भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली ।

( ८७ )

गौडमिथ्रत देश ।

मोरि मान कही मूरख गँवार । है मनुष जन्म नहिं बारबार ॥ तजु काम कोध तृष्णा अपार । भजु निर्विकार सतनामसार ॥ १० ॥

( १ ) अपारे संसारे कथमपि समसाद्य नृभवम् । न धर्म यः कुर्याद्विषयसुखतृष्णातरलितः ॥ व्रजन् पारावारे प्रवरमपहाय प्रवहणम् । स सुरुयो मूर्खाणामुपलमुपलब्धुं प्रयतते ॥ १ ॥ रे ! मूढ तोहि नहिं तनक लाज । गहे विषय उपल तजि गुरु जहाज ॥ तेहिपर चढि उतरन चहत पार । भजुनिर्वि० ( २ ) आयुर्वर्षशतं नृणां परिमितं रात्रौ तदर्थं गतं ।

तस्यार्धस्य पस्स्य चार्धमपरं बालत्ववृद्धत्वयोः ॥ शेषं व्या- धिवियोगदुःखसहितं सेवादिभिनीयते । जीवे वारितरङ्गचञ्चल- तरे सौरुयंकृतः प्राणिनाम् ॥ २ ॥ दुखरूप सकल यह है प्रपंच । नहिं तीन काल सुख जानु रञ्ज ॥ ताते तजु यह सब लखि असार । भजुनिर्विकार सतनामसार ॥ ( ३ ) आदित्यस्य गता- गतैरहरहः संक्षीयते जीवतं व्यापारैर्बहुकार्यभारगुरुभिः कालो न विज्ञायते । दृष्ट्वा जन्मजराविपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्पद्यते पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिर्गं उन्मत्तभूतं जगत् ॥ ३ ॥ वरणाश्रमको अभिमान धार । नहिं करत आतमाको विचार ॥ यह मूल

१ विणु ( १ ) अर्थ-अपार संसार में किसी प्रकार से मनुष्यजन्मको पाकर, जो पुरुष धर्म नहीं करता और विषयसुखकी इच्छामें तत्पर है, वह पुरुष जैसे समुद्रके पार (किनारेपर) जानेवाले श्रेष्ठ नावको त्याग कर पत्थरको पकड़ने का प्रयत्न करता है तो महा मुर्ख है ॥

( २ ) अर्थ-प्रथम तो मनुष्यकी आयुष्काली प्रमाण सौ वर्षका है, सो-तिसमेंसे आधे पचास वर्ष रात्रिके सोनेमें व्यतीत होते हैं। अब शेष जो बचे पचास वर्ष, तिसके आधे पचीस वर्ष रहे, जिसमेंसे कुछ तो प्रथम बालपनके अज्ञानमें और कुछ पीछे वृद्धावस्थामें बीत जाते हैं, अब बाकी रहे पचीस वर्ष, तिसमें व्याधि वियोग, दुःख, पराई सेवामें लग जाते हैं, बस ! यह व्यवस्था तो यदि सौ वर्षका जीवन हो तिसको है किन्तु मनुष्यका जीवन तो केवल जलतरंगवत् अनियमित है, अब कहिये प्राणियोंको सुख कहाँ ? ॥

( ३ ) अर्थ-सूर्यके उदय अस्त होनेसे आयुष्य दिन प्रति दिन घटती जाती है, तथा अनेक बड़े र व्यापार समुदायके कार्यमें लगे रहनेसे, यह भी नहीं ज्ञात होता कि मेरे आयुष्यका कितना काल व्यतीत हो गया है और जन्म, वृद्धत्व, विपत्ति और मरणको भी देखकर नहीं डरता इससे यह निश्चय है कि, संसारमोहरूपी प्रमाद मंदिराको पीकर बासना हो रहा है ॥