आवन होय रहौ जिहि, बार विलम्ब मेरे घर ऐहैं । सुख सम्पति दम्पति देखतके, सुर नायकहु मनमाँह सिंहैं हैं ॥ हरि छूत विभूत भरी लभरी, कन धूलहु धूम न दूसर सैंहैं । तिहुँ लोक पलोक विलोकन सो, धन धान्यन धाम धन दुर पैहैं ॥ १९ ॥
अजहुँ नहि दूति संदेश दियो, मनै माहिँ अँदेश यही खटको । इतने महुँ धावन आई गयो, अब साज सिंगार सबै ठटको ॥ कछुवारमें आनि पहुँच पिया, धनि और नहीं मनमें भटको । सुनिके पिय आगम मोद महा, मग जोह सँताप घटा घटको ॥ २० ॥
कवित्त-
नैन मनि प्रवाह, सरितावलि अगाह, सागर सरूप हरि मिलन ललकमें । ठहरे कौन कौन विधि, पाये विनवार निधि, मिलनि निहाल भई पलक पलकमें ॥ चरनामृत परचो आनि, सुख घन भरी ज्ञान, गुन छन बुन्दकी छलकमें । प्रीतम प्यारे पग लागि, पड़े भागजागि, पदरज सज निज आँखिन अलकमें ॥ १ ॥ इति ।
ध्वनि इमन (समय ८ बजे रात्रि.)
अब दुख दीनानाथ निवारो । तब पद तजि त्रिलोकमें दीसत, मोहि न और संहारो ॥ टे० ॥ थाह रहित अपार भववारिध, अगम अग्राध किनारो । मध्य धारमें नैया अटँकी, खेयके पार उतारो ॥ जहाँ २ परति विपंति सन्तनको, तहाँ २ आप सिधारो ॥
१ नाश करो. २ अवलम्ब. ३ अपार. ४ अङ्गई. ५ संकट. ६ पधारै.
(८६)
कवीरपंथी-
ऐसे कौन ? मोर पातक हैं, जो तुम पांव पसारो । यह नहिं नई रीति प्रभु जो एक, मोहिं अधमको तारो । युगन २ से अधम उधारन, विदित है नाम तुम्हारो ॥ धर्मदास विनवें करजोरी, तुम निज विरंद विचारो । मेरे अवगुन त्यागि दयानिधि, अपनी ओर निहारो ॥ ३२ ॥
देश ताल त्योरा । (समय १० बजे रात्रि)
मायामोहनी मनहरन । भोगिया सब पीसंडारे योगिया वशकरन ॥ टे० ॥ चञ्चल चाल् विशाल लोचन, सबैल शायंक धरन । कामबान बिलोकि मारचो, रूप नाना वरन ॥ भृकुटि भेंङ्ग प्रसङ्गै चहुँदिश, अनल लागी झरन । ज्वाल झाल कँरालमें, सब जीव लागे जरन ॥ सुर असुर नरें नाग किञ्चर, त्रसित लागे डरन । मंझें धार झंकोर 'बोरे' देत नाहीं तरन ॥ काम क्रोध कठोर तृष्णा, शोक सागर भरन । कहैं कवीर कोइ भागि बाचे, अभय सतगुरु शरण ॥ ३३ ॥
गुरुसम और कौन ? कृपाल । परखपद परखाय मेटचो, सकल भव भ्रम जाल ॥ टे० ॥ जरत जेहि वश सुर असुर सब, प्रबल माया ज्वाल । वरषि अमृत ज्ञानघन प्रभु, शमन कीन्ही झाल ॥ द्रोह मोह अपार तृष्णा, धार अति विकराल । बहत जीवन पार कीन्हो, मेटि सब जंजाल ॥ दलन दल दारुण दुसह दुख, दीनबन्धु दयाल । चरण रज अज गुरुडध्वजहर, तिलक कीन्हो भाल ॥ ध्यान सुन्दर मृदुल मुदमय, अघहरण ततकाल । भवसमुद्र कवीर तारण, गुरु सेतु विशाल ॥ ३४ ॥
१ पारकरो, २ प्रार्थना करते हूँ, ३ कीरती, ४ अपराध, ५ देखो, ६ चूर्ण किया, ७ गति, ८ नेत्र ९ बलवान्, १० वान, ११ प्रकार, १२ प्रहार, १३ प्रभाव, १४ वर्षा होता, १५ भयंकर, १६ राक्षस १७ बल्ल भन्ष्य, १८ एक प्रकारके देवता, १९ बीच, २० हिलोरा देकर, २१ डुबोवे.
