कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथो-
अविद्याको विकार । भजुनिर्विकार ॥ (४) स्नातं तेन समस्त- तीर्थसलिले दत्तापि सर्वावनिर्णयज्ञानाश्च कृतं सहस्रमखिलाः देवाश्च संपूजिताः ॥ संसाराश्च समुद्धृताः स्वपितरस्त्रैलोक्यपूज्योप्यसौ । यस्य ब्रह्मविचारणे क्षणमपि स्थैर्यं मनः प्राप्नुयात् ॥ ४ ॥ यह लोकलाज मर्याद फन्द । करि कर्म धर्म सब हो स्वछन्द ॥ एक नित्य अनित्यको करुविचार । भजुनिर्वि० (५) यावत् स्व- स्थमिदं शरीरमरुजं यावज्जरा दूरतो । यावच्चन्द्रियशक्तिप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः ॥ आत्मश्रेयसि तावदेव महतां कार्यः प्रयत्नो महान् ॥ संदीप्ति भवने तु कूपखनन प्रत्युद्यमस्तादृशः ॥ ५ ॥ जिमि रङ्ग पतङ्गको नाशमान । त्यों यौवनको मद झूठ जान ॥ नहि बिगरत लागत तनक वार । भजुनिर्वि० (६) वृक्षं क्षीण- फलं त्यजन्ति विहगाः शुष्कं सरः सारसाः । निर्द्वयं पुरुषं त्य- जन्ति गणिका भ्रष्टं नृपं मंत्रिणः ॥ पुरुषं पर्युपितं त्यजन्ति मधुपा दग्धं वनान्तं मृगाः । सर्वे कार्यवशाज्जनोऽभिरमते कस्यास्ति को वल्लभः ॥ सुत मात पिता तिरिया अनूप । अति होत सुखी लखि मूढ भूप ॥ ये स्वारथके हैं दिना चार । भजु निर्वि० ॥ (७) विदलयति कुबोधं बोधयत्यागमार्थम् । सुगतिकुगति- मार्गौ पुण्यपापं व्यनक्ति । अवगमयति कृत्याकृत्यभेदं गुरुयो ।
(४) अर्थ-जिसका मन क्षणमात्रमें आत्मविचारमें स्थिरताको प्राप्त हुआ है, उसने मानों संपूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर लिया, समस्त पृथ्वीका वान कर चुका, अनेक यज्ञकर चुका, तथा सर्वदेवन(ओंका पूजन कर चुका, अपने माता पिताओंको संसारसे उद्धार कर चुका और बहो त्रैलोक्यके पुजने योग्य हैं ॥
(५) अर्थ-जबतक यह शरीर पुष्ट और आरोग्य है, तथा वृद्धावस्था दूर है और इन्द्रियोंकी शक्ति न्यून नहीं हुई, तथा जबतक आयुष्य क्षीण नहीं हुआ तबतक बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि अपने कल्याणका यत्न अच्छी-तरह कर ले, नहीं तो जब घर चलने लगे तब कूप खोदनेके उद्योगसे क्या होता है ? ॥
(६) अर्थ-वृक्षको फलहीन होनेसे पक्षी त्याग देते हैं, सरोवर सूख जानेसे सारस, निर्द्वय पुरुषको बंश्या क्षष्ट राजाको मंत्री, फूल झड जानेपर भ्रमर और बनको भस्म हो जानेसे मृग त्याग देते हैं, अतएव क्षव प्राणी अपने २ स्वार्थके कारणसे पास आते हैं, नहीं तो कौन किसका मित्र है ? ॥
(७) अर्थ-जो अज्ञानका नाश करि शास्त्रके अर्थका ज्ञान करता है सद्-असद् मार्ग तथा पुण्य पापको