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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(१०५)

नहीं जानै भूत प्रेत हठि हृदय धरै । तजि कपूर गांठी विष बाँधै ज्ञान गंवाय मुगुध फिरे ॥ छीजे साहु चोर प्रतिपालै संत जनन की कूट करै । कहहिँ कवीर जिह्वाके लम्पट यहि विधि प्रानी नरक परै ॥ १७ ॥

शब्द ४०६-रामगुन न्यारो न्यारो न्यारो । अबुझा लोग कहाँ लौ बूझैं बूझनहार विचारो । केते रामचन्द्र तपसी सो जिन यह जग विटमाया ॥ केते कान्ह भये सुरलीधर तिन भी अन्त न पाया ॥ केतिक सिध साधक संन्यासीजिन बनवास बसाया ॥ केते मुनि जन गोरख कहिये तिन भी अंत न पाया ॥ जाकी गति ब्रह्मै नहीं पाई शिव शनकादिक हारे । ताके गुन नर कैसे पैहो कहे कवीर पुकारे ॥ १८ ॥

शब्द ४०७-ए तत राम जपो हो प्रानी तुम बूझा अकथ कहानी । जाको भाव होत हरि ऊपर, जागत रैन बिहानी ॥ टे० ॥ डाइनि डारे सोनहा डारे सिंह रहे बन घरे । पांच कुटुम्ब मिलि जूझन लागे बाजन बाज घनेरे ॥ रोहु मिरगा संशय बन हाँके पारथ बाना मेलै ॥ शायर जरे सकल बन डाहे मच्छ अहेरा खेलै ॥ कहैं कवीर सुनो हो संतो जो यह पद निरवारै । जो यह पदको गाइ विचारे आपु तरे अरु तारै ॥ १९ ॥

शब्द ४०८-कोइ राम रसिक रस पियहुगे सुख जियहुगे ॥ टे० ॥ फल अंकृतै बीज नहीं बोकला सुक पंछी रस खाई । चुवै न बुंद अंग नहीं भीजै दास भँवर सँग लाई ॥ निगम रसाल चारि फल लागै तामैं तीन समाई । एकहै दूरि चहै सब कोई जतन जतन कोई पाई ॥ गयउ बसंत ग्रीषम ऋतु आई बहुरि न तरुवरतर आवै । कहै कवीर स्वामी सुख सागर राम मगन है पावै ॥ २० ॥