शब्दावली ।
( ८७ )
गौडमिथ्रत देश ।
मोरि मान कही मूरख गँवार । है मनुष जन्म नहिं बारबार ॥ तजु काम कोध तृष्णा अपार । भजु निर्विकार सतनामसार ॥ १० ॥
( १ ) अपारे संसारे कथमपि समसाद्य नृभवम् । न धर्म यः कुर्याद्विषयसुखतृष्णातरलितः ॥ व्रजन् पारावारे प्रवरमपहाय प्रवहणम् । स सुरुयो मूर्खाणामुपलमुपलब्धुं प्रयतते ॥ १ ॥ रे ! मूढ तोहि नहिं तनक लाज । गहे विषय उपल तजि गुरु जहाज ॥ तेहिपर चढि उतरन चहत पार । भजुनिर्वि० ( २ ) आयुर्वर्षशतं नृणां परिमितं रात्रौ तदर्थं गतं ।
तस्यार्धस्य पस्स्य चार्धमपरं बालत्ववृद्धत्वयोः ॥ शेषं व्या- धिवियोगदुःखसहितं सेवादिभिनीयते । जीवे वारितरङ्गचञ्चल- तरे सौरुयंकृतः प्राणिनाम् ॥ २ ॥ दुखरूप सकल यह है प्रपंच । नहिं तीन काल सुख जानु रञ्ज ॥ ताते तजु यह सब लखि असार । भजुनिर्विकार सतनामसार ॥ ( ३ ) आदित्यस्य गता- गतैरहरहः संक्षीयते जीवतं व्यापारैर्बहुकार्यभारगुरुभिः कालो न विज्ञायते । दृष्ट्वा जन्मजराविपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्पद्यते पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिर्गं उन्मत्तभूतं जगत् ॥ ३ ॥ वरणाश्रमको अभिमान धार । नहिं करत आतमाको विचार ॥ यह मूल
१ विणु ( १ ) अर्थ-अपार संसार में किसी प्रकार से मनुष्यजन्मको पाकर, जो पुरुष धर्म नहीं करता और विषयसुखकी इच्छामें तत्पर है, वह पुरुष जैसे समुद्रके पार (किनारेपर) जानेवाले श्रेष्ठ नावको त्याग कर पत्थरको पकड़ने का प्रयत्न करता है तो महा मुर्ख है ॥
( २ ) अर्थ-प्रथम तो मनुष्यकी आयुष्काली प्रमाण सौ वर्षका है, सो-तिसमेंसे आधे पचास वर्ष रात्रिके सोनेमें व्यतीत होते हैं। अब शेष जो बचे पचास वर्ष, तिसके आधे पचीस वर्ष रहे, जिसमेंसे कुछ तो प्रथम बालपनके अज्ञानमें और कुछ पीछे वृद्धावस्थामें बीत जाते हैं, अब बाकी रहे पचीस वर्ष, तिसमें व्याधि वियोग, दुःख, पराई सेवामें लग जाते हैं, बस ! यह व्यवस्था तो यदि सौ वर्षका जीवन हो तिसको है किन्तु मनुष्यका जीवन तो केवल जलतरंगवत् अनियमित है, अब कहिये प्राणियोंको सुख कहाँ ? ॥
( ३ ) अर्थ-सूर्यके उदय अस्त होनेसे आयुष्य दिन प्रति दिन घटती जाती है, तथा अनेक बड़े र व्यापार समुदायके कार्यमें लगे रहनेसे, यह भी नहीं ज्ञात होता कि मेरे आयुष्यका कितना काल व्यतीत हो गया है और जन्म, वृद्धत्व, विपत्ति और मरणको भी देखकर नहीं डरता इससे यह निश्चय है कि, संसारमोहरूपी प्रमाद मंदिराको पीकर बासना हो रहा है ॥
(८८)
कवीरपंथो-
अविद्याको विकार । भजुनिर्विकार ॥ (४) स्नातं तेन समस्त- तीर्थसलिले दत्तापि सर्वावनिर्णयज्ञानाश्च कृतं सहस्रमखिलाः देवाश्च संपूजिताः ॥ संसाराश्च समुद्धृताः स्वपितरस्त्रैलोक्यपूज्योप्यसौ । यस्य ब्रह्मविचारणे क्षणमपि स्थैर्यं मनः प्राप्नुयात् ॥ ४ ॥ यह लोकलाज मर्याद फन्द । करि कर्म धर्म सब हो स्वछन्द ॥ एक नित्य अनित्यको करुविचार । भजुनिर्वि० (५) यावत् स्व- स्थमिदं शरीरमरुजं यावज्जरा दूरतो । यावच्चन्द्रियशक्तिप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः ॥ आत्मश्रेयसि तावदेव महतां कार्यः प्रयत्नो महान् ॥ संदीप्ति भवने तु कूपखनन प्रत्युद्यमस्तादृशः ॥ ५ ॥ जिमि रङ्ग पतङ्गको नाशमान । त्यों यौवनको मद झूठ जान ॥ नहि बिगरत लागत तनक वार । भजुनिर्वि० (६) वृक्षं क्षीण- फलं त्यजन्ति विहगाः शुष्कं सरः सारसाः । निर्द्वयं पुरुषं त्य- जन्ति गणिका भ्रष्टं नृपं मंत्रिणः ॥ पुरुषं पर्युपितं त्यजन्ति मधुपा दग्धं वनान्तं मृगाः । सर्वे कार्यवशाज्जनोऽभिरमते कस्यास्ति को वल्लभः ॥ सुत मात पिता तिरिया अनूप । अति होत सुखी लखि मूढ भूप ॥ ये स्वारथके हैं दिना चार । भजु निर्वि० ॥ (७) विदलयति कुबोधं बोधयत्यागमार्थम् । सुगतिकुगति- मार्गौ पुण्यपापं व्यनक्ति । अवगमयति कृत्याकृत्यभेदं गुरुयो ।
(४) अर्थ-जिसका मन क्षणमात्रमें आत्मविचारमें स्थिरताको प्राप्त हुआ है, उसने मानों संपूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर लिया, समस्त पृथ्वीका वान कर चुका, अनेक यज्ञकर चुका, तथा सर्वदेवन(ओंका पूजन कर चुका, अपने माता पिताओंको संसारसे उद्धार कर चुका और बहो त्रैलोक्यके पुजने योग्य हैं ॥
