कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
शब्द ४०९-राम न रमसि कौन दंड लागा । मरि जेबेका करिबे अभागा ॥ ८० ॥ कोइ तीरथ कोइ सुंडित केशा । पाखंड भरम मन्त्र उपदेशा ॥ विद्या वेद पढि कर हंकारा । अन्तकाल मुख फाँके छारा ॥ दुखित सुखिन सब कुटुम्ब जिवैवै । मरन बेर अकसर दुख पैवै । कहैं कवीर यह कलि है खोटी । जो रह करवा निकसै टोटी ॥ २१ ॥
शब्द ४१०-अवधू छोड़ो मन विस्तारा । सौ पद गहु जाहि ते सद्गति पार ब्रह्म ते न्यारा ॥ ८० ॥ नहीं महादेव नहीं मद्भ्यमद हरि हजरत तब नाही । आदम ब्रह्मा नहीं तब होते नहीं धूप नहीं छाहीं ॥ असी सहस्र पैगम्बर नाही सहस्र अठासी मूनी । चन्द्र सूर तारा गन नाही मच्छ कच्छ नहि दूनी ॥ वेद किताब सुम्रिति नहि संजम नहि जमन परसाई । बांग नेमाज कलमा नहि होते रामों नहीं खुदाई ॥ आदि अन्त मन मध्य न होते आतत पवन न पानी । लख चौरासी जीव जनतु नहि साखी शब्द न बानी ॥ कहैं कवीर सुनो हो अवधू आगे करहु विचारा । पूरनब्रह्म कहाँते प्रगटे किरतम किन उपचारा ॥ २२ ॥
शब्द ४११-अवधू कुदरतकी गति न्यारी । रंक निवाज करै वह राजा राजा भूपति करै भिखारी ॥ ८० ॥ येते लौगहि फल नहि लागै चन्दन फूल न फूले । मच्छ शिकारी रमें जंगलमें सिंह समुद्रहि झूले ॥ रेंडा रुख भया मल्यागिरि चहुँ दिशि फूटी बासा । तीन लोक ब्रह्मंड खंडमें देखै अन्ध तमाशा ॥ पंगुल मेरु सुमेरु उल्लै त्रिभुवन मुक्ता डोलै । गुंगा ज्ञान विज्ञान परगासै अनहद बानी बोले ॥ बांधि अकाश पताल पठावै शेष सरगपर राजे । कहैं कवीर राम है राजा जो कछु करै सो छाजे ॥ २३ ॥
शब्द ४१२-अवधू सो जोगी गुरु मेरा । जो ई पदको करै