भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(८९)

भवजलनिधिपोतस्तं विना नास्ति कश्चित् ॥

सतगुरु कवीर गुणगण गँभीर । दुखहरण हेतु धारचो शरीर अति धीर वीर मति गति उदार । भजु निर्विकार सतनाम सार ॥ ७ ॥

सौरठ-सवय १२ बजे रात्रि

बनंढो भलो रिझोंयोरी । मोरि सुरैति सोहांगिन नवलें बनी, साँहिब वर पायोरी । टे० ॥ लख चौरासी भटकत २ यह दिन आयोरी । ऐसो अवसर पाय गँमायो, तिन पछितायोरी ॥ ज्ञान को मंडप छाय युक्तिसे, श्रद्धा कलश भरायोरी । सार शब्द अनबेधे मोतियन, चौक पुरायोरी ॥ सत्यनामको मोर बँधायो, पडेलो प्रेम लगायोरी । पांचपचीस सहेली हिलमिल, मङ्गल गायोरी ॥ सतगुरुसे हँथलेवो जोडचो, भक्तिकी भाँवर खायोरी । सुर तैतिस बराती, ब्रह्मा वेद सुनायोरी ॥ भवसागरको फेरो मेटचो; परनिर्पाति घर लायोरी ॥ प्रेमसहित एकचित हो, दुविधा दूरि बहायोरी । सत्यलोकमें अद्भुत मन्दिर, तामें पलंग बिछायोरी । धर्मिनको सतगुरु कवीर मिलि; तपन बुझायोरी ३६॥

ननदी ! जावोरी महलमें, आपनो विरन जगाव ॥ टेक० ॥ बिरन जगायो ना जगे, करौ मैं कौन ? उपाव । घट औधियारो हो रह्यो, लागि सकत नहि दाव ॥ भरमके तालेमें सखी कुञ्जी सुमति लगाव । कपट किवीरैया खोलिकै, ज्ञानको दियैना जराव । ततको तेल लगायकै, तृष्णा केश गुथाव । भूषण पहिरि विवे- कके, निज शृङ्गार बनाव ॥ शीलके रँग रँगवायकै, अँगियाँ अङ्क

बताता है, करने योग्य कर्म और नहीं करने योग्य बर्त्मको सम्झाता है सो गुह है तिस गुह बिना संसार सागरसे पार करनेवाली कोई दूसरी नवका नहीं है।

१ त्रुहा. २ बरा किया. ३ सुन्दर प्रीति. ४ सघवा. ५ सुन्दर बुलहन. ६ प्रभु.

१ विवाहके समय जो वस्त्र लाडी (बुलहन) को उड़ाया जाता है २ सखी ३ पाणि ग्रहण ४ फेरा.

५ विवाह करके. ६ माईको । ७ कुँची, ८ फिवाठ. ९ दीपक, दीवा. १० बोली.