(५) अर्थ-जबतक यह शरीर पुष्ट और आरोग्य है, तथा वृद्धावस्था दूर है और इन्द्रियोंकी शक्ति न्यून नहीं हुई, तथा जबतक आयुष्य क्षीण नहीं हुआ तबतक बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि अपने कल्याणका यत्न अच्छी-तरह कर ले, नहीं तो जब घर चलने लगे तब कूप खोदनेके उद्योगसे क्या होता है ? ॥
(६) अर्थ-वृक्षको फलहीन होनेसे पक्षी त्याग देते हैं, सरोवर सूख जानेसे सारस, निर्द्वय पुरुषको बंश्या क्षष्ट राजाको मंत्री, फूल झड जानेपर भ्रमर और बनको भस्म हो जानेसे मृग त्याग देते हैं, अतएव क्षव प्राणी अपने २ स्वार्थके कारणसे पास आते हैं, नहीं तो कौन किसका मित्र है ? ॥
(७) अर्थ-जो अज्ञानका नाश करि शास्त्रके अर्थका ज्ञान करता है सद्-असद् मार्ग तथा पुण्य पापको
शब्दावली
(८९)
भवजलनिधिपोतस्तं विना नास्ति कश्चित् ॥
सतगुरु कवीर गुणगण गँभीर । दुखहरण हेतु धारचो शरीर अति धीर वीर मति गति उदार । भजु निर्विकार सतनाम सार ॥ ७ ॥
सौरठ-सवय १२ बजे रात्रि
बनंढो भलो रिझोंयोरी । मोरि सुरैति सोहांगिन नवलें बनी, साँहिब वर पायोरी । टे० ॥ लख चौरासी भटकत २ यह दिन आयोरी । ऐसो अवसर पाय गँमायो, तिन पछितायोरी ॥ ज्ञान को मंडप छाय युक्तिसे, श्रद्धा कलश भरायोरी । सार शब्द अनबेधे मोतियन, चौक पुरायोरी ॥ सत्यनामको मोर बँधायो, पडेलो प्रेम लगायोरी । पांचपचीस सहेली हिलमिल, मङ्गल गायोरी ॥ सतगुरुसे हँथलेवो जोडचो, भक्तिकी भाँवर खायोरी । सुर तैतिस बराती, ब्रह्मा वेद सुनायोरी ॥ भवसागरको फेरो मेटचो; परनिर्पाति घर लायोरी ॥ प्रेमसहित एकचित हो, दुविधा दूरि बहायोरी । सत्यलोकमें अद्भुत मन्दिर, तामें पलंग बिछायोरी । धर्मिनको सतगुरु कवीर मिलि; तपन बुझायोरी ३६॥
ननदी ! जावोरी महलमें, आपनो विरन जगाव ॥ टेक० ॥ बिरन जगायो ना जगे, करौ मैं कौन ? उपाव । घट औधियारो हो रह्यो, लागि सकत नहि दाव ॥ भरमके तालेमें सखी कुञ्जी सुमति लगाव । कपट किवीरैया खोलिकै, ज्ञानको दियैना जराव । ततको तेल लगायकै, तृष्णा केश गुथाव । भूषण पहिरि विवे- कके, निज शृङ्गार बनाव ॥ शीलके रँग रँगवायकै, अँगियाँ अङ्क
बताता है, करने योग्य कर्म और नहीं करने योग्य बर्त्मको सम्झाता है सो गुह है तिस गुह बिना संसार सागरसे पार करनेवाली कोई दूसरी नवका नहीं है।
१ त्रुहा. २ बरा किया. ३ सुन्दर प्रीति. ४ सघवा. ५ सुन्दर बुलहन. ६ प्रभु.
१ विवाहके समय जो वस्त्र लाडी (बुलहन) को उड़ाया जाता है २ सखी ३ पाणि ग्रहण ४ फेरा.
५ विवाह करके. ६ माईको । ७ कुँची, ८ फिवाठ. ९ दीपक, दीवा. १० बोली.
(९०)
कवीरपंथी—
कसाव । भक्ति चुनरिया ओढ़िकै यहि विध पियको रिझाव ॥ हृदय महलबिच सुन्दरी, प्रीतिको पल्लंग बिछाव । श्रद्धा सेज सँवारिकै, प्रियतमको बैठाव ॥ विनय बीजना हाथलै, सनमुख पियके ढुराव । एकचित होय अभिमान तजि, चरणन शीश नवाव ॥ भलो बन्यो संयोग है, अवसर मती गँवाव । कहै कवीर कमालसे उठि मेरे ढिगँ आव ॥
बिहाग । (समय २ बजे रात्रि)
देखो डुरमति यह संसारकी । हरिसो हीरा त्यागि हाथसे, बांधत मोट विकारकी ॥ टे० ॥ कोइ खेती कोइ बनिज करत है, कहूँ हौसँ हथियारकी । बहु धन्धेमँ जन्म गमायो, सुधि बिसारि करतारकी । देवी देव आराधत डोलै, सुनि २ विप्र लबारकी । निज आतमको चीन्हत नाही, फूटी आँखि गँवारकी ॥ चलत कुमारग लाज न आवे, कहँ गयि बुद्धि विचारकी । अपने करसे निज गल फांसी, डारत मायाजारकी ॥ वारम्बार पुकार कहत हों, मोहिँ सौ शिरजनहारकी कहै कवीर यह विनश जायगी, क्षणमँ काया क्षारकी ॥ ३ ॥
कालिगढ़ा । (समय ४ बजे रात्रि)
सन्तकी मंहिमा अपरम्पार । सन्त और भगैवन्तमें अन्तैर, तनिक न देखु विचार ॥ टे० ॥ वेद पुराण भागवत गीता, कहत सकल निरधारै । सन्तसमान और कोइ नाही, अधम उधारन- हार ॥ सन्तसमाँगम सम कोइ तीरथ, और नहीं संसार । मज्जन करत जन्मके पातक, कटत न लगै वार ॥ काम कोध मद मोह द्रोह तजि, गुरुपदके आधारै । रहत सदा सन्तोष धारि उर, परखिकै सार असार । महामलीन हीन मति पामर, अघ अव-
१ पंखा. २ पास. निकट. ३ प्रपंचकी गठरी. ४ उत्साह. ५ स्मृति. ६ मूठा. ७ परमात्मा. ८ घूल, मूतका. ९ माहात्म्य. १० अपार. ११ परमात्मा. १२ बीच. १३ निश्चय. १४ सतसंग. १५ स्नान. १६ आश्रय.
शब्दावली ।
(११)
गुन आगाँर। होत प्रवीन नीतियुत तिनके, सुनि उपदेश उदार ॥ जाघर सन्त दया करि जनि पर, आवत लेन अहार। ताघर दुख दारिद्र नाश होय, भरत अटँलभण्डार ॥ जो नहिँ होते सन्त जगत्में, को अस करि उपकार ॥ हूवत आय करत जीव- नको, भवसागरके पार ॥ कहि न सकत कवि कोविंद कोऊ, सन्तनको व्यवहार। निशि वासर गुण गावत मान्यो, शेष सहस मुखहार ॥ रवि नहिँ होत मँलीन दुष्टके, लाय उड़ाये छार। कहैं कवीर सन्तकी निन्दा, करै ताहि धिक्कार ॥ ३९ ॥
जपु मन सत्य नाम सुखदाई। जो तूं चाहे आय जगत्में अपनी सूठ भलाई ॥ ८० ॥ गर्भवासमें भक्ति कबूल्यो, सो सब सुधि विसराई। आय परचो मायाके फन्दे, मोह जाल अरुझाई। मानुषिता सुत भाइ बन्धु तिय, बहिन भुवा भौजाई। अपने २ स्वारथ कारण प्रीति करत सब आई ॥ भवसागरमें भटकत २, यह मानुष तन पाई। खोवे बूथा भक्ति बिन प्रभुकी, धिक ऐसी चतुराई ॥ कहैं कवीर चेतु अबहूँ नहिं, फिरि चौरासी जाई। पाय जन्म शूकर कूकरको भोगेगा दुख भाई ॥ ४० ॥
प्रभातो (समय-प्रातः-काल)
(श्री १०८ युवत महंत शम्भूदास साहेब विरचित)
जयति जय धर्मधुर धीर कव्वीरगुरु, जयति जय वीर वर ब्रह्मचारी। दहनर्वनमोह गुणगहेन भूषितं विभो, भक्त भवैशूल निमूँलैकारी ॥ ८० ॥ अच्युतानन्द सुदकैन्द स्वच्छेद दलिं, दोषदुखद्वैन्द लीलाऽवतारी। कम्बुकैर्पूर मदचैर अतिधवलैवपु,
१ घर. २ अक्षय कोठार. ३ पण्डित. ४ मँला. ५ धर्मके चलानेवाले. ६ धैर्यवान्. ७ अष्टबलवान्. ८ मोहरूपी बनको भस्स करानेवाले. ९ अनन्त गुण. १० शोषित. ११ प्रभु. १२ भक्तोंका जन्मरणादिक दुःख १३ नाशकर्ता. १४ अखण्डसुख. १५ आनन्दमूल १६ बन्धनरहित. १७ नाश करके. १८ उत्पात. १९ कौतुके प्रगट भये. २० शंख और कपूर. २१ निरादर करके २२ परम शुद्धरूप.
(१२)
कवीरपथी—
सकलेंसुखगेह नरदेहधोरी ॥ अभितंसौन्दर्य सुखधाम अभिराम अति कोटिशतकामंगर्वापहारी । तरुणकंझारुणं हरण, शोभा- चरण, दीनविश्राम परमोपकारी ॥ सत्यपदपुष्ट दलि दुष्ट दुर्वा- संना सदा संतुष्ट सन्तोषधारी । अंमल अनेवद्य अय्येत्क अवि- चलें अजितें अनेघ अद्वैत अजें निर्विकारी ॥ जगद्विरुंयात तव चरित सुंरसरितसम पतितंपावन परमंपापहारी । साधुजन वृन्दं अरविन्द दिनकैरनिकर, उदय जय जयति सर्वैरुंचारी ॥ येन चरणामृतं पाँनकृत सर्वदा तस्य परिचारिका मुक्तिकारी । सर्वसत्रांस नाशक धर्मदास प्रभो, राजराजेन्द्र पारख विहारी ॥
जयति जय कञ्चपण्ज परीक्षक प्रभो, प्रौढगूढार्थविद वेदासां- रम् । भक्तवत्सल दयासिन्धु करुणायतन, राजराजेन्द्र लीलाऽ- वतारम् । पतिततारणतरण दीन अशौरण शरण, मोदें मङ्गल- करण अतिउदारम् । क्षमा वैराग्य सन्तोष समता दया, आदि- युत शील धीरज विचारम् ॥ परम कल्योणमय ध्यान निर्वाण- प्रद, रहित अनुमान मायाविकारम् । विगतें अज्ञान प्रज्ञान विज्ञान घन, मोह मद मान कौनन कुठोरम् ॥ लोभवन दह्नन अति- प्रबलदावानलं कामक्रोधादि केरवतुषारम् । मर्वतोभेद्वर प्रखेर
१ संपूर्ण सुखके स्थान. २ मनुष्यशरीर धारण किये. ३ अपार सुखरता. ४ अति रमणीय. ५ अनेक कामदेवके बानको नाश करनेवाले. ६ नवीन लाल कमल. ७ दुःखी जीवोंके आरामका स्थान. ८ अत्यंत उपकारी. ९ त्रिकालबाध्य पदपूर्ण प्राप्त. १० दुःखाशा. ११ स्वच्छ. १२ अजिज. १३ गृह. १४ स्थिररूप. १५ नहीं जीतने योग्य. १६ पापरहित. १७ एक. १८ जन्मरहित. १९ दुःखमुखावि शिकाररहित. २० संसारप्रसिद्ध. २१ आपके गंगाक्षमानचरित्र. २२ पापियोंको चबित करनेवाले. २३ महान् पातक करने वाले. २४ समूह. २५ कमल. २६ सूर्यपुंज. २७ पान किया. २८ उसकी वासी. २९ सालीक्य सामीप्य और सायुज्य. ३० दुःख. ३१ स्वामी. ३२ सार्वभौम प्रभु. ३३ कमलपत्रसे उत्पन्न. ३४ पारखी. ३५ मूर्गारुप्यतात. ३६ ज्ञानके सार परमात्म. ३७ शक्तोंको रक्षा करनेवाले ३८ दयासागर ३९ कृपास्वरूप. ४० पापियोंको पार उतारनेकी नौका. ४१ तरणरहित. ४२ आनंद. ४३ कल्याण. ४४ अत्यंत बानी. ४५ मंडलरूप. ४६ आकार. ४७ मोक्षदायक. ४८ प्रपंच. ४९ अज्ञान रहित ५० उत्कृष्टबोध सहित विशेष विज्ञानस्वरूप. ५१ वन, जंगल. ५२ कुल्हाडी. ५३ अत्यन्त बलवान् बावामिन. ५४ रानविकाशी कमल. ५५ हिम्न. ५६ बड़ा भवन. ५७ तेज.
शब्दावली ।
(९३)
दिनकरनिकर; उदय हरणांय जगदन्धकारम् । यस्यं प्रत्यक्षित योग जप यजंन मुनि, यत्न कुर्वन्ति नानाप्रकारम् । तस्य विग्रह विदितं साधुगुरुरूपधृतं; अखिल अघओर्वेहृत निर्विकारम् ॥ विविधैगुण गणैत श्रुति शारैदा शेष, निशिदिवसै यदि तदपि नहि लहत पारंम् । नो'मि कव्वीरगुरु नोमि कव्वीरगुरु, वदंति धर्मदास ईति वारवारम् ॥ २ ॥
जयति गुरुज्ञान रक्षक परीक्षक प्रभो, छेन्नचूर्णार्थ पूर्णाऽव- तारम् । अखिल पाखण्डगर्वघ्र बीजकैतिकल, निर्मितं हरण जगदन्धकारम् ॥ टे० ॥ शुद्धं सर्वेश सर्वज्ञ सेवक सुखैद, सर्वदा शौन्त सन्तोषधारी । नित्यं निर्वाणं निर्मोह मत्सररहित, निर्भ- रानन्द स्वच्छेदचारी ॥ दोष दुर्वासना मान दम्भापहर्न, धर्म व्रतं शीलरतं निर्विकारी । ब्रह्मगुरुं जीवमायोकि परस्वैमर्तगति भ्रमित सिद्धान्त सुखचाँरुचारी ॥ विगत मैल आवरणं सहित अव्यग्रचित, अभितमोयादितत्वात्मज्ञानी । परम पांवन प्रवैर मोदप्रैद यस्य पद, परस्व प्रत्यक्ष निज राजधानी ॥ जीव निज- कर्मवश भ्रमत भवचैक अति, सहत दुख दुसहैदारुण अनेकम् ॥
१ हरण करनेके लिये. २ जिसके. ३ दर्शके लिये. ४ यज्ञ. ५ उपाय करते हैं. ६ बहुत प्रकारके ७ उसकी. ८ मूर्ति. ९ प्रसिद्ध १० धारण की हुई. ११ पापसमूहके नाशक. १२ अनेक प्रकारके गुण १३ गणना करते हैं. १४ वेद. १५ सरस्वती १६ तन्त्रिदिन. १७ तीमो १८ पूर्णताको प्राप्त होना. १९ नमस्कार करता हैं. २० कहते हैं. २१ हठप्रकारसे २२ सहायक. २३ कपट, जाल. २४ नास्तिकोंका माननाशक. २५ बीजककी टीका. २६ रचा, बनाया २७ निर्विकार सर्वके प्रभु. २८ संपूर्ण जाननेवाले. २९ आनन्ददायक ३० सदकाल. ३१ सुखी. ३२ आनन्द धारण किये. ३३ अखण्ड. ३४ मोक्ष रूप. ३५ अभिमान रहित. ३६ अतिशुखरूप. ३७ स्वच्छाते विचरनेवाले. ३८ पाखण्डनाशक ३९ नियम, ४० सचरित्रधारी. ४१ ब्रह्मसुख गुरुमुख जीवमुख और मायामुख. ४२ निज और अन्यका. ४३ ज्ञान. ४४ कहा हुआ निर्णय. ४५ सुन्दर बहुमूल्य. ४६ पाप. ४७ अज्ञान. ४८ शांतचित्त. ५१ अनेक प्रकारके भायादि तत्त्व (जड़ पदार्थ) और चेतनके ज्ञाता ५० अत्यन्त पवित्र. ५१ उत्कृष्ट ५२ सुबदायक. ५३ दृष्टिगोचर ५४ चौरासी. ५५ कठिन असह्य.
(१४)
कवीरपंथी—
व्याथां अवलोकि करुणांअयन ज्ञानघन, वदति बाधाशंमन यत्नंमेकम् ॥ हेतु कैवल्यंप्रद साधुगुरु २, श्रद्धया मूढ भर्जु वार- वारम् । निखिलं निर्णीतं सिद्धान्तमिति निश्चितं, नीरनिधि निगमनिर्मथितसंसारम् ॥ आदिमध्यान्त नहि दुःख त्रेकालं इति वदति वेदान्तंविद् ब्रह्मवादी । सकल तंत्रार्थ उद्धृतंपरीक्षाकृतं, आत्मौनात्म सुख दुख अनौदी ॥ जनित अज्ञान त्रेतापदौवास- नलम् शमन गुरुबोधैवर मेधैमाला ॥ शोक सन्तापं भवदौप नाशकं कवच, विश्ववैरीश सेतुं विशाला ॥ सामवेदादिगो तीत यं गीयं ते, शम्भु अज अमल अर्द्धय अनुपमम् ॥ तज्जैगद्विदित सुरवृन्दं वन्दितंपदम्, वेष मङ्गल धृतं साधुरूपम् ॥ ३ ॥
जय धीर वीर कवीर, भवजैल पीरं भीरं विनाशनम् । सूरै- तीर मनुजशरीर धृत गमैभीर ज्ञान प्रकाशनम् ॥ टे० ॥ झाँई सन्धिं विकार करि, निरंवार भार विदारणम् । विविध विधि टकसार, गुरुमुख द्वार सार विचारणम् ॥ मारतैण्ड प्रचण्ड तर्म् पाखण्ड खण्डेन कारणम् योगदण्ड अखण्डताप, प्रताप पाप प्रहारणम् ॥ जय कल्पपादप पौर्ण सम भैट्टु चरण हरण भर्वाण- वम् प्रद मोद मङ्गल करण अशरण शरण दीन उधारणम् ॥ आनन्दकन्द स्वच्छन्द दलि, दुख द्रुद्ध फन्द निकेन्दनम् । इति
१ दुःख. २ देखकर. ३ दयाके स्थान. ४ दुःखनाशक. ५ उपाय. ६ मोक्षदायक कारण. ७ विश्वाससे ८ मज्जन कर. ९ सर्व. १० निर्णय किया हुआ. ११ शास्त्ररूप समुद्रको मंथनकर सार निकाला हुआ. १२ सूत, शब्द और वर्तमान. १३ अद्वैतवादी १४ सर्व सिद्धान्तसंमत. १५ जड चेतन. १६ आविर्भूत १७ अज्ञानसे उत्पन्न. १८ आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक ऐसे तीन प्रकारके दुःखरूप नावानि १९ गुरुका ज्ञान २० बादलोंको पारित. २१ दुःख २२ जन्म, मरण. २३ बखतर. २४ संसारसागर. २५ पुनः २६ अगोचर. २७ गान करते हैं. २८ एक. २९ उपमारहित. ३० संसारसे प्रसिद्ध. ३१ देव समूह ३२ वनतिबिम्ब. ३३ संसारसागर. ३४ दुःख. ३५ समूह. ३६ सरोवरके किनारे. ३७ अबाहू. ३८ प्रतिबिम्ब. ३९ माया ४० निर्णय करके. ४१ समूह ४२ नष्ट करना. ४३ यथाशास्त्र. ४४ सिद्धान्त. ४५ तन्त्र. ४६ सूर्य. ४७ तेजवान्. ४८ अन्धकार. ४९ तोडना. ५० हेतु. ५१ आसा. ५२ अवाधित तेज. ५३ प्रभाव. ५४ नाशकर्ता. ५५ कल्पवृक्ष. ५६ पत्र. ५७ कोमल. ५८ संसारसागर. ५९ निर्मूल.
शब्दावली
(१५)
अन्तरहित अनन्त सन्त महन्त तन गुण वन्दनम् ॥ धर्मदास जास विलास त्रास, कराँल जाल विभञ्जनम् । दलिहाँल दीन दयाल कीन्ह, निहाल सुनि मन रञ्जनम् ॥ ४ ॥
जय उग्रनाम अकाँम, मङ्गल धाम नित्य निर्गामयम् । भव श्रमित शुभविश्राम अति अभिराम पदप्रद निर्भयम् ॥ ५ ॥ मोह माया मान दम्भ मदादि मत्सर दूषणम् । रहित नानारोंग परम विरोंगसहित विभूषणम् ॥ साँनुरोध विरोध हरण, प्रबोधमय कारण परम् । विगत द्वन्द्व स्वच्छन्द, परमानन्दकन्द विनिर्भरम् ॥ कालशेषै खैगेश भवद्वैपदेश, भो ! कर्हणाकरम् । भव्यैवर वरदेश अखिल, अंशेष श्रेयै सुदाँवरम् ॥ भुक्तकञ्चदिनेशै ज्ञान धनेशै, कलेशजगद्भवम् ॥ शमन सकल अहेतु प्रभु, वृषैकेतु सेतुभवाणवम् शंभु यस्य पदाँरविन्द, पर्राग सञ्चितकैर्मजम् । व्याधिप्रबलभूत, अति अनुभूत पावन भैषजम् ॥ ६ ॥
भज सुखद परम प्रबोधैप्रद, प्रत्युह हरण कुपालके । पारिजातैकपर्णनवसम, चरण साहिबलालके ॥ ७ ॥ अरुण नखै बुति दिपैति, दिव्य दिगन्तै तमदलैमालके । ज्ञित विविध विकार कीन प्रहार भवभ्रम जालके ॥ मृदुलै मँजु पराग पावन, तिलक कृत निजैमालके । नशत सकल कुअकै विधिकैरलिखित कर्म कपौलके ॥ प्रगट मन्त्र प्रत्यक्ष शामक, दक्षै विष अहि
१ खेल. २ डर. ३ मयकर. ४ नष्टकर्ता. ५ दुःखनाशकारि ६ आनंदित करना. ७ कामनारहित ८ रोगरहित. ९ थके हुए. १० दोष. ११ अनेक प्रकारको शक्ति. १२ त्याग. १३ विशेष मूर्खत. १४ हठ करके. १५ अत्यंत. १६ सर्प. १७ गडपक्षी. १८ आपका उपदेश. १९ कृपालु. २० बल्लूकल. बरदायक प्रभु. २१ संपूर्ण. २२ कल्याण. २३ उत्तम सुखरूप. भक्त २४ कमल सूर्य २५ कुबेर. २६ महादेव. २७ चरणकमल. २८ धूलि. २९ पूर्वकृतकर्मजन्म. ३० अत्यन्त बहादुरा रोग. ३१ अनुभव की हुई ३२ पवित्र औषधी. ३३ ज्ञानदायक. ३४ विघ्न. ३५ कल्प वृक्षके नवीन पत्रसमान. ३६ काति. ३७ प्रकाशित. ३८ दिशाओंके अन्तपर्यंत. ३९ अन्धकार समूहमाता. ४० उत्पन्न हुआ. ४१ कोमल. ४२ सुन्दर. ४३ किये. ४४ अपने मस्तक. ४५ दुःखको रेखा. ४६ ब्रह्मदेवके हाथको लिखी. ४७ मस्तक. ४८ प्रतिद. ४९ योग्य. कुशल. ५० सर्प.
(१६)
कबीरपंथी-
कालके नहिं । अन्यं रक्षक पक्षं तजि पदलंक्ष दीनदयालके ॥ जेहि हेतु शंभु शुकादि निशदिन, ध्यान धरत त्रिकालके । सोई प्रवरपद परखाय मेटयो, शाल जगजंजालके ॥ ६ ॥
जय कवीर धीर वीर हरण पीपरे । देखि काम कोध आदि प्रबल रिपुं डरे ॥ टे० ॥ अति अपार भवविकार धारमें परे । हीनं दीनं छीनं जीव पार बहु करे । जासु वचन ज्ञानभानु लखि विकोशरे । उदय भोर जानि चोर मानमद टरे ॥ जागे शम दम विराग आदि योगरे । परम धरम जानि जाहि साधु आंदरे ॥ दीनबन्धु दयासिन्धु जासु नाम रे । मोदधाम विगत काम सन्त वदैंतरे ॥ धर्मदास जास त्रास काल विकल रे । ऐसो श्रीगुरु प्रताप मंगलैंाचरे ॥ ७ ॥
जय जय सतगुरु कवीर, सन्तन सुखकारी ॥ टे० ॥ कमल- पत्रपर अनूप, लीला करि धारि रूप, प्रगटे जग हँसभूप, अजर निर्विकारी ॥ मङ्गलमय सिद्धिसैदन, दिव्य शर्वरीशैं वदैंन, वारैं लखि कोटि मदन, बाल ब्रह्मचारी ॥ शोभित सुद्धा विशाल, शुभ्र सरल तिलक भाल, भूषित उर रत्नमाल, शीश मुकुटधारी ॥ गावत गुणसुर अशेष, नारद शारैंद गणेश, कमलासँन अरु महेशैं, दै दै कर तारी ॥ पारिजात तरुण परण, के समान अरुण चरण, शरण आय धर्मदास, तन मन धन वारी ॥ ८ ॥
जय जय साहिब कवीर, काशीपुरवासी ॥ टे० ॥ बूढत भवसिन्धु धार, भक्तन कीन्हौं पुकार कीजे सत गुरु उँवार, अखिल स्वप्रकाशी ॥ दुखित जीवलखि दयाल, सर्वेश्वर प्रभु
१ दूसरा रक्षा करनेवाला. २ सहा. ३ चरण कमल का ध्यान. ४ दुःख. ५ शत्रु ६ त्यागा हुआ. ७ दरिद्री. ८ दुर्बल. ९ प्रकाश. १० सत्कार किया. ११ कहते हैं. १२ कल्याण करे. १३ सिद्धिका स्थान. १४ चन्द्र. १५ मुख. १६ निछावर करना. १७ श्वेत. १८ सीधा. १९ सरस्वति. २० ब्रह्मा. २१ महादेव २२ बच्चा
शब्दावली ।
(१७)
कृपाल, दलन निखिल कालजाल, प्रगटे अविनाशी ॥ कुन्दु इन्दुके समान, विमल वपु प्रकाशमान, मंगलमय सुभगध्यान, तेजपुञ्जराशी ॥ लीला एक करी नाथ, गनिकांको पकरि हाथ, फिरे लिये साथसाथ, कीन्ही जगहाँसी ॥ माया मन धारि टेक, कीन्हों छल बल अनेक, हारी नहिं चलयो एक, कम्पित है त्रासी ॥ प्रवर पूज्य परमपितृ, दयासिन्धु दीनमित्र, पतितन कीन्हों पवित्र, परखपद प्रकाशी ॥ कुपथ कुटिल कर्म कोहै, दम्भदोष मान द्रोह, काम कोष लोभ मोह अखिल शत्रुनाशी ॥ जाप जपत नसत पाप, जामु नामके प्रताप, शरण सुखद हरण ताप, अमरपुरंनिवासी ॥ गावत गुण धरि विश्वास, नित्यंप्रति वसिष्ठ व्यास, धर्मनि तज सकल आस, चरणनकी दाँसी ॥९॥
मिथ्या मायाजाल जगत मन, क्यों तू देख भुलाया है ? ॥ टेक ॥ सुमनैं सुहावन सुन्दर फल लखि, सेमर सुवा लुभाया है । मारी चोंच रुई निकरी जब, तब मनमें पछताया है ॥ धूमसैमूह जानि घँन चाँत्रिक, तृषां विवश हो धाया है । मिटी न प्यास भयो दुख दारुण, नयनहीन अकुलैलाया है ॥ सुँत वनितौं इत्यादि सकल निज, स्वारथ प्रीति लगाया है । यह मन मूढ मूढैताके वश, मोहजाल उरझाया है । प्रबल अविद्यैके प्रताप शठ; फिरि चौरासी आया है । कहैं कवीर चेत नर अजहू, मानुष योनी पाया है ॥ १० ॥
१ नारायित. २ चन्द्रमा. ३ शरीर. ४ प्रकाशका समूह. ५ वेश्या. ६ पिता. ७ कुमार्ग. ८ देहा. ९ कल्पना. १० सत्यलोकके रहनेवाले. ११ चरित्र १२ श्रद्धा धारण करि १३ सदाकाल. १४ परिचारिका. १५ फूल. १६ धुआँका पुंज. १७ बादर. १८ पपीहा. १९ प्यास. २० बौडा. २१ मयंकर. २२ व्याकुल हुआ. २३ पुत्र. २४ स्त्री. २५ मूर्खता. २६ अज्ञान. २७ खानि.
कवीरपंथी-शब्दावली ४
(१८)
कबीरपंथी—
मानुषको तन पाय जन्म क्यों, मूरख वृथा गमाँवै है ॥८०॥ अति अमोल कंचनघटमें शंठ, हठ करि विष भरवावै है । पाय पियूष पखारन पद हित, मन्दमंती ढरकावै है ॥ ऐरावत गजराजपै मूरख, ईधनभार लदावै है । बहुश्रमकैरि लैहि चिन्तामणि तेहि फेंकिकै काग उडावै है ॥ आक रुईके हेत खेत कंचन के हर जोतवावै है ॥ कल्पंतहूको काट धतुरा, आँगन माहि लगावै है ॥ कहै कबीर सूढता कहाँलग कहैं, कही नहि जावै है । तजि गुरुज्ञान वारि सूरसरिता, मृगजलै प्यास बुझावै है ॥ ११ ॥
रागिनी औरबी समय सूर्योदय ।
अब मोहिं दरशन दीजे कबीर । तुम्हरे दरशसे पाप कटत हैं, निरंमल होत शरीर ॥ ८० ॥ त्रिविधताप भोगत चौरासी, अति जिव भयो अँधीर । अब तो कृपासिन्धु दुख मेटो, यमसे कागदचीर ॥ भवसागरमें नैया अटकी, वशपरि विषय सँमीर । डूबत आय उबारो प्रभुजी, खेय लगावो तीरै ॥ कोई ध्यावत गौरी शंकर, कोइ सिया रघुवीर । मेरे तो एक तुमही धनी हो, क्यों न हरो यह पीर ॥ धर्मदास विनवे करजोरी, प्रभु तुम गुण गंभीर । मैं अति हीन दीन शठ पामैर, क्षमा करो तर्कसैर ॥ १२ ॥
सत गुरु हो ! मोहिं उतारो भवपार । तुमबिन और सुनैको मेरी, औरतनाद पुकार ॥ ८० ॥ गहरी नदिया नाव पुरानी- आय परी मैंझें धार । विषय बयँर प्रबल चहुँदिशसे, तापर करत प्रहँर ॥ ताँत मात सुत भाई बन्धु तिय, लोक कुटुम परि- वार । अपने अपने स्वारथके हित, राखत सब व्यवहार ॥ नेम
१ निरफल. २ सुवर्णका घटा. ३ मूर्ख. ४ आग्रह. ५ अमृत. ६ पावघोनेके लिये. ७ मूर्ख. ८ घडेमेंसे बाहर बाहर निरता है. ९ इन्द्रका हाथी. १० जलानेकी लकड़ीका बोझा. ११ बडे परिभ्रमसे. १२ पाया. १३ रत्न विशेष. जो चिन्त मात्रसे सब कुछ दे देता है. १४ कल्पवृक्ष. १५ गंगाजल. १६ मृगतृष्णाका जल. १७ मुह १८ केंच रहित. कायर. १९ वायु. २० किनारे. २१ अधम. २२ अपराध. २३ दुःखित चिलाहट. २४ बीछ. २५ वायु. २६ ताडना. २७ पिता.